खुद्दार मेरे शहर का फाँकों से मर गया
(Khuddar Mere Shehar Ka: A Political Satire)
साहित्य समाज का दर्पण होता है। प्रस्तुत पंक्तियाँ आज के दौर की उस कड़वी सच्चाई को बयां करती हैं जहाँ एक तरफ धर्म के नाम पर लाखों खर्च किए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ इंसान भूख और ठंड से मर जाता है। यह राजनीतिक व्यंग्य (Political Satire) व्यवस्था के मुंह पर एक तमाचा है।
मूल ग़ज़ल (Original Lyrics)
खुद्दार मेरे शहर का फाँकों से मर गया
राशन जो आ रहा था वो अफ़सर के घर गया॥
चढ़ती रही मज़ार पे चादर तो बेशुमार
बाहर जो एक फ़क़ीर था सर्दी से मर गया॥
रोटी अमीर-ए-शहर के कुत्तों ने छीन ली
फ़ाका गरीब-ए-शहर के बच्चों में बँट गया॥
चेहरा बता रहा था की मारा है भूख ने
हाकिम ने कह दिया के कुछ खा के मर गया॥
भावार्थ एवं विश्लेषण (Meaning & Analysis)
1. भ्रष्टाचार पर चोट:
पहली पंक्ति में शायर कहता है कि शहर का स्वाभिमानी (खुद्दार) व्यक्ति भूख (फाँकों) से मर गया, क्योंकि गरीबों के हिस्से का राशन सरकारी अफसरों ने अपने घरों में भर लिया। यह पंक्ति Public Distribution System (PDS) में होने वाले भ्रष्टाचार को उजागर करती है।
2. धार्मिक आडंबर:
"चढ़ती रही मज़ार पे चादर तो बेशुमार..."
यह शेर हमारे समाज के खोखलेपन को दिखाता है। हम पत्थर की मूर्तियों या मज़ारों पर तो लाखों की चादरें और दूध चढ़ाते हैं, लेकिन उसी धार्मिक स्थल के बाहर बैठा जीवित इंसान ठंड से ठिठुर कर मर जाता है। यहाँ 'मज़ार' और 'फ़क़ीर' का विरोधाभास अद्भुत है।
3. अमीरी और गरीबी की खाई:
अमीरों के पालतू कुत्ते भी राजसी भोजन करते हैं, जबकि गरीब के बच्चे 'फ़ाका' (भूख) आपस में बांटने को मजबूर हैं। यह गरीबी (Poverty) की सबसे क्रूर तस्वीर है।
4. सत्ता की क्रूरता:
अंतिम शेर में 'हाकिम' (शासक/डॉक्टर) की संवेदनहीनता है। भूख से मरने वाले की मौत को भी सरकारी फाइलों में 'फूड पॉइजनिंग' या अन्य कारण बताकर रफा-दफा कर दिया जाता है, ताकि सरकार की बदनामी न हो।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q: इस शायरी का मुख्य संदेश क्या है?
A: यह शायरी समाज की संवेदनहीनता और सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार पर प्रहार करती है।