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“सबसे ख़तरनाक” पाश की कविता | Meaning, Analysis, Lyrics (Hindi–Hinglish)

Sar-e-Toor Ho Sar-e-Hashr Ho: Miri Zindagi To Firaaq Hai Lyrics & Meaning

मोहब्बत में जब इंतज़ार इबादत बन जाए, और जुदाई (फ़िराक़) ही ज़िंदगी का सबसे हसीन मक़सद लगने लगे, तो समझ लीजिए कि इश्क़ अपनी मंज़िल पर पहुँच गया है।

उर्दू अदब और सूफ़ी कलाम की अज़ीम रिवायत में गोलड़ा शरीफ़ (Golra Sharif) के पीर नसीरुद्दीन 'नसीर' गीलानी का नाम एक ध्रुव तारे की तरह चमकता है। उनकी मशहूर-ए-ज़माना ग़ज़ल "सर-ए-तूर हो सर-ए-हश्र हो हमें इंतिज़ार क़ुबूल है" महज़ कुछ शेर नहीं, बल्कि इश्क़-ए-हक़ीक़ी (ईश्वरीय प्रेम) और रूहानी तड़प का एक मुकम्मल मेनिफेस्टो है।

साहित्यशाला (Sahityashala) के पाठकों के लिए, आज हम इस रूहानी कलाम का मुकम्मल मतान (Text), लफ़्ज़ों के गहरे मायने (Lughat), और इसके सूफ़ी फलसफ़े की तशरीह (Analysis) पेश कर रहे हैं।

A Sufi mystic sitting in divine separation, representing the essence of Miri Zindagi To Firaaq Hai by Pir Naseeruddin Naseer.
"सर-ए-तूर हो सर-ए-हश्र हो, हमें इंतिज़ार क़ुबूल है..." (The Mystical Wait in Sufism)

Miri Zindagi To Firaaq Hai - Full Lyrics

नीचे इस अज़ीम कलाम को उर्दू, हिंदी और रोमन (Roman Urdu) में पिरोया गया है, ताकि हर ज़बान का मुरीद इसके असर को महसूस कर सके। ठीक वैसे ही जैसे हमने दीप्ति मिश्रा की बेहतरीन ग़ज़लों के नाज़ुक जज़्बात को आपके सामने पेश किया था।

مری زندگی تو فراق ہے وہ ازل سے دل میں مکیں سہی
وہ نگاہ شوق سے دور ہیں رگ جاں سے لاکھ قریں سہی
मिरी ज़िंदगी तो फ़िराक़ है वो अज़ल से दिल में मकीं सही
वो निगाह-ए-शौक़ से दूर हैं रग-ए-जाँ से लाख क़रीं सही
Miri zindagi to firaaq hai wo azal se dil mein makeen sahi
Wo nigah-e-shauq se door hain rag-e-jaan se lakh qareen sahi
ہمیں جان دینی ہے ایک دن وہ کسی طرح وہ کہیں سہی
ہمیں آپ کھینچیں دار پر جو نہیں کوئی تو ہمیں سہی
हमें जान देनी है एक दिन वो किसी तरह वो कहीं सही
हमें आप खींचे दार पर जो नहीं कोई तो हमीं सही
Humein jaan deni hai ek din wo kisi tarah wo kahin sahi
Humein aap khinche daar par jo nahi koi to hamin sahi
غم زندگی سے فرار کیا یہ سکون کیوں یہ قرار کیا
غم زندگی بھی ہے زندگی جو نہیں خوشی تو نہیں سہی
ग़म-ए-ज़िंदगी से फ़रार क्या ये सुकून क्यूँ ये क़रार क्या
ग़म-ए-ज़िंदगी भी है ज़िंदगी जो नहीं ख़ुशी तो नहीं सही
Gham-e-zindagi se faraar kya, ye sukoon kyun, ye qaraar kya
Gham-e-zindagi bhi hai zindagi, jo nahi khushi to nahi sahi
سر طور ہو سر حشر ہو ہمیں انتظار قبول ہے
وہ کبھی ملیں وہ کہیں ملیں وہ کبھی سہی وہ کہیں سہی
सर-ए-तूर हो सर-ए-हश्र हो हमें इंतिज़ार क़ुबूल है
वो कभी मिलें वो कहीं मिलें वो कभी सही वो कहीं सही
Sar-e-Toor ho, sar-e-hashr ho, humein intezar qubool hai
Wo kabhi milein, wo kahin milein, wo kabhi sahi, wo kahin sahi
نہ ہو ان پہ جو مرا بس نہیں کہ یہ عاشقی ہے ہوس نہیں
میں انہیں کا تھا میں انہیں کا ہوں وہ مرے نہیں تو نہیں سہی
न हो उन पे जो मिरा बस नहीं कि ये 'आशिक़ी है हवस नहीं
मैं उन्हीं का था मैं उन्हीं का हूँ वो मिरे नहीं तो नहीं सही
Na ho un pe jo mera bas nahi, ki ye aashiqi hai hawas nahi
Main unhi ka tha main unhi ka hoon, wo mere nahi to nahi sahi
مجھے بیٹھنے کی جگہ ملے مری آرزو کا بھرم رہے
تری انجمن میں اگر نہیں تری انجمن کے قریں سہی
मुझे बैठने की जगह मिले मिरी आरज़ू का भरम रहे
तिरी अंजुमन में अगर नहीं तिरी अंजुमन के क़रीं सही
Mujhe baithne ki jagah mile, meri aarzoo ka bharam rahe
Teri anjuman mein agar nahi, teri anjuman ke qareen sahi
ترے واسطے ہے یہ وقف سر رہے تا ابد ترا سنگ در
کوئی سجدہ ریز نہ ہو سکے تو نہ ہو مری ہی جبیں سہی
तिरे वास्ते है ये वक़्फ़-ए-सर रहे ता-अबद तिरा संग-ए-दर
कोई सज्दा-रेज़ न हो सके तो न हो मिरी ही जबीं सही
Tere waaste hai ye waqf-e-sar, rahe ta-abad tera sang-e-dar
Koi sajda-rez na ho sake to na ho meri hi jabeen sahi
مری زندگی کا نقیب ہے نہیں دور مجھ سے قریب ہے
مجھے اس کا غم تو نصیب ہے وہ اگر نہیں تو نہیں سہی
मिरी ज़िंदगी का नक़ीब है नहीं दूर मुझ से क़रीब है
मुझे उस का ग़म तो नसीब है वो अगर नहीं तो नहीं सही
Meri zindagi ka naqeeb hai, nahi door mujh se qareeb hai
Mujhe us ka gham to naseeb hai, wo agar nahi to nahi sahi
جو ہو فیصلہ وہ سنائیے اسے حشر پر نہ اٹھائیے
جو کریں گے آپ ستم وہاں وہ ابھی سہی وہ یہیں سہی
जो हो फ़ैसला वो सुनाइए उसे हश्र पर न उठाइए
जो करेंगे आप सितम वहाँ वो अभी सही वो यहीं सही
Jo ho faisla wo sunaiye, use hashr par na uthaiye
Jo karenge aap sitam wahan, wo abhi sahi wo yahin sahi
اسے دیکھنے کی جو لو لگی تو نصیر دیکھ ہی لیں گے ہم
وہ ہزار آنکھ سے دور ہو وہ ہزار پردہ نشیں سہی
उसे देखने की जो लौ लगी तो 'नसीर' देख ही लेंगे हम
वो हज़ार आँख से दूर हो वो हज़ार पर्दा-नशीं सही
Use dekhne ki jo lau lagi to 'Naseer' dekh hi lenge hum
Wo hazar aankh se door ho, wo hazar parda-nasheen sahi

📖 कठिन शब्दों के अर्थ (Lughat / Meaning)

ग़ज़ल की रूह तक पहुँचने के लिए इसके भारी और वजनी अल्फ़ाज़ को समझना ज़रूरी है। अगर आप अदम गोंडवी की विद्रोही शायरी से वाकिफ हैं जहाँ अल्फ़ाज़ समाज की ज़मीनी हक़ीक़त पर चोट करते हैं, तो यहाँ के अल्फ़ाज़ सीधे ईश्वर से रूहानी संवाद करते हैं:

  • फ़िराक़ (Firaaq): जुदाई, विरह, ईश्वर से अलग होने का अलौकिक दर्द।
  • अज़ल (Azal): अनादि काल, सृष्टि का वह आरंभ जिसका कोई आदि (Beginning) न हो।
  • मकीं (Makeen): रहने वाला, दिल के मकान का निवासी।
  • रग-ए-जाँ (Rag-e-jaan): प्राणों की नस, शह-रग। (क़ुरान का हवाला: "हम इंसान की शह-रग से भी ज़्यादा उसके क़रीब हैं")।
  • दार (Daar): सूली, फाँसी का फंदा।
  • सर-ए-तूर (Sar-e-Toor): कोह-ए-तूर पर्वत की चोटी, जहाँ हज़रत मूसा (अ.) ने ईश्वर की एक झलक (तजल्ली) देखी थी।
  • हश्र (Hashr): क़यामत का दिन (Judgment Day)।
  • वक़्फ़-ए-सर (Waqf-e-sar): सिर का पूरी तरह समर्पित होना।
  • सज्दा-रेज़ (Sajda-rez): सजदे में झुका हुआ इंसान।
  • नक़ीब (Naqeeb): पैग़ाम लाने वाला, संदेशवाहक (Herald)।
  • पर्दा-नशीं (Parda-nasheen): पर्दे में छिपकर रहने वाला।

🖋️ मुकम्मल तशरीह और रूहानी विश्लेषण (Literary Analysis)

1. रूहानी क़ुर्बत और जिस्मानी दूरी का फलसफ़ा

मिरी ज़िंदगी तो फ़िराक़ है वो अज़ल से दिल में मकीं सही
वो निगाह-ए-शौक़ से दूर हैं रग-ए-जाँ से लाख क़रीं सही
शायर कहता है कि मेरी पूरी ज़िंदगी विरह (जुदाई) का ही नाम है, भले ही मेरा महबूब (ख़ुदा) अज़ल (सृष्टि के आरंभ) से ही मेरे दिल में बसा हुआ है। वह मेरी प्यासी आँखों से चाहे कितना भी दूर हो, लेकिन वह मेरी शह-रग (रग-ए-जाँ) से भी ज़्यादा क़रीब है। यह दुनियावी रिश्तों के दर्द से बहुत अलग है; जैसे एक पिता-पुत्र की दूरी (Daur Poem) हमें रुलाती है, वैसे ही यह रूहानी दूरी इंसान की रूह को तड़पाती है।

2. इंतज़ार की मेराज (The Ultimate Patience)

सर-ए-तूर हो सर-ए-हश्र हो हमें इंतिज़ार क़ुबूल है
वो कभी मिलें वो कहीं मिलें वो कभी सही वो कहीं सही
यह इस ग़ज़ल का मुकुट (Crown) शेर है। 'तूर' का ज़िक्र हज़रत मूसा के वाक़ये से जुड़ा है जब उन्होंने ख़ुदा को देखने की ज़िद की थी। पीर नसीरुद्दीन साहिब कहते हैं कि मुझे दीदार की कोई जल्दी नहीं। चाहे मुझे कोह-ए-तूर पर सदियों इंतज़ार करना पड़े, या फिर क़यामत (हश्र) के दिन तक राह देखनी पड़े—मुझे हर इंतज़ार मंज़ूर है। अगर हम इस दर्द की तुलना परवीन शाकिर के "कमाल-ए-ज़ब्त को ख़ुद भी तो आज़माऊँगी" वाले 'मलाल' से करें, तो परवीन के यहाँ दुनियावी महबूब से बिछड़ने का दर्द है, जबकि यहाँ महबूब-ए-हक़ीक़ी (ईश्वर) के लिए सब्र है।
A seeker waiting patiently under the moon, depicting the lyrics 'Hazar pardon ke paar deedar' in Sufi poetry.
"वो हज़ार आँख से दूर हो, वो हज़ार पर्दा-नशीं सही..." (The Divine presence beyond a thousand veils)

3. मोहब्बत और हवस का नाज़ुक फ़र्क़

न हो उन पे जो मिरा बस नहीं कि ये 'आशिक़ी है हवस नहीं
मैं उन्हीं का था मैं उन्हीं का हूँ वो मिरे नहीं तो नहीं सही
हवस में इंसान अधिकार (Possession) चाहता है, लेकिन मोहब्बत में सिर्फ़ समर्पण (Surrender) होता है। शायर कहता है कि "मैं उनका हूँ, भले ही वो मेरे न हों।" यह भाव उन लोगों के लिए भी एक बड़ा रूहानी सबक है जो ज़िंदगी में राह चाहे न मिले, फिर भी सफ़र पूरी ईमानदारी से जारी रखते हैं।

4. दर्द और महरूमियों को गले लगाना

ग़म-ए-ज़िंदगी से फ़रार क्या ये सुकून क्यूँ ये क़रार क्या
ग़म-ए-ज़िंदगी भी है ज़िंदगी जो नहीं ख़ुशी तो नहीं सही
सच्चा सूफ़ी कभी अपने ग़म से भागता नहीं है। वह जानता है कि यह सांसारिक तकलीफ़ें भी ख़ुदा की ही अता (दी हुई) हैं। जैसे हम देखते हैं कि "ख़ुद्दार मेरे शहर का फ़ाकों से मर गया" में एक दुनियावी भूख और ग़रीबी का ज़िक्र है, उसी तरह यहाँ शायर रूहानी 'भूख' और 'ग़म' को ज़िंदगी का हिस्सा मानकर उसे सीने से लगा लेता है। अदम गोंडवी ने जहाँ समाज के ठेकेदारों से बगावत की थी, वहीं एक सूफी संत अपनी तकदीर से बगावत नहीं करता, वह रज़ा-ए-इलाही (ईश्वर की मर्ज़ी) में हमेशा राज़ी रहता है।
"अगर दिल में दीदार की सच्ची आग (लौ) लग जाए, तो फिर पर्दों की कोई अहमियत नहीं रह जाती। भले ही महबूब हज़ार पर्दों के पीछे छिपा हो, इश्क़ की आँख उसे ढूँढ ही लेती है।"

🎬 सूफ़ियाना महफ़िल (Video Recitation)

कलाम का असल मज़ा उसे महसूस करने और सुनने में है। पीर नसीरुद्दीन शाह साहब की यह ग़ज़ल कई कव्वालों और गायकों ने पढ़ी है, लेकिन जब यह पूरी रूहानियत के साथ पढ़ी जाती है, तो इसका जादू सीधा रूह में उतरता है।


निष्कर्ष (Conclusion)

पीर नसीरुद्दीन 'नसीर' का यह कलाम महज़ एक ग़ज़ल नहीं है, बल्कि इश्क़-ए-हक़ीक़ी का एक धड़कता हुआ दिल है। यह हमें सिखाता है कि मोहब्बत में पा लेना ही सब कुछ नहीं होता; इंतज़ार, तड़प और मुकम्मल सुपुर्दगी (Surrender) में जो सुकून है, वह दुनिया की किसी और चीज़ में नहीं।

साहित्यशाला पर हम ऐसी ही अनमोल रचनाओं को आप तक पहुँचाते रहेंगे। आपको यह कलाम कैसा लगा? कमेंट्स में अपनी राय ज़रूर साझा करें!

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1. "मिरी ज़िंदगी तो फ़िराक़ है" ग़ज़ल के असली शायर कौन हैं?
इस मशहूर सूफ़ी ग़ज़ल के शायर गोलड़ा शरीफ़ (पाकिस्तान) के प्रसिद्ध सूफ़ी संत और विद्वान पीर नसीरुद्दीन 'नसीर' गीलानी हैं। अक्सर इंटरनेट पर इसे ग़लत नाम से शेयर कर दिया जाता है, लेकिन मक़्ते में 'नसीर' तख़ल्लुस इसका पुख़्ता सुबूत है।
2. "सर-ए-तूर हो सर-ए-हश्र हो" में 'तूर' का क्या मतलब है?
यहाँ 'तूर' का मतलब कोह-ए-तूर (Mount Sinai) से है। इस्लामिक रिवायत के मुताबिक, यह वही पहाड़ है जहाँ पैगंबर हज़रत मूसा (अ.) ने ईश्वर (अल्लाह) की झलक देखी थी और बेहोश हो गए थे। शायर उसी जगह का हवाला देकर कह रहा है कि वह दीदार के लिए कहीं भी इंतज़ार करने को राज़ी है।
3. क्या यह ग़ज़ल इश्क़-ए-मजाज़ी है या इश्क़-ए-हक़ीक़ी?
यह कलाम पूरी तरह से इश्क़-ए-हक़ीक़ी (ईश्वरीय प्रेम) पर आधारित है। इसमें 'रग-ए-जाँ' (शह-रग) और 'हश्र' (क़यामत) जैसे शब्दों का इस्तेमाल साफ़ तौर पर अल्लाह से इंसान के रूहानी रिश्ते को दर्शाता है।

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