ज़िंदगी की हकीकत और वक्त के बदलाव को जितनी खूबसूरती से सूफी शायरों ने बयां किया है, शायद ही किसी और ने किया हो। बाबा बुल्लेशाह (Baba Bulleh Shah) की कलम से निकली यह रचना—"चढ़दे सूरज ढलदे देखे"—सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि जीवन का एक ऐसा फलसफा है जो इंसान को फर्श से अर्श और अर्श से फर्श तक के सफर की याद दिलाता है।
अक्सर जब हम तनम फरसूदा जां पारा (Tanam Farsooda) जैसी रूहानी रचनाओं को सुनते हैं, तो हमें अहसास होता है कि इंसान का गुरूर कितना क्षणभंगुर है। बुल्लेशाह का यह कलाम हमें सिखाता है कि वक्त बदलते देर नहीं लगती। जिस तरह नुसरत फतेह अली खान साहब ने तुम्हें दिल्लगी भूल जानी पड़ेगी गाकर इश्क़ और इबादत का फर्क समझाया, उसी तरह यह कलाम हमें 'शुक्र' (Gratitude) का पाठ पढ़ाता है।
इस लेख में हम इस कालजयी रचना के हिंदी बोल (Lyrics), उसके गूढ़ अर्थ और शब्दार्थ को विस्तार से समझेंगे।
बाबा बुल्लेशाह: एक संक्षिप्त परिचय
बुल्लेशाह 17वीं शताब्दी के एक महान पंजाबी सूफी कवि थे। उनकी रचनाएं ईश्वर से प्रेम और इंसानियत का संदेश देती हैं। अधिक जानकारी के लिए आप Wikipedia पर बुल्लेशाह या Hindwi.org पर उनका प्रोफाइल पढ़ सकते हैं।
चढ़दे सूरज ढलदे देखे - Lyrics in Hindi
"चढ़दे सूरज ढलदे देखे,
बुझदे दीवे बलदे देखे।
हीरे दा कोई मुल ना जाणे,
खोटे सिक्के चलदे देखे।
जिना दा न जग ते कोई,
ओ वी पुतर पलदे देखे।
उसदी रहमत दे नाल बंदे,
पाणी उत्ते चलदे देखे!
लोकी कैंदे दाल नइ गलदी,
मैं ते पथर गलदे देखे।
जिन्हा ने कदर ना कीती रब दी,
हथ खाली ओ मलदे देखे।
कई पैरां तो नंगे फिरदे,
सिर ते लभदे छावां।
मैनु दाता सब कुछ दित्ता,
क्यों ना शुकर मनावां!"
क्या आप जानते हैं? सूफी संगीत में 'इश्क़-ए-हकीकी' का बहुत महत्व है। अगर आप रूहानी सुकून चाहते हैं, तो मस्त नज़रों से अल्लाह बचाए और चरखा (Charkha) के गहरे अर्थ भी जरूर पढ़ें।
भावार्थ और व्याख्या (Meaning in Hindi)
यह गीत केवल शब्दों का मेल नहीं, बल्कि जीवन की अनिश्चितता का दस्तावेज है। यहाँ समय के चक्र को बहुत ही संजीदगी से समझाया गया है।
1. समय का चक्र (चढ़दे सूरज ढलदे देखे)
बुल्लेशाह कहते हैं कि मैंने उगते हुए सूरज को भी ढलते देखा है। यानी जो आज अर्श (आसमान) पर है, उसे अपने पद या दौलत पर घमंड नहीं करना चाहिए। दूसरी तरफ, 'बुझदे दीवे बलदे देखे' का अर्थ है कि जहाँ उम्मीद खत्म हो चुकी हो, ईश्वर की कृपा से वहाँ भी रोशनी हो सकती है। यह बिल्कुल वैसे ही है जैसे सादगी तो हमारी ज़रा देखिए में सादगी और समर्पण की बात की गई है।
2. दुनिया की रीत और खोटे सिक्के
दुनिया अक्सर हुनर की कद्र नहीं करती। गुणी लोग (हीरे) पहचाने नहीं जाते, जबकि दिखावा करने वाले (खोटे सिक्के) समाज में चल जाते हैं। आज के दौर में यह बात उतनी ही सच है जितनी सोचता हूँ वो कितने मासूम थे की पंक्तियों में छिपी सच्चाई।
3. कृतज्ञता (शुकर मनावां)
अंत में, कवि अपनी तुलना उन लोगों से करता है जो नंगे पैर हैं और जिनके सिर पर छत नहीं है। वह कहता है कि हे दाता, तूने मुझे सब कुछ दिया है, तो मैं तेरा शुक्र क्यों न मनाऊं? हमें मेरे रश्क-ए-क़मर की तरह दूसरों से जलने के बजाय अपनी नेमतों पर गौर करना चाहिए।
जीवन में कई बार ऐसा भी होता है जब हमारे अपने हमें दुख देते हैं, जिसका ज़िक्र ज़िक्र एक बेवफ़ा और सितमगर का था में बखूबी किया गया है। लेकिन बुल्लेशाह का यह कलाम हमें उन दुखों से ऊपर उठकर ईश्वरीय सत्ता पर भरोसा करना सिखाता है।
कठिन शब्दों के अर्थ (Punjabi to Hindi)
| शब्द (पंजाबी) | हिंदी अर्थ |
|---|---|
| चढ़दे | उगते हुए / उदित होते हुए |
| मुल | मूल्य / कीमत |
| दाल नइ गलदी | काम न बनना / सफल न होना |
| लभदे | ढूंढते हुए |
| कीती | की / करना |
नोट: मूल पंजाबी रचनाओं को गहराई से समझने के लिए आप Punjabi-Kavita.com का सन्दर्भ ले सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. 'चढ़दे सूरज ढलदे देखे' गीत के रचयिता कौन हैं?
यह प्रसिद्ध कलाम महान सूफी संत और कवि बाबा बुल्लेशाह द्वारा लिखा गया है।
2. 'बुझदे दीवे बलदे देखे' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि जहाँ कोई आशा नहीं बची होती, ईश्वर की कृपा से वहाँ भी जीवन और प्रकाश लौट सकता है। यह उम्मीद न खोने का संदेश है।
3. यह गीत किस शैली में गाया जाता है?
यह मुख्य रूप से कव्वाली शैली में गाया जाता है और इसे अजीज नाज़ा (Aziz Naza) और साबरी ब्रदर्स जैसे दिग्गजों ने अपनी आवाज़ दी है।
निष्कर्ष
बाबा बुल्लेशाह की यह रचना हमें अहंकार त्यागने और परमात्मा की रज़ा में राज़ी रहने का सबक देती है। चाहे हालात कितने भी बुरे क्यों न हों, 'चढ़दे सूरज' का ढलना और 'बुझते दीयों' का जलना यह साबित करता है कि परिवर्तन ही संसार का नियम है। साहित्यशाला (Sahityashala) पर ऐसी ही और नायाब रचनाओं के लिए हमारे साथ जुड़े रहें।