हिंदी शायरी में दुष्यंत कुमार ने अगर सत्ता के खिलाफ़ राजनीति की सड़कों पर नारे लगाए, तो अदम गोंडवी (Adam Gondvi) ने उस संसद के भीतर घुसकर माइक छीनने का काम किया। यह महज़ गज़ल नहीं है; यह भारतीय लोकतंत्र के सड़े हुए सिस्टम का पोस्टमॉर्टम है।
जब हम आज के दौर में आर्थिक असमानता (Economic Inequality) और हबीब जालिब जैसे शायरों की बगावत को याद करते हैं, तो अदम गोंडवी की यह गज़ल—"जितने हरामख़ोर थे क़ुर्बो-जवार में"—सबसे प्रासंगिक दस्तावेज बनकर उभरती है।
आइए, साहित्यशाला (Sahityashala) के इस विशेष 'Literary Audit' में समझते हैं कि कैसे एक शायर ने 'हरामख़ोर' जैसे शब्द को साहित्य में जगह देकर शिष्टाचार की फर्जी दीवारों को ढहा दिया।
परधान बनके आ गए अगली क़तार में
वे चौधरी बने हैं उमर के उतार में
जो भी ज़मीन ख़ाली पड़ी थी कछार में
ये रोटी का टुकड़ा है मियादी बुख़ार में
समझो कोई ग़रीब फँसा है शिकार में
Hinglish Lyrics (Roman)
Pardhan banke aa gaye agli qatar mein
Ve chaudhary bane hain umar ke utaar mein
Jo bhi zameen khaali padi thi kachhaar mein
Ye roti ka tukda hai miyadi bukhar mein
Samjho koi gareeb phansa hai shikaar mein
🔥 विश्लेषण: व्यवस्था का नग्न सत्य (The Naked Truth)
1. लोकतंत्र का अपराधीकरण (Criminalization of Politics)
अदम गोंडवी की भाषा में लाग-लपेट नहीं है। पहले दो शेरों में वे सीधा हमला करते हैं। "दीवार फाँदने" का रिकॉर्ड रखने वाले (यानी चोर/अपराधी) जब "चौधरी" (सम्मानित नेता) बन जाते हैं, तो यह केवल व्यंग्य नहीं रहता, बल्कि कमीशनखोर व्यवस्था का सच बन जाता है।
यह वही दर्द है जो पाकिस्तान में हबीब जालिब की शायरी में दिखता है, जहाँ हुक्मरान अवाम की छाती पर मूंग दलते हैं।
2. आर्थिक छलावा (The Economic Illusion)
चौथा शेर—"बंजर ज़मीन पट्टे में जो दे रहे हैं आप"—सरकारी योजनाओं की असलियत खोलता है। वित्त (Finance) की भाषा में इसे 'Non-Performing Asset' (NPA) कहा जाएगा, लेकिन गोंडवी इसे 'मियादी बुख़ार में रोटी का टुकड़ा' कहते हैं।
जैसे टाइफाइड (Typhoid) में रोटी हजम नहीं होती और उल्टा नुकसान करती है, वैसे ही सरकार द्वारा दी गई ऐसी मदद (बंजर ज़मीन) गरीब का पेट नहीं भरती, बल्कि उसे कर्ज और उम्मीद के जानलेवा चक्र में फँसा देती है। यह तुलना शहर की भुखमरी और खुद्दारी के अंतर्विरोध को दर्शाती है।
3. धर्म और पाखंड (Religion vs. Hypocrisy)
अंतिम शेर में अदम गोंडवी ने धर्म की आड़ में छिपे शिकारी को पहचाना है।
"जब दस मिनट की पूजा में घंटों गुज़ार दें
समझो कोई ग़रीब फँसा है शिकार में"
यह शेर आज के दौर में, जहाँ धर्म का राजनीतिकरण चरम पर है, बेहद डरावना लगता है। जहाँ महात्मा गांधी के लिए धर्म एक नैतिक बल था, वहीं गोंडवी दिखाते हैं कि कैसे वही धर्म अब 'शिकार' का औजार बन गया है। (और पढ़ें: राम: एक आधुनिक विश्लेषण)।
🎥 देखें: मनोज बाजपेयी की आवाज़ में (Viral Recitation)
इस गज़ल की ताक़त को अगर आवाज़ मिल सकती है, तो वह अभिनेता मनोज बाजपेयी की ही हो सकती है। उनके द्वारा किया गया यह पाठ (Recitation) सोशल मीडिया पर आग की तरह फैला था।
निष्कर्ष (Verdict)
अदम गोंडवी की यह गज़ल महज़ शब्दों का खेल नहीं है। यह उस भारत का आईना है जो 'शाइनिंग इंडिया' के पोस्टरों के पीछे सिसक रहा है। अगर आप साहित्य को ग्लोबल परिप्रेक्ष्य (English Lit) में भी देखें, तो ऐसी बेबाकी दुर्लभ है।
साहित्यशाला पर हम ऐसे ही बेधड़क साहित्य को ज़िंदा रखते हैं। क्या आपको लगता है कि आज के दौर में कोई शायर इतनी हिम्मत दिखा सकता है? कमेंट में बताएं।
संदर्भ: Hindwi, Kavita Kosh, Wikipedia.
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
'मियादी बुख़ार' का इस गज़ल में क्या अर्थ है?
मियादी बुख़ार (Typhoid) यहाँ एक रूपक है। शायर कहता है कि जैसे बुखार में खाना नहीं पचता, वैसे ही बीमार (गरीब) जनता को बंजर ज़मीन देने का कोई फायदा नहीं है। यह सरकारी योजनाओं की विफलता को दर्शाता है।
अदम गोंडवी किस विचारधारा के कवि थे?
अदम गोंडवी जनवादी और प्रगतिशील विचारधारा के कवि थे। उनकी शायरी दलितों, शोषितों और मजदूरों की आवाज़ थी जो सत्ता और व्यवस्था को सीधे चुनौती देती थी।