पाश की कविता "समय कोई कुत्ता नहीं": मीडिया का पाखंड और 'सच' का विद्रोही घोषणापत्र
जब सत्ता निरंकुश हो जाती है, तो वह सबसे पहले दो चीज़ों को अपना गुलाम बनाना चाहती है—'सच' और 'समय'। यदि "युद्ध और शांति" में पाश ने हमें सत्ता के थोपे हुए शांति-पाठ से जगाया था, तो अपनी इस विस्फ़ोटक कविता "समय कोई कुत्ता नहीं" में वे सीधे मीडिया के प्रोपेगैंडा (Propaganda) और अंध-विचारधारा पर हमला करते हैं।
साहित्यशाला के मंच पर हम पाश के इस निडर रूप को समझने जा रहे हैं। यह कविता महज़ अखबारों (ट्रिब्यून, पंजाब केसरी) या रेडियो (A.I.R.) की आलोचना नहीं है, बल्कि यह एक बंदी क्रांतिकारी का उस पूरी व्यवस्था से सीधा सवाल है जो सोचती है कि वह समय को अपनी उँगलियों पर नचा सकती है। पाश यहाँ संसद की ज़हरीली मक्खियों को खुली चुनौती देते हुए कहते हैं कि सच किसी भी सरकारी रेडियो की 'रखैल' नहीं है, और न ही समय कोई पालतू कुत्ता है!
कविता का मूल पाठ: समय कोई कुत्ता नहीं
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स्रोत : पुस्तक: लहू है कि तब भी गाता है (पृष्ठ 157) | अनुवाद: चमनलाल
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मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक विश्लेषण: मीडिया का मायाजाल
इस कविता में पाश ने उस दौर के अखबारों (ट्रिब्यून, पंजाब केसरी, आर्गेनाइजर) का ज़िक्र किया है, जो पूँजीवादी (Finance) और राजनीतिक तंत्र के हाथों की कठपुतली बन गए थे। मीडिया जनता को असली मुद्दों से भटकाकर 'कलकत्ता' की जगह 'ढाका' (1971 के युद्ध के बाद का राष्ट्रवाद) की बातें कर रहा था। पाश पूछते हैं कि इन अखबारों की कतरनों से मुझे मत समझाओ; मुझे बस यह बताओ कि "ये चीलें किधर जा रही हैं? कौन मरा है?"—यानी इस व्यवस्था में किस ग़रीब का ख़ून बहा है?
अंध-भक्ति का विरोध: "माओ कौन है कहने वाला?"
पाश वामपंथी (नक्सल) विचारधारा से प्रभावित ज़रूर थे, लेकिन वे किसी की भी 'अंध-भक्ति' के ख़िलाफ़ थे। जब लोग उनसे कहते हैं कि "माओ (Mao Zedong) यह कहता है," तो पाश बेधड़क होकर पूछते हैं, "माओ कौन है कहने वाला?" पाश का मानना है कि कोई भी व्यक्ति या विचारधारा 'समय' (Time) और 'सच' से बड़ी नहीं हो सकती। यह विचार उन्हें एक कट्टरपंथी से अलग कर एक सच्चा और स्वतंत्र साहित्यकार बनाता है, जो केवल अपने ज़मीर की सुनता है।
कैद कौन है? एक अस्तित्ववादी सवाल (Existential Dilemma)
कविता का क्लाइमेक्स (Climax) जेल की सलाखों के पीछे से आता है। पाश हुकूमत से एक ऐसा मनोवैज्ञानिक सवाल पूछते हैं जो दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों जैसा पैना है:
- "सींखचों के भीतर मैं क़ैद हूँ, या सींखचों के बाहर यह सिपाही?"
पाश शारीरिक रूप से जेल में हैं, लेकिन उनके विचार आज़ाद हैं। जबकि जो सिपाही बाहर पहरा दे रहा है, वह असल में सत्ता के आदेशों, अपनी तनख्वाह और अपनी मानसिक गुलामी की जेल में क़ैद है। अंत में पाश ए.आई.आर. (All India Radio) पर सीधा हमला करते हैं, जो उस दौर में सरकारी प्रोपेगैंडा का इकलौता मुखपत्र था: "सच ए.आई.आर. की रखैल नहीं... समय कोई कुत्ता नहीं।"
निष्कर्ष: आज का 'A.I.R.' और आज की 'चीलें' कौन हैं?
पाश की यह कविता आज के फेक न्यूज़ (Fake News), पेड मीडिया (Paid Debates) और अंधभक्ति के दौर में एक खौफनाक आईना है। आज भी सत्ताएं 'समय को कुत्ते की तरह' बाँधना चाहती हैं। लेकिन पाश का संदेश स्पष्ट है—समय ख़ुद बात करता है, पल गूँगे नहीं होते। सलाखों के बाहर बैठा वह सिपाही (हम और आप) आज भी किसी न किसी व्यवस्था का गुलाम है।
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External Authoritative References
https://en.wikipedia.org/wiki/Pash, https://www.rekhta.org/poets/pash/poems, https://hindisamay.com/content/1155/1/
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. "समय कोई कुत्ता नहीं" का काव्यात्मक अर्थ क्या है?
कुत्ते को ज़ंजीर में बाँधकर मालिक अपनी मर्ज़ी से हाँक सकता है। पाश कहते हैं कि सत्ता चाहे जितना भी झूठ और प्रोपेगैंडा फैला ले, वह 'समय' (इतिहास) और 'सत्य' को ज़ंजीर में बाँधकर अपनी मर्ज़ी से नहीं चला सकती। समय अंततः सच बोल ही देता है।
2. पाश ने "माओ कौन है कहने वाला" लिखकर क्या स्पष्ट किया?
पाश वामपंथी थे, लेकिन वे बौद्धिक रूप से पूरी तरह स्वतंत्र थे। उन्होंने इस पंक्ति के ज़रिए यह स्पष्ट किया कि वे किसी भी नेता (यहाँ तक कि माओत्से तुंग) के अंधभक्त नहीं हैं। उनके लिए सत्य और वर्तमान परिस्थितियाँ किसी भी किताबी विचारधारा से बड़ी हैं।
3. "सींखचों के भीतर मैं क़ैद हूँ या बाहर यह सिपाही?" - ऐसा क्यों कहा गया है?
यह एक मनोवैज्ञानिक सवाल है। पाश का शरीर जेल की सलाखों के पीछे है, लेकिन उनकी चेतना स्वतंत्र है। जबकि सलाखों के बाहर खड़ा सिपाही आज़ाद दिखता है, लेकिन वह सत्ता के आदेशों और अपनी मानसिक गुलामी का असली क़ैदी है।