पाश की कविता "यदि देश की सुरक्षा यही होती है": छद्म राष्ट्रवाद और सत्ता के यथार्थ का चीरहरण
जब एक शोषक सत्ता अपने नागरिकों से उनके अधिकार छीनती है, तो वह सबसे बड़ा हथियार इस्तेमाल करती है—'देश की सुरक्षा' का डर। यदि "सपने हर किसी को नहीं आते" में पाश ने हमें बताया था कि नींद की नज़र देना ही सपनों की कीमत है, तो इस कविता में वे उन सपनों को कुचलने वाली व्यवस्था के छद्म राष्ट्रवाद (Jingoism) को बेनकाब करते हैं।
साहित्यशाला की इस ऐतिहासिक पाश-शृंखला (Pash Series) की यह चौथी कविता एक नागरिक का सत्ता से सीधा संवाद है। जिस तरह एक क्रांतिकारी ने "मैं अब विदा लेता हूँ" में अपने निजी प्रेम को छोड़ दिया था, यहाँ वह यह स्पष्ट करता है कि वह उस 'देश' से प्यार नहीं कर सकता जो "आत्मा की बेगार का कोई कारख़ाना" बन चुका हो। यह कविता सिर्फ़ विरोध नहीं है, बल्कि यह परिभाषित करती है कि असली देशभक्ति और अंधी चाटुकारिता में क्या फ़र्क है।
कविता का मूल पाठ (Lyrics)
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स्रोत : पुस्तक: लहू है कि तब भी गाता है (पृष्ठ 42) | अनुवाद: चमनलाल
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मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक विश्लेषण (Political & Psychological Context)
यह कविता दार्शनिक और राजनीतिक मनोविज्ञान में जिसे 'State-Sponsored Alienation' (राज्य द्वारा प्रायोजित अलगाव) कहा जाता है, उसका सबसे सटीक हिंदी दस्तावेज़ है। सत्ता अक्सर नागरिकों से 'False Consciousness' (झूठी चेतना) की मांग करती है, जहाँ "बिना ज़मीर होना ज़िंदगी के लिए शर्त बन जाए" और "आँख की पुतली में 'हाँ' के सिवाय कोई भी शब्द अश्लील हो"। यह हैना आरेंड्ट (Hannah Arendt) की थ्योरी 'Banality of Evil' का ही एक रूप है, जहाँ बुराई इतनी सामान्य हो जाती है कि लोग बिना सोचे-समझे व्यवस्था के आदेशों ("हाँ") का पालन करने लगते हैं।
राष्ट्र की परिभाषा: 'घर' बनाम 'कारख़ाना'
पाश ने देशभक्ति के दो मॉडल प्रस्तुत किए हैं। एक वह जहाँ देश "घर-जैसी पवित्र चीज़" है, जहाँ इंसान एक ज़िंदा मनुष्य (न कि मुर्दा शांति) की तरह गलियों में बहता है और खेतों में झूमता है। और दूसरा मॉडल वह है जो तानाशाह बनाते हैं—जहाँ देश "आत्मा की बेगार का कारख़ाना" और "उल्लू बनने की प्रयोगशाला" है। ठीक इसी तर्ज पर हिंदी साहित्य के व्यंग्यकारों ने हमेशा सत्ता के इस 'उल्लू बनाने' के खेल का पर्दाफाश किया है।
आर्थिक यथार्थ और महंगाई का दर्द
कविता का वह हिस्सा जहाँ पाश कहते हैं—"तनख़्वाहों के मुँह पर थूकती रहे क़ीमतों की बेशर्म हँसी"—यह केवल एक काव्यात्मक पंक्ति नहीं, बल्कि उस आर्थिक यथार्थ (Financial Reality) की नब्ज़ है जिसे हर मध्यमवर्गीय इंसान रोज़ जीता है। यह हमें अदम गोंडवी की ग़ज़ल 'काजू भुने प्लेट में रामराज' की याद दिलाता है। जब नागरिक क़र्ज़ के पहाड़ों से गिर रहे हों, तो वह कैसा 'अमन' है? वह अमन नहीं, श्मशान की शांति है।
निष्कर्ष: क्या वीरता केवल सरहदों तक सीमित है?
अंत में पाश एक गहरा सवाल उठाते हैं—"कि वीरता बस सरहदों पर मरकर परवान चढ़ेगी?" राष्ट्रवाद को केवल सीमाओं तक सीमित कर देना और देश के भीतर हो रहे अन्याय (हड़तालों का कुचला जाना, कला का राजा का गुलाम हो जाना) पर चुप रहना, पाश की नज़र में देश के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है। दुष्यंत कुमार की तरह ही, पाश का यह साहित्य हमें सचेत करता है कि व्यवस्था के 'हाँ में हाँ' मिलाना देशभक्ति नहीं है।
साहित्य की ऐसी ही आग उगलती और सोचने पर मजबूर करती कविताओं के लिए Sahityashala और हमारे वैश्विक साहित्य खंड English Poems के साथ बने रहें।
External Authoritative References
https://en.wikipedia.org/wiki/Pash, https://www.rekhta.org/poets/pash/poems, https://hindisamay.com/content/1155/1/
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. पाश ने किस प्रकार की 'देश की सुरक्षा' से ख़तरा बताया है?
पाश के अनुसार, वह सुरक्षा जिससे नागरिकों का ज़मीर मर जाए, जहाँ असहमति अश्लील मानी जाए और जहाँ लोग केवल व्यवस्था के 'हाँ' में 'हाँ' मिलाएँ, वह देश के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है।
2. "आत्मा की बेगार का कारख़ाना" का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ एक ऐसे देश या व्यवस्था से है जहाँ इंसान अपनी स्वतंत्रता और चेतना (आत्मा) खोकर केवल शोषकों के लिए बिना किसी अधिकार के मशीन की तरह काम (बेगार) करता रहता है।
3. पाश के अनुसार महंगाई और तनख्वाह का क्या संबंध दिखाया गया है?
कविता में एक कटु आर्थिक यथार्थ है—"तनख़्वाहों के मुँह पर थूकती रहे क़ीमतों की बेशर्म हँसी", जिसका अर्थ है कि एक आम आदमी की मेहनत और उसकी तनख्वाह, बाज़ार की बढ़ती महंगाई के सामने रोज़ बेइज़्ज़त होती है।