पाश की कविता "संसद": लोकतंत्र का भ्रम और ज़हरीली मक्खियों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
जब 12 पंक्तियों की कविता "संविधान" में पाश ने सत्ता की 'किताब' को मृत घोषित कर दिया था, तो यह सवाल उठना लाज़िमी था कि उस किताब को चलाने वाले लोग कौन हैं? "संसद" महज़ तीन पंक्तियों की एक कविता है, लेकिन यह भारतीय राजनीति के पूरे 'Illusion of Democracy' (लोकतंत्र के भ्रम) को एक ही झटके में तार-तार कर देती है।
साहित्यशाला के इस मंच पर हम "वक़्त आ गया है" जैसी कविताओं से चेतना को जगाने का प्रयास कर रहे हैं। इस दसवीं कविता में पाश हमें आगाह करते हैं कि जिसे हम 'जनता का दरबार' समझते हैं, वह असल में एक ऐसा खौफनाक 'छत्ता' है, जिसकी तरफ उँगली उठाने का सीधा मतलब है सत्ता के ज़हर का शिकार होना। पाश साबित करते हैं कि एक महान कवि को अपनी बात कहने के लिए पन्नों की नहीं, बस एक सटीक वार की ज़रूरत होती है।
कविता का मूल पाठ: संसद
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स्रोत : पुस्तक: लहू है कि तब भी गाता है (पृष्ठ 35) | अनुवाद: चमनलाल
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राजनीतिक व्यंग्य और 'छत्ते' का रूपक (Satirical & Economic Analysis)
साहित्य में 'Irony' (विडंबना) का इससे मारक और सटीक उदाहरण शायद ही कहीं मिले। इस 3-लाइन की कविता का पूरा मनोविज्ञान 'छत्ते' और 'मक्खी' के रूपक पर टिका है। एक मधुमक्खी का छत्ता क्या होता है? वह जगह जहाँ हज़ारों मक्खियाँ आस-पास के फूलों (जनता) का रस चूसकर एक जगह दौलत (शहद/Finance) इकट्ठा करती हैं।
"उँगली न करें": सत्ता का खौफ
लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है कि जनता अपने प्रतिनिधियों से सवाल पूछ सकती है (उनकी ओर उँगली उठा सकती है)। लेकिन पाश यहाँ एक कड़वा यथार्थ बताते हैं कि ये प्रतिनिधि अब 'सेवक' नहीं रहे, वे 'ज़हरीली मक्खियाँ' बन गए हैं। अगर आपने उनके 'शहद' (भ्रष्टाचार/सत्ता) की तरफ उँगली उठाने (सवाल पूछने) की कोशिश की, तो वे लोकतंत्र का लिहाज़ नहीं करेंगी, सीधे डंक मारेंगी।
यह बात अदम गोंडवी की ग़ज़ल 'काजू भुने प्लेट में रामराज' से सीधी जुड़ती है, जहाँ संसद के एसी कमरों में बैठ कर ग़रीबी के आँकड़े तय किए जाते हैं। जैसे दुष्यंत कुमार ने कहा था—"यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ," पाश उसी सूखी हुई नदी के ज़िम्मेदार लोगों को 'ज़हरीली मक्खी' घोषित करते हैं।
शब्द-चयन का मनोविज्ञान
पाश ने 'मधुमक्खी' नहीं, "ज़हरीली शहद की मक्खी" लिखा है। 'मधु' में एक मिठास और पवित्रता का भाव है, जबकि 'ज़हरीली शहद' यह दर्शाता है कि जो सत्ता और संसाधन इकट्ठा किए गए हैं, वे जनता के पसीने और खून से सने हैं। और "जिसे आप छत्ता समझते हैं" में 'आप' यानी भोली-भाली जनता है, जो हर पाँच साल बाद इन मक्खियों को अपना रस चूसने का लाइसेंस दे देती है।
निष्कर्ष: क्या हम आज भी उँगली उठाने से डरते हैं?
महज़ तीन पंक्तियों में पाश ने 'Representation' (प्रतिनिधित्व) की थ्योरी का जनाज़ा निकाल दिया है। आज के सोशल मीडिया के युग (Digital Sports/Debates) में जहाँ सत्ता से सवाल पूछना देशद्रोह मान लिया जाता है, वहाँ पाश की यह कविता एक चेतावनी है। सत्ता का छत्ता ज़हरीला हो चुका है, अब तय जनता को करना है कि वह डंक खाने के डर से पीछे हट जाएगी, या छत्ते को साफ़ करने का साहस जुटाएगी?
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External Authoritative References
https://en.wikipedia.org/wiki/Pash, https://www.rekhta.org/poets/pash/poems, https://hindisamay.com/content/1155/1/
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. पाश ने संसद को 'छत्ता' और नेताओं को 'ज़हरीली मक्खी' क्यों कहा है?
कवि का आशय है कि जैसे मक्खियाँ फूलों (जनता) का रस चूसकर छत्ते (संसद/सत्ता) में शहद (दौलत) जमा करती हैं, वैसे ही नेता जनता का शोषण कर रहे हैं। और जब जनता सवाल पूछती है, तो वे डंक (ज़हर) मारते हैं।
2. "उँगली न करें" पंक्ति में कौन सा राजनीतिक व्यंग्य छिपा है?
लोकतंत्र में जनता को सवाल पूछने (उँगली उठाने) का अधिकार होता है। लेकिन पाश व्यंग्य करते हैं कि आज का सिस्टम इतना तानाशाह हो गया है कि सवाल पूछने वालों को सीधे कुचल (डंक मार) दिया जाता है, इसलिए 'उँगली न करें' का खौफ फैलाया गया है।
3. तीन पंक्तियों की इस कविता का मुख्य दार्शनिक भाव क्या है?
इसका मुख्य भाव 'लोकतंत्र का भ्रम' (Illusion of Democracy) है। जिन्हें हम अपना 'प्रतिनिधि' चुनकर भेजते हैं, वे सत्ता में पहुँचते ही हमारे शोषक बन जाते हैं और जनता से कटकर एक ज़हरीला तंत्र बना लेते हैं।