पाश की कविता "हम लड़ेंगे साथी": वर्ग-संघर्ष और मानवीय अस्तित्व का अंतिम घोषणापत्र
यदि "यदि देश की सुरक्षा यही होती है" में पाश ने सत्ता के छद्म राष्ट्रवाद पर प्रहार किया था, तो यह कविता उस प्रहार से उपजी हुई सीधी जंग का ऐलान है। अवतार सिंह संधू 'पाश' की कविता "हम लड़ेंगे साथी" केवल एक राजनीतिक नारा नहीं है, बल्कि यह एक दार्शनिक उद्घोष है कि 'संघर्ष' ही मनुष्य के ज़िंदा होने का एकमात्र प्रमाण है।
साहित्यशाला के मंच पर हम देख चुके हैं कि सपने देखने के लिए नींद की नज़र देना लाज़िमी है, और एक क्रांतिकारी को अपने निजी प्रेम से विदा लेनी पड़ती है। यह कविता उसी बलिदान का अगला चरण है। जब सब कुछ छिन जाए—हथियार, तरीके, यहाँ तक कि लड़ सकने की उम्मीद भी—तब भी "लड़ने की ज़रूरत" बाकी रहती है। यह कविता शोषित वर्ग (सर्वहारा) का वह राष्ट्रगीत है, जो हर उस इंसान की आवाज़ है जिसके हिस्से की धूप छीन ली गई है।
कविता का मूल पाठ: हम लड़ेंगे साथी
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स्रोत : पुस्तक: लहू है कि तब भी गाता है (पृष्ठ 110) | अनुवाद: चमनलाल
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दार्शनिक और मार्क्सवादी विश्लेषण (Marxist & Existential Context)
यदि दार्शनिक अल्बेयर कामू (Albert Camus) ने कहा था कि "I rebel, therefore we exist" (मैं विद्रोह करता हूँ, इसलिए हमारा अस्तित्व है), तो पाश की यह कविता उसी दर्शन का भारतीय और खाँटी देहाती रूप है। कविता में 'Class Struggle' (वर्ग संघर्ष) की गहरी गूँज है। पाश उन सभी लोगों को एक साथ खड़ा करते हैं जो शोषित हैं—चाहे वह निहाई पर हथौड़ा मारता मज़दूर हो, चीख़ती धरती पर हल चलाता किसान हो, 'बीरू बकरिहा' हो जिसे पानी मयस्सर नहीं, या खून से अक्षर लिखता हुआ दफ़्तर का बाबू हो।
'सिस्टम' के गुलाम: सिपाही और बाबू
पाश की वैचारिक प्रौढ़ता यहाँ दिखती है कि वे पुलिस के सिपाही को दुश्मन नहीं मानते। वे कहते हैं, "जब तक पुलिस के सिपाही अपने ही भाइयों का गला दबाने के लिए विवश हैं..."। पाश समझते हैं कि वर्दी के पीछे का इंसान भी उसी व्यवस्था का शिकार है, ठीक वैसे ही जैसे आर्थिक बोझ (Financial constraints) तले दबा एक क्लर्क अपने "रक्त से अक्षर लिखता है"। यह वही व्यवस्था है जहाँ 'मेरे शहर का खुद्दार फाकों से मर रहा है'।
अस्तित्ववादी संघर्ष: "अभी तक लड़े क्यों नहीं?"
कविता का चरम (Climax) तब आता है जब पाश लड़ने के कारण गिनाते हैं। वे सिर्फ जीतने के लिए नहीं लड़ना चाहते। वे इसलिए लड़ना चाहते हैं क्योंकि "लड़ने के बग़ैर कुछ भी नहीं मिलता", और उससे भी बड़ी बात—"अभी तक लड़े क्यों नहीं" के अपराधबोध को मिटाने के लिए। यह अदम गोंडवी की तरह ज़मीनी हकीकत को स्वीकारने और दुष्यंत कुमार के "साये में धूप" से निकलकर तपती दोपहरी में खड़े होने का ऐलान है।
निष्कर्ष: क्या आपके भीतर लड़ने की ज़रूरत बाकी है?
आज जब हम ज़िंदगी के मैराथन (Sports & Life) में केवल 'सक्सेस' के पीछे भाग रहे हैं, पाश हमें रोककर पूछते हैं कि क्या हमारे हाथों पर 'गाँठें' हैं? क्या हमने 'लड़ते हुए मर जाने वालों की याद' ज़िंदा रखी है? "हम लड़ेंगे साथी" महज़ एक कविता नहीं, एक वादा है जो हर पीढ़ी को अपने समय की तानाशाही से करना चाहिए। जब तक दुनिया में एक भी 'बीरू बकरिहा' प्यासा है, तब तक लड़ने की ज़रूरत बाकी है।
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External Authoritative References
https://en.wikipedia.org/wiki/Pash, https://www.rekhta.org/poets/pash/poems, https://hindisamay.com/content/1155/1/
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. "हम लड़ेंगे साथी" कविता में पाश किसके लिए लड़ने की बात कर रहे हैं?
पाश समाज के हर शोषित वर्ग (मज़दूर, किसान, गाँव की औरतें, बेबस क्लर्क) के हक के लिए, 'उदास मौसम' (निराशा) को बदलने के लिए और 'ग़ुलाम इच्छाओं' को आज़ाद करने के लिए लड़ने का आह्वान कर रहे हैं।
2. "बाबू दफ़्तरों के रक्त से अक्षर लिखते हैं" का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि दफ़्तरों में काम करने वाला क्लर्क वर्ग भी आर्थिक और मानसिक शोषण का शिकार है। वे अपनी ज़िंदगी, अपनी सेहत (रक्त) निचोड़कर एक ऐसी व्यवस्था को चला रहे हैं जो उनके लिए कुछ नहीं करती।
3. जब लड़ने के लिए हथियार न हों, तब कवि क्या कहता है?
पाश कहते हैं कि संघर्ष हथियारों का मोहताज नहीं है। यदि बंदूक या तलवार न भी हो, तो भी 'लड़ने की लगन' और 'लड़ने की ज़रूरत' इंसान को क्रांति के मार्ग पर आगे बढ़ाएगी।