पाश की कविता "वक़्त आ गया है": 'मच्छरदानी' का आराम और वैचारिक क्रांति का उद्घोष
जब एक विद्रोही यह समझ लेता है कि सिस्टम की 'किताब' (संविधान) मर चुकी है, तो उसके बाद वह क्या करता है? वह अपने भीतर झाँकता है। पाश की कविता "वक़्त आ गया है" बाहर की सत्ता से लड़ने से पहले, अपने घर, अपने रिश्तों और अपने 'कम्फर्ट ज़ोन' (Comfort Zone) से लड़ने का आह्वान है। यह कविता उन बौद्धिक लोगों (Intellectuals) पर एक मनोवैज्ञानिक चोट है, जो महफूज़ कमरों में बैठकर क्रांति की बातें करते हैं।
साहित्यशाला के मंच पर हमने "हम लड़ेंगे साथी" का शोर सुना है, लेकिन यह कविता उस लड़ाई की पहली और सबसे कठोर शर्त तय करती है—कि वैचारिक लड़ाइयाँ "मच्छरदानी से बाहर निकलकर" ही लड़ी जा सकती हैं। पाश यहाँ पितृसत्ता (Patriarchy), थोपे गए रिश्तों और जैविक (Biological) परिवारों से परे एक नए 'वैचारिक परिवार' के निर्माण की घोषणा करते हैं।
कविता का मूल पाठ: वक़्त आ गया है
▶ पूर्ण देवनागरी कविता (यहाँ क्लिक करें)
स्रोत : पुस्तक: लहू है कि तब भी गाता है (पृष्ठ 154) | अनुवाद: चमनलाल
▶ Hinglish Transliteration (Click to read)
मनोवैज्ञानिक और सामाजिक विखंडन (Sociological & Psychological Analysis)
इस कविता में पाश ने जो बिंब इस्तेमाल किए हैं, वे आधुनिक 'Hypocrisy' (पाखंड) को तार-तार कर देते हैं। "मच्छरदानी से बाहर निकलकर लड़ना" एक गहरा रूपक (Metaphor) है। मच्छरदानी हमें बाहरी मच्छरों (खतरों) से बचाती है और एक सुरक्षित 'कम्फर्ट ज़ोन' देती है। पाश उन बुद्धिजीवियों पर तंज कस रहे हैं जो सुरक्षित कमरों में बैठकर आर्थिक और सामाजिक क्रांति के लेख लिखते हैं, लेकिन ज़मीन पर उतरकर संघर्ष की 'शर्म' या दर्द नहीं झेलना चाहते।
पितृसत्ता पर प्रहार और "लहू के रिश्ते का व्याकरण"
कविता का सबसे विद्रोही हिस्सा वह है जहाँ पाश कहते हैं—"उस लड़की को / जो प्रेमिका बनने से पहले ही / पत्नी बन गई, बहन कह दें"। यहाँ पाश भारतीय समाज के उस थोपे गए विवाह (Arranged Marriage) तंत्र को नकारते हैं जहाँ एक औरत को बिना 'प्रेम' (Choice) के सीधे 'पत्नी' (Property/Duty) बना दिया जाता है। वे कहते हैं कि इस झूठे रिश्ते को ढोने से बेहतर है उसे आज़ाद कर 'बहन' मान लेना।
इसके साथ ही वे "लहू के रिश्ते का व्याकरण" बदलने की बात करते हैं। कार्ल मार्क्स और लेनिन की तरह, पाश भी मानते हैं कि आपका असली परिवार वह नहीं जिसका खून आपकी रगों में है, बल्कि वह है जो आपके विचारों (Ideology) और संघर्ष में आपके साथ है। अदम गोंडवी की तरह पाश भी ज़मीनी हकीकत को पहचान कर 'मित्रों की नई पहचान' करने की सलाह देते हैं।
ख़ुद जलने का अस्तित्ववादी दर्शन
कविता का अंत रोंगटे खड़े कर देने वाला है: "सूर्य को बदनामी से बचाने के लिए... रात-भर ख़ुद जलें।" यहाँ सूर्य 'क्रांति', 'सच्चाई' या 'उम्मीद' का प्रतीक है। जब समाज में चारों तरफ अँधेरा (तानाशाही) हो, और लोग कहने लगें कि 'अब कोई सूरज नहीं निकलेगा' (सूर्य की बदनामी), तब एक क्रांतिकारी को जुगनू या मोमबत्ती बनकर ख़ुद को जलाना पड़ता है, ताकि सुबह होने तक उम्मीद ज़िंदा रहे। यह विचार दुष्यंत कुमार के "एक कंठ विषपायी" या उनके मशहूर शेर—"सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं" के समानांतर खड़ा होता है।
निष्कर्ष: क्या आप 'मच्छरदानी' से बाहर आने को तैयार हैं?
पाश की यह कविता हमें आईना दिखाती है। आज के सोशल मीडिया (Social Media / Sports) के दौर में जहाँ हर कोई 'आर्मचेयर विद्रोही' बन गया है, पाश चुनौती देते हैं कि असली लड़ाई सड़क पर उतरकर (मच्छरदानी से बाहर) लड़ी जाती है। क्या हम अपने 'लहू के रिश्तों' (जाति, धर्म, परिवार) की संकीर्णता से ऊपर उठकर इंसानों की नई पहचान करने का साहस रखते हैं?
ऐसी ही बौद्धिक और आत्मा को झकझोरने वाली कविताओं के लिए Sahityashala.in और हमारे English Poems तथा Maithili Poems प्रभागों के साथ निरंतर बने रहें।
External Authoritative References
https://en.wikipedia.org/wiki/Pash, https://www.rekhta.org/poets/pash/poems, https://hindisamay.com/content/1155/1/
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. पाश ने "मच्छरदानी से बाहर निकलकर" लड़ने की बात क्यों कही है?
'मच्छरदानी' यहाँ हमारे सुरक्षित 'कम्फर्ट ज़ोन' या बौद्धिक विलासिता का प्रतीक है। पाश कहते हैं कि असली वैचारिक क्रांति कमरों में बैठकर या केवल बातें करके नहीं होती, उसके लिए ज़मीन पर उतरकर असली खतरे और 'शर्म' झेलने पड़ते हैं।
2. "लहू के रिश्ते का व्याकरण बदलें" का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि हमें केवल खून (जैविक/Biological) के रिश्तों को ही अपना परिवार मानना छोड़ देना चाहिए। हमें उन लोगों को अपना सच्चा 'मित्र' और परिवार बनाना चाहिए जो हमारे विचारों और संघर्षों में हमारे साथ खड़े हैं (Ideological kinship)।
3. कविता में 'सूर्य को बदनामी से बचाने' के लिए ख़ुद जलने का क्या संदेश है?
सूर्य यहाँ 'उम्मीद' और 'सत्य' का प्रतीक है। जब अन्याय का अँधेरा छा जाए और लोग उम्मीद हारने लगें (सूर्य की बदनामी), तब एक व्यक्ति को ख़ुद मोमबत्ती की तरह जलकर (बलिदान देकर) उस सत्य और रोशनी को ज़िंदा रखना पड़ता है।
पाश को सुनें और समझें (Video Analysis)
Explore the profound sociological depth of Pash's poetry on YouTube