इस लेख में (Table of Contents):
चुनावी 'विकास' का भ्रम और कड़वी सच्चाई
क्या आपने कभी गौर किया है? वोटिंग के ठीक कुछ हफ्ते पहले अचानक सड़कें चमकने लगती हैं, गड्ढे गायब हो जाते हैं, और नेता जी 'सेवक' बनकर आपके द्वार पर खड़े हो जाते हैं। यह तमाशा भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में उतना ही पुराना है जितना कि भारत सरकार (Government of India) का चुनावी ढांचा।
भले ही National Portal of India पर सुशासन के बड़े-बड़े दावे किए जाएं, लेकिन जमीनी हकीकत अक्सर 'अस्थायी प्रेम' और 'स्थायी उपेक्षा' की कहानी कहती है।
अपनी इस तीखी व्यंग्यात्मक कविता 'चुनाव' (Chunav) में, कवि हर्ष नाथ झा उसी 'राजनीति' (Rajneeti) के नाटक का पर्दाफाश करते हैं। यह वही हताशा है जो हम दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति की कड़वी सच्चाई (Harsh Reality) में भी देखते हैं। सवाल बस एक है: क्या यह विकास है, या सिर्फ एक चुनावी जाल?
चुनाव - Chunav
सड़कों पर लाइटें, गलियाँ तैयार
बिजली आ रही, पूरा दिन यार
किसको हमसे इतना प्यार?
प्यार नहीं, चुनाव है यार!
झूठे वादों के ये दावे
हम सब अब लिखते जाएँगे
इस पार्टी से उस पार्टी तक
नेता सब बिकते जाएँगे।
ये है जाति, वो है जाति
हम ने बहुत दुख झेलें हैं
जनता ने जब इनको जिताया
धोखेबाज़ों के अब मेले हैं।
हैं अब सबकी जातियाँ
हैं अब सबके धर्म
कष्ट देते जनता को ये
यही हैं इनके कर्म |
जाति धर्म पर बाँटतें हैं ये
यही है इनका मर्म
५ साल फिर होंगे गायब
झूठे इनके कर्म।
कुछ कहते हैं, काम किया है
कुछ कहते बदनाम किया है
कुछ कहते हत्यारें हैं ये
कुछ कहते गुमनाम किया है।
कुछ कहते यें, कुछ कहते वो
कहने का तो काम किया है
है जुर्म, शोषण, गरीबी अब भी
लाजवाब जी काम किया है।
जाम, दाम और...काम पर
अब वोट खरीदें जाएँगे
दाल गलाने सब नेतागण
अब जनता के घर आएँगे |
सड़कों पर लाइटें, गलियाँ तैयार
बिजली आ रही, पूरा दिन यार
किसको हमसे इतना प्यार?
प्यार नहीं, चुनाव है यार!
कविता का मर्म: राजनीतिक व्यंग्य की डिकोडिंग
१. जाति और पहचान का खेल (Identity Politics)
यह कविता भारतीय चुनावों की सबसे कमजोर नस पर चोट करती है—जातिगत राजनीति। कवि की पंक्तियाँ "ये है जाति, वो है जाति" उस व्यवस्था को उजागर करती हैं जहाँ नीतियाँ ध्रुवीकरण के पीछे छिप जाती हैं। यह संकट केवल आम चुनावों तक सीमित नहीं है, बल्कि उच्च शिक्षा में भी यूजीसी (UGC) के समानता नियम और जातिगत राजनीति के संकट के रूप में दिखाई देता है।
२. नेताओं का 'गायब' हो जाना
हर्ष नाथ झा लिखते हैं, "५ साल फिर होंगे गायब"। यह विश्वासघात की भावना हमें क्रांतिकारी कवियों की याद दिलाती है। यह ठीक वैसा ही आक्रोश है जो हबीब जालिब की नज़्म "हुक्मरान हो गए कमीने लोग" में दिखता है, जहाँ कवि भ्रष्ट शासकों की पवित्रता को तार-तार कर देता है।
भले ही केंद्रीय मंत्रिपरिषद (Union Council of Ministers) के पास आधिकारिक जिम्मेदारियाँ होती हैं, लेकिन कविता बताती है कि आम आदमी के लिए मंत्री जी केवल पोस्टरों में दिखते हैं, काम में नहीं।
३. गांधी से लेकर आज की 'राजनीति' तक
हम महात्मा गांधी पर लिखी कविताओं में वर्णित निस्वार्थ सेवा के आदर्शों से बहुत दूर आ चुके हैं। आज स्थिति यह है कि "जाम और दाम पर वोट खरीदे जाते हैं"। मूल्यों का यह पतन एक ऐसा अंधेरा परिदृश्य बनाता है जो मानसिक रूप से थका देने वाला है—एक ऐसा विषय जिसे आधुनिक और तीखी शायरी में, जैसे अभि मुंडे (Psycho Shayar) की "राम" कविता में गहराई से उकेरा गया है।
४. शहरी चकाचौंध का धोखा
कविता की शुरुआती पंक्तियाँ—"सड़कों पर लाइटें, गलियाँ तैयार"—शहरी विकास के खोखलेपन को दर्शाती हैं। चकाचौंध के पीछे शहर की आत्मा संघर्ष कर रही है, बिल्कुल वैसे ही जैसे "सुना था कि बेहद सुनहरी है दिल्ली" में दिल्ली के दोहरे चरित्र का वर्णन किया गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न: 'राजनीति पर कविता' का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: यह कविता मतदाताओं के लिए एक चेतावनी है। यह हमें सिखाती है कि चुनाव से ठीक पहले मिलने वाले अस्थायी लाभों (जैसे मुफ्त बिजली या नई सड़क) से प्रभावित न हों और अपना वोट सोच-समझकर दें।
प्रश्न: क्या यह कविता हबीब जालिब के दर्शन से मेल खाती है?
उत्तर: बिल्कुल। हर्ष नाथ झा और हबीब जालिब, दोनों ही सत्ता के अहंकार के खिलाफ लिखते हैं। आप यहाँ हबीब जालिब के काव्य और प्रतिरोध के दर्शन के बारे में विस्तार से पढ़ सकते हैं।
प्रश्न: क्या यह कविता छात्र चुनावों (Student Elections) पर भी लागू होती है?
उत्तर: हाँ, "वोट खरीदने" और झूठे वादों की जो संस्कृति राष्ट्रीय राजनीति में है, वही विश्वविद्यालय के चुनावों में भी देखने को मिलती है।
निष्कर्ष: ५ दिन का जश्न या ५ साल का दर्द?
जैसे ही चुनाव प्रचार की धूल थमती है, सड़कों की लाइटें फिर से मद्धम हो सकती हैं, लेकिन इस कविता के शब्द सच्चाई की एक जलती हुई मशाल बनकर रह जाते हैं। लोकतंत्र के लिए राजनीति जरूरी है, लेकिन जीवित रहने के लिए जागरूकता जरूरी है।
चाहे आप भारत की राजनीति का विश्लेषण कर रहे हों या साहित्यशाला (Sahityashala) पर आधुनिक हिंदी कविताएँ पढ़ रहे हों, संदेश स्पष्ट है।
"क्या अगली बार आप 'प्यार' के धोखे में आएंगे, या 'अधिकार' के लिए सवाल उठाएंगे?"
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