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Mangal Rang Lyrics in Hindi & Meaning: Ramayana (2026) Song Guide

Gora Badal Kavita: गोरा बादल (Lyrics & Arth) | Pandit Narendra Mishra | PDF Download

Gora Badal Kavita: पंडित नरेंद्र मिश्र की अमर गाथा (Lyrics & Arth)

पंडित नरेंद्र मिश्र (Pandit Narendra Mishra) की लेखनी से निकली यह कविता केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि भारतीय देशभक्ति कविता (Patriotic Poems) का एक अनमोल रत्न है।

हाल ही में डॉ. कुमार विश्वास (Dr. Kumar Vishwas) ने इस कविता को अपने ओजस्वी स्वर में गाकर इसे नई पीढ़ी के दिलों में बसा दिया है। जिस तरह महाभारत के युद्ध में वीरों ने धर्म की रक्षा की, उसी तरह गोरा और बादल ने मेवाड़ की आन बचाने के लिए अलाउद्दीन खिलजी की विशाल सेना का सामना किया।

सारांश (Summary): यह कविता गोरा और बादल (Gora Badal) के बलिदान की कहानी है। जब अलाउद्दीन खिलजी ने छल से रावल रतन सिंह को कैद किया, तब गोरा-बादल ने '700 डोलियों' की अद्भुत रणनीति से उन्हें मुक्त कराया। नीचे पढ़ें पूरी कविता का भावार्थ (Arth) और Lyrics।

पद्मिनी गोरा बादल

(Rachnakar: Pandit Narendra Mishra)

Gora Badal Kavita Lyrics by Pandit Narendra Mishra - Chittorgarh Fort
दोहराता हूँ सुनो रक्त से लिखी हुई क़ुरबानी,
जिसके कारण मिट्टी भी चन्दन है राजस्थानी |
रावल रत्न सिंह को छल से कैद किया खिलजी ने,
काल गई मित्रों से मिलकर दाग किया खिलजी ने |
खिलजी का चित्तोड़ दुर्ग में एक संदेशा आया,
जिसको सुनकर शक्ति शौर्य पर फिर अँधियारा छाया ||
दस दिन के भीतर, न पद्मिनी का डोला यदि आया,
यदि ना रूप की रानी को तुमने दिल्ली पहुँचाया |
तो फिर राणा रत्न सिंह का शीश कटा पाओगे,
शाही शर्त ना मानी तो पीछे पछताओगे ||
Alauddin Khilji History - The Antagonist of Gora Badal Poem
दारुन संवाद लहर सा दौड़ गया रण भर में,
यह बिजली की तरक छितर से फैल गया अम्बर में |
महारानी हिल गयीं शक्ति का सिंघासन डोला था,
था सतीत्व मजबूर जुल्म विजयी स्वर में बोला था ||
रुष्ट हुए बैठे थे सेनापति गोरा रणधीर,
जिनसे रण में भय कहती थी खिलजी की शमशीर |
अन्य अनेको मेवाड़ी योद्धा रण छोड़ गए थे,
रत्न सिंह के संध नीद से नाता तोड़ गए थे ||
पर रानी ने प्रथम वीर गोरा को खोज निकाला,
वन-वन भटक रहा था मन में तिरस्कार की ज्वाला |
गोरा से पद्मिनी ने खिलजी का पैगाम सुनाया,
मगर वीरता का अपमानित ज्वार नही मिट पाया ||
बोला ," मैं तो बोहोत तुक्ष हूँ राजनीति क्या जानूँ ?
निर्वासित हूँ राज मुकुट की हठ कैसे पहचानूँ |"
बोली पद्मिनी," समय नहीं है वीर क्रोध करने का,
अगर धरा की आन मिट गयी घाव नहीं भरने का ||
दिल्ली गयी पद्मिनी तो पीछे पछताओगे,
जीतेजी रजपूती कुल को दाग लगा जाओगे |

"राणा ने जो कहा किया वो माफ़ करो सेनानी,"
यह कह कर गोरा के क़दमों पर झुकी पद्मिनी रानी ||
Rani Padmini Jauhar Scene - Historical painting of Rajput women performing Agni Snan in Chittorgarh.
'जिसके कारण मिट्टी भी चन्दन है राजस्थानी' - चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी के जौहर का प्रतीकात्मक चित्रण।

" हैं ! हैं ! "
यह क्या करती हो गोरा पीछे हट बोला,
और राजपूती गरिमा का फिर धधक उठा था शोला |
महारानी हो तुम सिसोदिया कुल की जगदम्बा हो,
प्राण प्रतिष्ठा एक लिंग की ज्योति अग्निगंधा हो ||
" जब तक गोरा के कंधे पर दुर्जय शीश रहेगा,
महाकाल से भी राणा का मस्तक नहीं कटेगा |

तुम निश्चिन्त रहो महलों में देखो समर भवानी,
और खिलजी देखेगा केसरिया तलवारों का पानी ||"
राणा के शकुशल आने तक गोरा नहीं मरेगा,
एक पहर तक सर काटने पर धड़ युद्ध करेगा |

एक लिंग की शपथ महाराणा वापस आएंगे,
महाप्रलय के घोर प्रबन्जन भी न रोक पाएंगे ||
शब्द-शब्द मेवाड़ी सेनापति का था तूफानी,
शंकर के डमरू में जैसे जागी वीर भवानी |
जिसके कारण मिट्टी भी चन्दन है राजस्थानी,
दोहराता हूँ सुनो रक्त से लिखी हुई क़ुरबानी||
खिलजी मचला था पानी में आग लगा देने को,
पर पानी प्यास बैठा था ज्वाला पी लेने को |
गोरा का आदेश हुआ सज गए सात सौ डोले,
और बाँकुरे बदल से गोरा सेनापति बोले ||
खबर भेज दो खिलजी पर पद्मिनी स्वयं आती है,
अन्य सात सौ सखियाँ भी वो साथ लिए आती है |
स्वयं पद्मिनी ने बादल का कुमकुम तिलक किया था,
दिल पर पत्थर रख कर भीगी आँखों से विदा किया था ||
और सात सौ सैनिक जो यम से भी भीड़ सकते थे,
हर सैनिक सेनापति था लाखो से लड़ सकते थे |
एक-एक कर बैठ गए सज गयी डोलियां पल में,
मर मिटने की होड़ लग गयी थी मेवाड़ी दल में ||
हर डोली में एक वीर था चार उठाने वाले,
पांचो ही शंकर के गण की तरह समर मतवाले |
बज कूच शंख सैनिकों ने जयकार लगाई,
हर-हर महादेव की ध्वनि से दशो दिशा लहराई ||
Veer Gora Fighting Without Head - Depiction of the legend from Gora Badal Poem
'गोरा का धड़ भी दौड़ा' - शीश कटने के बाद भी दुश्मनों का संहार करते सेनापति गोरा।

गोरा बादल के अंतस में जगी जोत की रेखा,
मातृ भूमि चित्तोड़ दुर्ग को फिर जी भरकर देखा |
कर अंतिम प्रणाम चढ़े घोड़ो पर सुभग अभिमानी,
देशभक्ति की निकल पड़े लिखने वो अमर कहानी ||
जा पहुंचे डोलियां एक दिन खिलजी के सरहद में,
उधर दूत भी जा पहुंच खिलजी के रंग महल में ||
बोला शहंशाह पद्मिनी मल्लिका बनने आयी है,
रानी अपने साथ हुस्न की कलियाँ भी लायी है |
एक मगर फ़रियाद उसकी फकत पूरी करवा दो,
राणा रत्न सिंह से एक बार मिलवा दो ||
खिलजी उछल पड़ा कह फ़ौरन यह हुक्म दिया था,
बड़े शौख से मिलने का शाही फरमान दिया था |
वह शाही फरमान दूत ने गोरा तक पहुँचाया,
गोरा झूम उठे छन बादल को पास बुलाया ||
बोले,"बेटा वक़्त आ गया अब काट मरने का,
मातृ भूमि मेवाड़ धरा का दूध सफल करने का |

यह लोहार पद्मिनी भेष में बंदी गृह जायेगा,
केवल दस डोलियां लिए गोरा पीछे ढायेगा ||
यह बंधन काटेगा हम राणा को मुख्त करेंगे,
घोड़सवार उधर आगे की खी तैयार रहेंगे |
जैसे ही राणा आएं वो सब आंधी बन जाएँ,
और उन्हें चित्तोड़ दुर्ग पर वो शकुशल पहुंचाएं ||
"अगर भेद खुल गया वीर तो पल की देर न करना,
और शाही सेना पहुंचे तो बढ़ कर रण करना |

राणा जीएं जिधर शत्रु को उधर न बढ़ने देना,
और एक यवन को भी उस पथ पावँ ना धरने देना ||"
"मेरे लाल-लाडले बादल आन न जाने पाए,
तिल तिल कट मरना मेवाड़ी मान न जाने पाए |"

"ऐसा ही होगा काका राजपूती अमर रहेगी,
बादल की मिट्टी में भी गौरव की गंध रहेगी ||"
"तो फिर आ बेटा बादल सीने से तुझे लगा लू,
हो ना सके शायद अब मिलन अंतिम लाड लड़ा लू |"

यह कह बाँहों में भर कर बादल को गले लगाया,
धरती काँप गयी अम्बर का अंतस मन भर आया ||
सावधान कह पुनः पथ पर बढे गोरा सैनानी |
पूँछ लिया झट से बढ़कर के बूढी आँखों का पानी,
जिसके कारण मिट्टी भी चन्दन है राजस्थानी,
दोहराता हूँ सुनो रक्त से लिखी हुई क़ुरबानी ||
गोरा की चातुरी चली राणा के बंधन काटे,
छांट-छांट कर शाही पहरेदारो के सर काटे |
लिपट गए गोरा से राणा गलती पर पछताए,
सेना पति की नमक खलाली देख नयन भर आये ||
Gora and Badal - The Brave Uncle and Nephew Warriors of Mewar (Chittorgarh).
गोरा और बादल: काका-भतीजे की वो जोड़ी जिसने खिलजी के अहंकार को तोड़ दिया।

पर खिलजी का सेनापति पहले से ही शंकित था,
वह मेवाड़ी चट्टानी वीरों से आतंकित था |
जब उसने लिया समझ पद्मिनी नहीँ आयी है,
मेवाड़ी सेना खिलजी की मौत साथ लायी है ||
पहले से तैयार सैन्य दल को उसने ललकारा,
निकल पड़ा तिधि दल का बजने लगा नगाड़ा |
दृष्टि फिरि गोरा की राणा को समझाया,
रण मतवाले को रोका जबरन चित्तोड़ पठाया ||
राणा चले तभी शाही सेना लहराकर आयी,
खिलजी की लाखो नंगी तलवारें पड़ी दिखाई |
खिलजी ललकारा दुश्मन को भाग न जाने देना,
"रत्न सिंह का शीश काट कर ही वीरों दम लेना ||"
"टूट पदों मेवाड़ी शेरों बादल सिंह ललकारा"
हर-हर महादेव का गरजा नभ भेदी जयकारा |
निकल डोलियों से मेवाड़ी बिजली लगी चमकने,
काली का खप्पर भरने तलवारें लगी खटकने ||
राणा के पथ पर शाही सेना तनिक बढ़ा था,
पर उसपर तो गोरा हिमगिरि-सा अड़ा खड़ा था |
कहा ज़फर से," एक कदम भी आगे बढ़ न सकोगे,
यदि आदेश न माना तो कुत्ते की मौत मरोगे ||
"रत्न सिंह तो दूर ना उनकी छाया तुम्हे मिलेगी,
दिल्ली की भीषण सेना की होली अभी जलेगी |"

यह कह के महाकाल बन गोरा रण में हुंकारा,
लगा काटने शीश बही समर में रक्त की धारा ||
Mewar Rajput Army - Battle against Alauddin Khilji
खिलजी की असंख्य सेना से गोरा घिरे हुए थे,
लेकिन मानो वे रण में मृत्युंजय बने हुए थे |
पुण्य प्रकाशित होता है जैसे अग्रित पापों से,
फूल खिला रहता असंख्य काटों के संतापों से ||
वो मेवाड़ी शेर अकेला लाखों से लड़ता था,
बढ़ा जिस तरफ वीर उधर ही विजय मंत्र बढ़ता था |

इस भीषण रण से दहली थी दिल्ली की दीवारें,
गोरा से टकरा कर टूटी खिलजी की तलवारें ||
मगर क़यामत देख अंत में छल से काम लिया था,
गोरा की जंघा पर अरि ने छिप कर वार किया था |
वहीँ गिरे वीर वर गोरा जफ़र सामने आया,
शीश उतार दिया धोखा देकर मन में हर्षाया ||
मगर वाह रे मेवाड़ी ! गोरा का धड़ भी दौड़ा,
किया जफ़र पर वार की जैसे सर पर गिरा हतोड़ा |

एक बार में ही शाही सेना पति चीर दिया था,
जफ़र मोहम्मद को केवल धड़ ने निर्जीव किया था ||
ज्यों ही जफ़र कटा शाही सेना का साहस लरज़ा,
काका का धड़ लख बादल सिंह महारुद्र सा गरजा |
"अरे कायरो नीच बाँगड़ों छल में रण करते हो,
किस बुते पर जवान मर्द बनने का दम भरते हो"
यह कह कर बादल उस छन बिजली बन करके टुटा था ||
Pandit Narendra Mishra reciting Gora Badal Poem - Padmavati History Poet.
: इस अमर गाथा के रचयिता और ओज के कवि, पद्म श्री पंडित नरेंद्र मिश्र जी।
मानो धरती पर अम्बर से अग्नि शिरा छुटा था,
ज्वाला मुखी फहत हो जैसे दरिया हो तूफानी |
सदियों दोहराएंगी बादल की रण रंग कहानी ||
अरि का भाला लगा पेट में आंतें निकल पड़ी थी,
जख्मी बादल पर लाखों तलवारें खिंची खड़ी थी,
कसकर बाँध लिया आँतों को केशरिया पगड़ी से |
रण चक डिगा न वो प्रलयंकर सम्मुख मृत्यु खड़ी से,

अब बादल तूफ़ान बन गया शक्ति बनी फौलादी,
मानो खप्पर लेकर रण में लड़ती हो आजादी ||
उधर वीर-वर गोरा का धड़ आर्दाल काट रहा था,
और इधर बादल लाशों से भू-दल पात रहा था |

आगे पीछे दाएं बाएं जैम कर लड़ी लड़ाई,
उस दिन समर भूमि में लाखों बादल पड़े दिखाई |
|
मगर हुआ परिणाम वही की जो होना था,
उनको तो कण-कण अरियों के सोन तामे धोना था |
अपने सीमा में बादल शकुशल पहुच गए थे,
गारो बादल तिल-तिलकर रण में खेत गए थे ||
एक-एककर मिटे सभी मेवाड़ी वीर सिपाही,
रत्न सिंह पर लेकिन रंचक आँच न आने पायी |
गोरा बादल के शव पर भारत माता रोई थी,
उसने अपनी दो प्यारी ज्वलंत मनियां खोयी थी ||
धन्य धरा मेवाड़ धन्य गोरा बादल अभिमानी,
जिनके बल से रहा पद्मिनी का सतीत्व अभिमानी |
जिसके कारण मिट्टी भी चन्दन है राजस्थानी,
दोहराता हूँ सुनो रक्त से लिखी हुई क़ुरबानी ||

गोरा बादल कविता का भावार्थ (Meaning of Gora Badal Poem)

पंडित नरेंद्र मिश्र द्वारा रचित यह कविता चित्तौड़ के इतिहास के सबसे गौरवशाली अध्याय को दर्शाती है। यहाँ कविता का संक्षिप्त अर्थ प्रस्तुत है:

1. खिलजी का छल और चुनौती

कविता की शुरुआत अलाउद्दीन खिलजी के छल से होती है। उसने धोखे से चित्तौड़ के राजा रत्न सिंह को कैद कर लिया और शर्त रखी कि यदि रानी पद्मिनी को उसे नहीं सौंपा गया, तो वह राजा का शीश काट देगा। यह संदेश सुनकर पूरे मेवाड़ में शोक और क्रोध की लहर दौड़ गई।

2. गोरा का क्रोध और पद्मिनी की विनती

मेवाड़ के सेनापति गोरा, राजा से नाराज होकर वन में रह रहे थे। जब रानी पद्मिनी स्वयं उन्हें मनाने गईं और कहा कि "यदि आज मेवाड़ की आन मिट गई तो यह घाव कभी नहीं भरेगा," तब गोरा का क्रोध पिघल गया। उन्होंने रानी को वचन दिया कि जब तक गोरा जीवित है, राजा का शीश कोई नहीं काट सकता।

3. 700 डोलियों की रणनीति

गोरा और उनके भतीजे बादल ने एक अद्भुत योजना बनाई। उन्होंने खिलजी को संदेश भेजा कि रानी पद्मिनी अपनी 700 सखियों के साथ आ रही हैं। लेकिन असल में उन 700 डोलियों में रानी नहीं, बल्कि हथियारबंद राजपूत योद्धा बैठे थे। कहारों के वेष में भी सैनिक ही थे।

4. गोरा और बादल का बलिदान

दिल्ली पहुंचकर गोरा ने राजा रत्न सिंह को मुक्त कराया और उन्हें चित्तौड़ भेज दिया। इसके बाद भीषण युद्ध हुआ। गोरा ने खिलजी के सेनापति जफर को मार गिराया, लेकिन धोखे से उन पर वार किया गया। गोरा का शीश कटने के बाद भी उनका धड़ लड़ता रहा। दूसरी ओर, नन्हे बादल ने अपनी आँतें बाहर आने पर उन्हें पगड़ी से बांध लिया और अंतिम सांस तक दुश्मनों का संहार किया। इन वीरों के बलिदान से राजा रत्न सिंह सुरक्षित चित्तौड़ पहुँच सके।

गोरा और बादल का बलिदान हमें याद दिलाता है कि मातृभूमि की रक्षा से बढ़कर कोई धर्म नहीं है।

कविता PDF डाउनलोड करें

गोरा-बादल की इस वीर गाथा को अपने संग्रह में सुरक्षित रखें।

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Frequently Asked Questions (FAQ)

Gora Badal Kavita के रचयिता कौन हैं?

इस प्रसिद्ध कविता के रचयिता पंडित नरेंद्र मिश्र (Pandit Narendra Mishra) हैं। यह कविता उनकी ओजपूर्ण शैली का बेहतरीन उदाहरण है।

गोरा और बादल कौन थे? (Who were Gora and Badal)

गोरा और बादल मेवाड़ के राजपूत योद्धा थे। वे रिश्ते में काका-भतीजे थे। उन्होंने अपनी अद्भुत वीरता और बुद्धि से रावल रतन सिंह को खिलजी की कैद से छुड़ाया था।

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