क्या आपको भी कभी-कभी लगता है कि आप अपनी ज़िंदगी खुद नहीं जी रहे हैं?
कि आप महज़ एक कठपुतली हैं और कोई अनजानी ताकत आपसे मनचाहा नाच नचा रही है? आधुनिक जीवन की इसी घुटन, बेबसी और फिर एकतरफ़ा इश्क़ में टूटने की दास्तान को शब्दों में पिरोया है एक बेहद प्रतिभाशाली युवा आवाज़ ने।
हम बात कर रहे हैं दिव्यांश यादव (Divyansh Yadav) की ताज़ा और दिल चीर देने वाली गज़ल— "ये दुनिया चल रही है या चलाई जा रही है" के बारे में। जिस तरह नासिर काज़मी की 'नीयत-ए-शौक़' में इश्क़ की अंतहीन प्यास झलकती है, ठीक उसी तरह एक नए शायर की कलम से निकला यह दर्द आपको सोचने पर मजबूर कर देगा। आइए पढ़ते हैं इस नई पीढ़ी के शायर के शानदार लफ़्ज़ और समझते हैं इसके पीछे छिपे गहरे अर्थ।
गज़ल के बोल (Original Lyrics)
ये दुनिया चल रही है या चलाई जा रही है रेत में मछलियाँ तैराई जा रही है एक तरफ़ मर्ज़ का पता नहीं लग रहा इलाज में उम्र भर की कमाई जा रही है मिले थे दोनों पहली मर्तबा जैसे गंगाजल में शराब मिलाई जा रही है जमा कर रखी थी मोहब्बतें जितनी गाल पे तिल वाली के ऊपर पाई-पाई जा रही है मैं हूँ के आँसुओ को रोक के रखा है ‘दिव्यांश’ वो है रक़ीब के गीत गाई जा रही है
Hinglish Lyrics (Roman Hindi)
Ye duniya chal rahi hai ya chalai ja rahi hai Ret mein machhliyan tairai ja rahi hai Ek taraf marz ka pata nahi lag raha Ilaaj mein umar bhar ki kamai ja rahi hai Mile the dono pehli martaba jaise Gangajal mein sharab milai ja rahi hai Jama kar rakhi thi mohabbatein jitni Gaal pe til wali ke upar pai-pai ja rahi hai Main hoon ke aansuo ko rok ke rakha hai 'Divyansh' Wo hai raqeeb ke geet gayi ja rahi hai
कविता का भाव और दर्द (Meaning Explained)
यह गज़ल कोई भारी-भरकम साहित्यिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि आज के युवाओं के यथार्थ की आवाज़ है। दिव्यांश शुरुआत ही एक ऐसे सवाल से करते हैं जो हम सब कभी न कभी खुद से पूछते हैं— "रेत में मछलियाँ तैराई जा रही है।" यह लाइन आधुनिक ज़िंदगी की उस भागदौड़ का प्रतीक है जो पूरी तरह से बेमानी है। यह हमें धूमिल की कविता 'हर तरफ धुआं है' की उस घुटन की याद दिलाती है जहाँ सिस्टम आदमी को ज़िंदा तो रखता है, पर जीने नहीं देता।
"एक तरफ़ मर्ज़ का पता नहीं लग रहा, इलाज में उम्र भर की कमाई जा रही है..."
शायर का यह शेर मेडिकल सिस्टम पर तो तंज कसता ही है, लेकिन इसका असली दर्द मानसिक है। इंसान अंदर से उदास है, उसे अपनी ही बेचैनी (Anxiety) की वजह नहीं पता, और वह झूठे इलाजों (भौतिक चीज़ों, दिखावे) में अपनी उम्र भर की कमाई लुटा रहा है। कुछ ऐसा ही दर्द धूमिल की 'गरीबी' कविता में भी देखने को मिलता है।
जब गंगाजल में शराब मिलती है!
गज़ल के तीसरे शेर में दिव्यांश ने जो विरोधाभास (Contradiction) पेश किया है, वह कमाल है। दो बिल्कुल अलग इंसान जब प्यार में पड़ते हैं— एक पवित्र आस्था (गंगाजल) जैसा और दूसरा बागी, नशीला (शराब) जैसा। यह प्यार मुकम्मल कैसे हो सकता था? यह तो शुरुआत से ही विनाशकारी था।
और फिर आता है वह शेर जो हर उस प्रेमी को रुला सकता है जिसने सब कुछ न्योछावर किया हो: "जमा कर रखी थी मोहब्बतें जितनी, गाल पे तिल वाली के ऊपर पाई-पाई जा रही है।" यह पंक्ति हमें आनंद राज सिंह की 'यही अपनी कहानी थी मियाँ' के उस दौर में खींच ले जाती है जहाँ इश्क़ में हिसाब-किताब नहीं होता था।
"मैं हूँ के आँसुओ को रोक के रखा है ‘दिव्यांश’, वो है रक़ीब के गीत गाई जा रही है"
(क्लाइमैक्स: जहाँ एक तरफ़ शायर अपना आत्मसम्मान बचाने के लिए आँसू रोके खड़ा है, वहीं महबूबा बेपरवाह होकर किसी और (रक़ीब) की तारीफ़ें कर रही है।)
शायर के बारे में: दिव्यांश यादव (Divyansh Yadav)
दिव्यांश यादव हिंदी और उर्दू शायरी की दुनिया में उभरता हुआ एक ताज़ा और यथार्थवादी नाम है। वर्तमान में वे भारत के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान, IIMC (Indian Institute of Mass Communication), नई दिल्ली के ADPR (2026-27) बैच के छात्र हैं।
मीडिया की चमक-दमक के बीच उनका कवि हृदय ज़मीनी सच्चाइयों और इंसानी रिश्तों की उलझनों को बड़ी बारीकी से पकड़ता है। IIMC के जिस Brutal Media Reality का सामना युवा पत्रकार करते हैं, वही यथार्थवाद दिव्यांश की गज़लों में छलकता है।
Instagram पर दिव्यांश को पढ़ेंआपके ज़ेहन में उठने वाले सवाल (FAQs)
1. दिव्यांश यादव कौन हैं?
दिव्यांश यादव एक युवा कवि और शायर हैं, जो वर्तमान में IIMC नई दिल्ली (2026-27) में ADPR (Advertising and Public Relations) के छात्र हैं। उनकी कविताएँ आधुनिक यथार्थ और प्रेम की गहराइयों पर केंद्रित होती हैं।
2. "रक़ीब" का अर्थ क्या होता है?
गज़ल और उर्दू शायरी में 'रक़ीब' (Raqeeb) का अर्थ होता है प्यार में आपका दुश्मन या प्रतिद्वंद्वी। यानी वह शख्स जिसे आपकी महबूबा अब आपसे ज़्यादा चाहने लगी हो।
3. "रेत में मछलियाँ तैराई जा रही है" का क्या मतलब है?
यह आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी का एक व्यंग्यात्मक बिंब है। जिस तरह रेत में मछली का तैरना असंभव और अप्राकृतिक है, वैसे ही इंसान आज ऐसे सिस्टम में जी रहा है जो उसके स्वभाव के बिल्कुल विपरीत है।
आपकी कहानी क्या है?
दिव्यांश की कलम ने उस दर्द को छुआ है जिससे हम में से कई लोग रोज़ गुज़रते हैं। चाहे वह ज़िंदगी का खालीपन हो या किसी महान गाथा की तरह अपने प्यार के लिए सब कुछ लुटा देना।
इस गज़ल का कौन सा शेर आपके दिल के सबसे करीब लगा? नीचे कमेंट्स में ज़रूर बताएँ!