सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

New !!

कृष्ण की चेतावनी Lyrics in Hindi | रश्मिरथी – दिनकर

वंदना - वैद्यनाथ मिश्रा "यात्री" मैथिलि कविता

 

वंदना

वैद्यनाथ मिश्रा "यात्री" मैथिलि कविता 

Nagaarjun "Yatri" Maithili Poems

हे तिरहुत, हे मिथिले, ललाम !
मम मातृभूमि, शत-शत प्रणाम !
तृण तरु शोभित धनधान्य भरित
अपरूप छटा, छवि स्निग्ध-हरित

वंदना - वैद्यनाथ मिश्रा "यात्री" मैथिलि कविता
गंगा तरंग चुम्बित चरणा
शिर शोभित हिमगिरि निर्झरणा
गंडकि गाबथि दहिना जहिना
कौसिकि नाचथि वामा तहिना


धेमुड़ा त्रियुगा जीबछ करेह
कमला बागमतिसँ सिक्त देह
अनुपम अद्भुत तव स्वर्णांचल
की की न फुलाए फड़ए प्रतिपल


जय पतिव्रता सीता भगवति
जय कर्मयोगरत जनक नृपति
जय-जय गौतम, जय याज्ञवल्कय
जय-जय वात्स्यायन जय मंडन


जय-जय वाचस्पति जय उदयन
गंगेश पक्षधर सन महान
दार्शनिक छला’, छथि विद्यमान
जगभर विश्रुत अछि ज्ञानदान


जय-जय कविकोकिल विद्यापति
यश जनिक आइधरि सब गाबथि
दशदिश विख्यापित गुणगरिमा
जय-जय भारति जय जय लखिमा

वंदना - वैद्यनाथ मिश्रा "यात्री" मैथिलि कविता
जय-जय-जय हे मिथिला माता
जय लाख-लाख मिथिलाक पुत्र
अपनहि हाथे हम सोझराएब
अपनेक देशक शासनक सूत्र


बाभन छत्री औ’ भुमिहार
कायस्थ सूँड़ि औ’ रोनियार
कोइरी कुर्मी औ’ गोंढि-गोआर
धानुक अमात केओट मलाह


खतबे ततमा पासी चमार
बरही सोनार धोबि कमार
सैअद पठान मोमिन मीयाँ
जोलहा धुनियाँ कुजरा तुरुक


मुसहड़ दुसाध ओ डोम-नट्ट...
भले हो हिन्नू भले मुसलमान
मिथिलाक माटिपर बसनिहार
मिथिलाक अन्नसँ पुष्ट देह

वंदना - वैद्यनाथ मिश्रा "यात्री" मैथिलि कविता
मिथिलाक पानिसँ स्निग्ध कान्ति

सरिपहुँ सभ केओ मैथिले थीक
दुविधा कथीक संशय कथीक ?
ई देश-कोश ई बाध-बोन


ई चास-बास ई माटि पानि
सभटा हमरे लोकनिक थीक
दुविधा कथीक संशय कथीक ?
जय-जय हे मिथिला माता
सोनित बोकरए जँ जुअएल जोंक,
तँ सफल तोहर बर्छीक नोंक !


खएता न अयाची आब साग !
ककरो खसतैक किएक पाग ?
केओ आब कथी लै मूर्ख रहत ?
केओ आब कथी लै कष्ट सहत ?


केओ किअए हएत भूखैं तबाह ?
केओ केअए हएत फिकरें बताह ?
नहि पड़ल रहत, भेटतैक काज !
सभ करत मौज, सभ करत राज !


पढ़ता गुनता करता पास-
जूगल कामति, छीतन खवास
जे काजुल से भरि पेट खएत
ककरो नहि बड़का धोधि हएत

वंदना - वैद्यनाथ मिश्रा "यात्री" मैथिलि कविता
कहबओता अजुका महाराज
केवल कामेश्वरसिंह काल्हि
हमरालोकनि जे खाइत छी
खएताह ओहो से भात-दालि

अछि भेल कतेको युग पछाति
ई महादेश स्वाधीन आइ
दिल्ली पटना ओ दड़िभंगा
फहराइछ सभटा तिनरंगा


दुर्मद मानव म्रियमाण आइ
माटिक कण कण सप्राण आइ
नव तंत्र मंत्र चिंता धारा
नव सूर्य चंद्र नवग्रह तारा

वंदना - वैद्यनाथ मिश्रा "यात्री" मैथिलि कविता
सब कथुक भेल अछि पुनर्जन्म
हे हरित भरित हे ललित भेस
हे छोट छीन सन हमर देश
हे मातृभूमि, शत-शत प्रणाम!!

-

यात्री

कविक स्वप्न  -"यात्री" मैथिलि कविता

 मैथिलि कवितायेँ

"यात्री" मैथिलि कविता

Famous Poems

Shafaullah Khan Rokhri: Chalre Chalre Waal Lyrics Meaning & Deep Analysis

Home » Music » Chalre Chalre Waal Lyrics Meaning Shafaullah Khan Rokhri के अमर गीत 'Chalre Chalre Waal' का गहरा अर्थ और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण क्या आपने कभी सोचा है कि एक काली शॉल और लाल रुमाल किसी को इस कदर दीवाना कैसे बना सकता है? संगीत की दुनिया में कुछ धुनें ऐसी होती हैं जो सिर्फ कानों को नहीं, सीधे रूह को छूती हैं । शफ़ाउल्लाह ख़ान रोखड़ी (Shafaullah Khan Rokhri) का बहुचर्चित सरायकी/पंजाबी लोकगीत 'चलरे चलरे वाल' एक ऐसा ही जादुई तराना है। यह गीत सिर्फ शब्दों का जाल नहीं है; यह एक आशिक के दिल की पुकार है । एक ऐसा प्रेमी जो अपने महबूब की ठेठ सादगी और उसकी कातिलाना अदाओं पर अपनी पूरी दुनिया लुटाने को तैयार है। शफ़ाउल्लाह ख़ान रोखड़ी का अमर ग...

कट जाओगे मिट जाओगे हो जाएगा अंत (Kat Jaoge Mit Jaoge): Viral Lyrics & Meaning

कट जाओगे मिट जाओगे हो जाएगा अंत: वायरल गीत का खौफनाक सच और सटीक विश्लेषण भारतीय राजनीतिक संगीत के इतिहास में शायद ही किसी गाने ने इंटरनेट पर इतनी तेज़ी से आग लगाई हो जितनी "कट जाओगे मिट जाओगे हो जाएगा अंत" ने लगाई है। प्रेम (Prem) की रोंगटे खड़े कर देने वाली आवाज़ और रुद्र (Rudra) की बेबाक कलम ने एक ऐसा राजनीतिक गान (Political Anthem) तैयार किया है, जो सोशल मीडिया के हर कोने में गूंज रहा है। क्या यह महज़ एक देशभक्ति गीत है, या इसके पीछे कोई गहरा राजनीतिक ध्रुवीकरण छिपा है? साहित्यशाला (Sahityashala) के इस एक्सक्लूसिव लेख में, हम इस वायरल ट्रैक के संपूर्ण बोल (Full Lyrics), इसके प्रत्येक छंद का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण (Psychological Trigger Formatting) और इसके सामाजिक-राजनीतिक एजेंडे का एक निष्पक्ष और गहन आलोचनात्मक विश्लेषण करेंगे। ▶ वीडियो देखें 📱 WhatsApp पर शेयर करें प्रेम और रुद्र द्वारा रचित इस लोकप्रिय गीत की आधिकारिक कलाकृति। गीत के संपूर्ण बोल और मनोवैज्ञानिक संरचना ...

सुना था कि बेहद सुनहरी है दिल्ली (Lyrics & Meaning) - Imran Pratapgarhi

सुना था कि बेहद सुनहरी है दिल्ली (Lyrics & Meaning) - Imran Pratapgarhi "Suna Tha Ki Behad Sunheri Hai Dilli" – यह सिर्फ एक कविता की पंक्ति नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों पर किया गया एक बेहद तीखा और मार्मिक राजनीतिक व्यंग्य है। इमरान प्रतापगढ़ी की यह रचना एक माँ की तड़प को आवाज़ देती है, जो चकाचौंध से भरी 'सुनहरी' दिल्ली में अपने लापता लाल (बेटे) और इंसाफ के लिए दर-दर भटक रही है। साहित्यशाला के इस लेख में हम केवल इस मशहूर कविता के पूरे बोल (Lyrics) ही नहीं पढ़ेंगे, बल्कि इसके पीछे छिपे उस गहरे प्रतीकात्मक अर्थ (Metaphorical Meaning) का भी विश्लेषण करेंगे, जिसने भारतीय राजनीति और समाज को झकझोर कर रख दिया था। प्रतीकात्मक चित्र: "सुनहरी" दिल्ली की खामोशी और एक बेबस माँ की गुहार। (Suna Tha Ki Behad Sunheri Hai Dilli - Visual Meaning) कविता की पृष्ठभूमि और राजनीतिक संदर्भ (Context) साहित्य हमेशा समाज का दर्पण होता है। जब भी सत्ता अपनी ज़िम्मेदारियों से मुँह मोड़ती है, तब फैज़ अहमद फैज़ की ...

Mahabharata Poem in Hindi: कृष्ण-अर्जुन संवाद (Amit Sharma) | Lyrics & Video

Last Updated: October 2026 Table of Contents: 1. Introduction 2. Full Lyrics (Krishna-Arjun Samvad) 3. Watch Video Performance 4. Literary Analysis (Sahitya Vishleshan) महाभारत पर रोंगटे खड़े कर देने वाली कविता Mahabharata Poem On Arjuna by Amit Sharma Visual representation of the epic dialogue between Krishna and Arjuna. This is one of the most requested Inspirational Hindi Poems based on the epic conversation between Lord Krishna and Arjuna. Explore our Best Hindi Poetry Collection for more Veer Ras Kavitayein. तलवार, धनुष और पैदल सैनिक कुरुक्षेत्र में खड़े हुए, रक्त पिपासु महारथी इक दूजे सम्मुख अड़े हुए | कई लाख सेना के सम्मुख पांडव पाँच बिचारे थे, एक तरफ थे योद्धा सब, एक तरफ समय के मारे थे | महा-समर की प्रतिक्षा में सारे ताक रहे थे जी, और पार्थ के रथ को केशव स्वयं हाँक रहे थे जी || रणभूमि के सभी नजारे देखन में कुछ खास लगे, माधव ने अर्जुन को देखा, अर्जुन उन्हें उदास लगे | ...

Baba Jani Poem Lyrics: पिता-पुत्र की इस रुला देने वाली कविता ने लाखों दिलों को छुआ!

साहित्य का मूल उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के उन पृष्ठों को खोलना है जिन पर अक्सर धूल जम जाती है। "बाबा जानी" (Baba Jani) आधुनिक दौर की एक ऐसी ही मार्मिक रचना है, जो पीढ़ियों के बीच पनपते संवादहीनता (Generational Gap) और वृद्धावस्था के मनोवैज्ञानिक पहलुओं को बड़ी सूक्ष्मता से उकेरती है। जिस तरह सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की 'सरोज स्मृति' ने एक पिता के असीम वात्सल्य और शोक को अमर कर दिया, ठीक उसी तरह यह कविता एक वृद्ध, असहाय पिता और उसके अधीर, युवा बेटे के बीच के उस जटिल संवाद को प्रस्तुत करती है, जो आज के समाज का एक कड़वा यथार्थ बन चुका है। हिंदी साहित्य में जहाँ एक ओर धूमिल की 'किस्सा जनतन्त्र' जैसे रचनाओं में व्यवस्था और रोज़गार का संघर्ष झलकता है, और दिनकर की 'व्याल विजय' में सत्ता का वैचारिक द्वंद्व दिखाई देता है; वहीं, 'बाबा जानी' घर की चारदीवारी के भीतर चलने वाले उस मौन संघर्ष को स्वर देती है जहाँ मनुष्य की शारीरिक लाचारी उसके आत्मसम्मान से टकराती है...