साहित्य क्या है? क्या यह केवल मनोरंजन है? या चाँद-तारों की बातें हैं?
अदम गोंडवी की यह गज़ल हिंदी शायरी का 'घोषणा-पत्र' (Manifesto) है। उन्होंने अपनी पिछली रचनाओं में देश की नीलामी और संसद के अपराधियों को बेनकाब किया। लेकिन इस गज़ल में वे लेखकों और शायरों को चुनौती दे रहे हैं कि वे अपनी कलम को 'मुफ़्लिसों की अंजुमन' (गरीबों की महफ़िल) तक लेकर चलें।
अगर आप मानते हैं कि साहित्य का काम केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि समाज से जवाबदेही माँगना है—तो यह गज़ल आपके लिए है। यह आपको थोड़ा असहज कर सकती है, लेकिन यही इसका उद्देश्य है।
आज साहित्यशाला (Sahityashala) पर हम पढ़ रहे हैं अदम गोंडवी की वह गज़ल जो 'जनवादी शायरी' (Progressive Poetry) की रीढ़ है।
या अदब को मुफ़्लिसों की अंजुमन तक ले चलो
उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो
पहले अपनी रहबरी को आचरन तक ले चलो
इस शहर को रोशनी के बाँकपन तक ले चलो
Hinglish Lyrics (Roman)
Ya adab ko muflison ki anjuman tak le chalo
Usko ab bewa ke maathe ki shikan tak le chalo
Pehle apni rahbari ko aacharan tak le chalo
Is shehar ko roshni ke baankpan tak le chalo
🔥 विश्लेषण: माशूक़ से बेवा तक (Literary Transition)
1. अदब का नया पता (New Address of Literature)
ग़ज़ल का पारंपरिक अर्थ होता है "औरतों से बातें करना" या "हुस्न-ओ-इश्क"। अदम गोंडवी ने इस परिभाषा को बदल दिया। वे कहते हैं, "भूख के एहसास को शेर-ओ-सुख़न तक ले चलो"। यानी, अगर आपकी शायरी में गरीब की भूख (Hunger) का ज़िक्र नहीं है, तो वह शायरी अधूरी है।
2. माशूक़ vs बेवा (The Ultimate Contrast)
दूसरा शेर हिंदी गज़ल के इतिहास का सबसे क्रांतिकारी शेर है:
उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो"
यहाँ 'माशूक़' (Beloved) रोमांस और सौंदर्य का प्रतीक है, जबकि 'बेवा की शिकन' (Widow's Wrinkles) समाज के क्रूर यथार्थ, दुख और संघर्ष का प्रतीक है। गोंडवी चाहते हैं कि साहित्यकार महलों से निकलकर विधवाओं और वंचितों के दर्द को लिखें। यह दलित चेतना का विस्तार है।
3. रहबरी और आचरण (Leadership & Conduct)
नेता अक्सर जनता को 'सब्र' (Patience) रखने की सलाह देते हैं। गोंडवी पलटकर कहते हैं—मुझे उपदेश मत दो, पहले अपने आचरण (Conduct) में वो 'त्याग' दिखाओ।
💡 विशेष टिप्पणी: यह शेर केवल राजनीतिक नेतृत्व नहीं, बल्कि धार्मिक उपदेशकों और साहित्यिक ‘आइवरी टॉवर’ (Ivory Tower) लेखकों पर भी लागू होता है। इससे कवि की चुनौती सार्वभौमिक (Universal) हो जाती है।
4. रोशनी का बाँकपन (Enlightenment)
अंतिम शेर में 'ग़ैर के धोखे में' ज़ख्मी होने का इशारा सांप्रदायिक दंगों या राजनीतिक बहकावे की तरफ है। गोंडवी शहर को 'रोशनी' (ज्ञान/जागरूकता) की तरफ ले जाने की बात करते हैं। यह वही रोशनी है जो अक़्ल के ताले खोल सकती है।
🎥 सुनें: मनोज बाजपेयी और अदम गोंडवी
इस वीडियो में मनोज बाजपेयी ने अदम गोंडवी की गज़लों को जिस शिद्दत से पढ़ा है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है।
निष्कर्ष (Verdict)
अदम गोंडवी की 'System Audit' सीरीज़ हमें सिखाती है कि नागरिक होना केवल वोट देना नहीं, बल्कि सवाल पूछना है। चाहे वह राजनीति हो, धर्म हो, या साहित्य—हर जगह जवाबदेही ज़रूरी है।
पूरी सीरीज़ यहाँ पढ़ें:
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
'बेवा के माथे की शिकन' का क्या अर्थ है?
यह एक शक्तिशाली रूपक है। इसका अर्थ है समाज का दुख, पीड़ा और संघर्ष। कवि कहता है कि शायरी को केवल सुंदरता (माशूक़) तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे विधवाओं और पीड़ितों के दर्द को भी बयां करना चाहिए।
अदम गोंडवी की शायरी को 'जनवादी' क्यों कहा जाता है?
क्योंकि उन्होंने अपनी शायरी में महलों और राजाओं की नहीं, बल्कि आम आदमी, किसान, मजदूर और शोषित वर्ग (मुफ़्लिसों की अंजुमन) की बात की है।