पाश की कविता "संविधान": सोए हुए पशु और जागृत चेतना का दार्शनिक विद्रोह
जब एक राष्ट्र का सर्वोच्च दस्तावेज़ आम आदमी को न्याय देने में विफल हो जाए, तो वह महज़ कागज़ का एक निर्जीव पुलिंदा बन जाता है। यदि "हमारे समयों में" पाश ने सत्ता के खोखले परमाणु परीक्षणों पर सवाल उठाए थे, तो अपनी इस मारक कविता "संविधान" में वे सीधे उस 'पुस्तक' (व्यवस्था/संविधान) के मृत हो जाने की घोषणा करते हैं जो शोषित वर्ग के अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकती।
साहित्यशाला की इस पाश-शृंखला की यह आठवीं कविता हमें 'चेतना के जागरण' (Awakening of Consciousness) की कहानी सुनाती है। यह कविता हमें बताती है कि जब तक आम आदमी अज्ञानी (सोया हुआ पशु) था, तब तक व्यवस्था की यह किताब ज़िंदा थी। लेकिन जैसे ही उसने अपने अधिकार पहचाने और वह 'इंसान' बना, यह किताब उसके लिए मृत हो गई। यह कविता "हम लड़ेंगे साथी" वाले उसी जुझारू तेवर का बौद्धिक विस्तार है, जो हमें चेतावनी देती है कि अंधी आज्ञाकारिता हमें वापस 'सोया हुआ पशु' बना देगी।
कविता का मूल पाठ: संविधान
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स्रोत : पुस्तक: लहू है कि तब भी गाता है (पृष्ठ 109) | अनुवाद: चमनलाल
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मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक विश्लेषण (Political & Existential Context)
12 पंक्तियों की यह कविता दर्शनशास्त्र की सबसे बड़ी बहस—'State vs Individual Consciousness' (राज्य बनाम व्यक्तिगत चेतना) पर एक सीधा प्रहार है। पाश यहाँ किसी कागज़ी किताब का नहीं, बल्कि उस 'प्रजातांत्रिक भ्रम' (Democratic Illusion) का विरोध कर रहे हैं जिसे 1970 के दशक (विशेषकर आपातकाल/Emergency के दौर) में जनता पर थोपा गया था। जब शोषक तंत्र ही नियमों की किताब को अपनी ढाल बना ले, तो राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर आम नागरिक का ज़मीर मार दिया जाता है।
'सोया हुआ पशु' बनाम 'जागृत इंसान'
कविता का मनोवैज्ञानिक केंद्र 'चेतना' (Consciousness) है।
- पशु की अवस्था: जब तक इंसान अपने अधिकारों के प्रति अज्ञानी था (सोया हुआ था), सत्ता उसे पशुओं की तरह हाँकती थी। उस समय 'नियमों की किताब' सत्ता के बहुत काम आती थी।
- इंसान का जागरण: जैसे ही 'सपने देखने के लिए नींद की नज़र' देकर इंसान जागा, उसे समझ आ गया कि यह व्यवस्था उसके लिए नहीं है। "मेरे इंसान बनने तक यह पुस्तक मर चुकी थी।"
"पशु बन जाओगे" - एक वैचारिक चेतावनी
पाश की यह चेतावनी अदम गोंडवी की ग़ज़लों जितनी ही तीखी है। वे कहते हैं कि अगर आज के 'जागे हुए इंसान' ने फिर से इस भ्रष्ट और मृतप्राय व्यवस्था ("मर चुकी पुस्तक") को आँख बंद करके मान लिया, तो वह फिर से "सोया हुआ पशु" बन जाएगा। यह एक नागरिक की Critical Thinking (आलोचनात्मक सोच) को ज़िंदा रखने की अपील है। जो लोग आर्थिक और सामाजिक न्याय की माँग छोड़ देते हैं, वे अंततः व्यवस्था के मूक पशु बन जाते हैं।
निष्कर्ष: क्या आप 'जागे हुए इंसान' हैं?
पाश की यह कविता कोई कानूनी या संवैधानिक विमर्श नहीं है, बल्कि यह इंसान के ज़मीर का घोषणापत्र है। यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम महज़ नियमों का पालन करने वाले 'पशु' हैं, या अन्याय के खिलाफ सवाल उठाने वाले 'इंसान'? जैसे दुष्यंत कुमार ने कहा था—"गूँगे निकल पड़े हैं ज़बाँ की तलाश में," वैसे ही पाश की यह कविता उसी ज़बान को ज़िंदा रखने की जद्दोज़हद है।
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External Authoritative References
https://en.wikipedia.org/wiki/Pash, https://www.rekhta.org/poets/pash/poems, https://hindisamay.com/content/1155/1/
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. पाश ने किस 'पुस्तक' के मर जाने की बात कही है?
पाश ने यहाँ किसी विशिष्ट किताब का नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था और उसके 'संविधान' या 'नियमों की किताब' के मर जाने की बात कही है, जो शोषित वर्ग को न्याय देने में पूरी तरह विफल हो चुकी है।
2. "तो मैं एक पशु था" का मनोवैज्ञानिक अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों के प्रति पूर्ण अज्ञानता। जब इंसान अपने हक़ के लिए सवाल नहीं उठाता और व्यवस्था का अंधानुकरण करता है, तो वह बौद्धिक रूप से एक 'सोए हुए पशु' के समान होता है।
3. कविता के अंत में "इसे पढ़ोगे तो पशु बन जाओगे" क्यों कहा गया है?
कवि चेतावनी देता है कि जो व्यवस्था इंसानियत को कुचलकर बनी है, यदि आज का 'जागृत इंसान' उस सड़ी-गली व्यवस्था (मरी हुई पुस्तक) को फिर से स्वीकार कर लेगा, तो उसकी चेतना मर जाएगी और वह फिर से मूक पशु बन जाएगा।
पाश को सुनें और समझें (Video Analysis)
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