पाश की कविता "सबसे ख़तरनाक": सपनों की मौत और मुर्दा शांति का मनोवैज्ञानिक चीरहरण
हिंदी और पंजाबी साहित्य के विद्रोही क्षितिज पर अवतार सिंह संधू 'पाश' का नाम एक धधकते अंगारे की तरह दर्ज है। उनकी सबसे सशक्त और बहुपठित कविता, "सबसे ख़तरनाक" (अनुवाद: चमनलाल), केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह एक सोए हुए समाज की रीढ़ की हड्डी पर किया गया सीधा प्रहार है।
जब हम साहित्यशाला के इस मंच से हिंदी साहित्य में व्यंग्य और विद्रोह के उद्भव की बात करते हैं, तो पाश की यह कविता हमें चेताती है कि असली ख़तरा बाहर से नहीं, हमारे भीतर मरती हुई संवेदनाओं से है। यह कविता पाठक को एक मनोवैज्ञानिक जाल में फँसाती है—जहाँ शुरुआत में वह रोज़मर्रा की ज्यादतियों को सामान्य मानता है, लेकिन अंततः उसे अपनी ही 'मुर्दा शांति' से डर लगने लगता है। यह कविता हर बात का सीधा जवाब नहीं देती—बल्कि यह अंत में सिर्फ़ चुभने वाले सवाल छोड़ जाती है।
कविता का मूल पाठ (Lyrics)
▶ मूल देवनागरी पाठ (यहाँ क्लिक करें)
स्रोत : पुस्तक: लहू है कि तब भी गाता है | अनुवाद: चमनलाल
▶ Hinglish Transliteration (Click to read)
गहन मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक विश्लेषण
पाश की यह कविता मानव मन की उस 'Apathy' (उदासीनता) को निशाना बनाती है, जो किसी भी तानाशाह या शोषक व्यवस्था का सबसे बड़ा हथियार होती है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से, जब इंसान बार-बार शोषण देखता है, तो वह Learned Helplessness (सीखी हुई लाचारी) का शिकार हो जाता है। अगर इसे दार्शनिक दृष्टि से देखें, तो यह पाओलो फ्रेरे (Paulo Freire) की 'Culture of Silence' और हैना आरेंड्ट (Hannah Arendt) की 'Banality of Evil' की अवधारणाओं से गहराई से जुड़ती है—जहाँ अन्याय इतना सामान्य हो जाता है कि लोग उसे रोज़मर्रा की दिनचर्या मानकर बिना किसी अपराधबोध के स्वीकार कर लेते हैं।
जब आप अदम गोंडवी की कविताओं का विश्लेषण पढ़ते हैं, तो वहाँ व्यवस्था के खिलाफ सीधा आक्रोश दिखता है, लेकिन पाश यहाँ आक्रोश से एक कदम पीछे जाकर उस आक्रोश के शून्य हो जाने के डर को उकेरते हैं।
राजनीतिक और समकालीन इतिहास (Timeline Context)
यह कविता 1970 और 80 के दशक के पंजाब और भारत की उथल-पुथल भरी राजनीतिक पृष्ठभूमि में रची गई थी। सत्ता द्वारा असहमति की आवाज़ों को क्रूरता से कुचला जाना आम बात थी। जैसे दुष्यंत कुमार ने आपातकाल के दौर में ग़ज़लों से आग लगाई, वैसे ही पाश ने इस कविता को एक इश्तहार की तरह लिखा। "हर हत्याकांड के बाद वीरान हुए आँगनों में चढ़ता चाँद"—यह सीधा इशारा उन निर्दोष युवाओं की हत्याओं की ओर है, जिसे देखकर भी समाज चुप था। यह वह दौर था जब मेरे शहर का खुद्दार फाकों से मर रहा था, और सत्ता "कपट के शोर" में मग्न थी।
हिंदी व्याकरण: लय, छंद और धारा
- छंद (Chhand): यह कविता मुक्त छंद (Free Verse) में है। इसमें कोई पारंपरिक तुकबंदी नहीं है, फिर भी विचारों का प्रवाह (धारा) इतना तीव्र है कि यह पाठक को बाँध लेती है।
- अलंकार और बिंब (Imagery): पाश ने दृश्य बिंबों का अद्भुत प्रयोग किया है—"ज़िंदा रूह के आसमानों पर ढलती रात"। "आत्मा का सूरज" रूपक (Metaphor) है जो मानवीय चेतना को दर्शाता है।
- पुनरावृत्ति (Repetition): "सबसे ख़तरनाक नहीं होता" और "बुरा तो है" का बार-बार प्रयोग एक Anticlimax तैयार करता है।
साहित्य के इस कैनवास पर पाश का यह काम रामधारी सिंह दिनकर की 'परशुराम की प्रतीक्षा' के उस वीर रस और अदम गोंडवी के 'काजू भुने प्लेट में रामराज' वाले तीखे राजनीतिक व्यंग्य के बीच एक गहरा दार्शनिक पुल बनाता है। जहाँ भवानी प्रसाद मिश्र का 'गीत फरोश' बाज़ारवाद पर तंज कसता है, वहीं पाश की यह कविता बाज़ार और राजनीति दोनों के द्वारा छीनी गई मनुष्यता पर रोती है।
निष्कर्ष: क्या हमारे सपने अभी ज़िंदा हैं?
आज जब हम आर्थिक भागदौड़ (Finance) और खेल-मनोरंजन (Sports) की दुनिया में इस कदर खो चुके हैं कि आस-पास हो रहे अन्याय को देखकर भी हमारी आँखें "मिर्चों की तरह नहीं गड़तीं", तब पाश की यह कविता एक अलार्म की तरह बजती है। जैसे विष्णु विराट की रचना 'दर्द देंगे वो सिसकियाँ देंगे' या सर-ए-तूर हो मेरी ज़िंदगी में मानवीय पीड़ा का अक्स दिखता है, वैसे ही "सबसे ख़तरनाक" हमें अपनी मृतप्राय हो चुकी आत्मा को फिर से जिलाने की चुनौती देती है। क्या आप रूटीन की इस मशीन का हिस्सा बन गए हैं, या आपके सपने अभी भी साँस ले रहे हैं?
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External Authoritative References
https://en.wikipedia.org/wiki/Pash, https://www.rekhta.org/poets/pash/poems, https://hindisamay.com/content/1155/1/%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B6-%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%8F%E0%A4%81-%E0%A4%B8%E0%A4%AC%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%96%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%95.cspx
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. 'सबसे ख़तरनाक' कविता के रचयिता कौन हैं?
इस कविता के मूल रचयिता प्रसिद्ध पंजाबी कवि अवतार सिंह संधू हैं, जिन्हें दुनिया 'पाश' के नाम से जानती है। इस कविता का हिंदी अनुवाद चमनलाल जी ने किया है।
2. पाश के अनुसार सबसे ख़तरनाक क्या है?
पाश के अनुसार पुलिस की मार या मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं है। सबसे ख़तरनाक है "मुर्दा शांति से भर जाना" और "हमारे सपनों का मर जाना" यानी अन्याय के प्रति विरोध करने की इच्छाशक्ति का ख़त्म हो जाना।
3. "सपनों का मर जाना" से कवि का क्या तात्पर्य है?
इसका तात्पर्य मनुष्य की उस अवस्था से है जब वह बेहतर भविष्य की कल्पना करना छोड़ देता है, उसके अंदर की तड़प ख़त्म हो जाती है और वह अन्यायपूर्ण व्यवस्था को अपनी नियति मानकर चुपचाप सहने लगता है।