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ये दुनिया चल रही है या चलाई जा रही है - Divyansh Yadav Ghazal Lyrics & Meaning

दौर (Daur) - Father-Son Emotional Hindi Poem by Harsh Nath Jha

साहित्यशाला विशेष: 'दौर' - जब क्रोध इतिहास बन जाता है

"कभी-कभी शब्द माफ़ नहीं होते।
और कभी-कभी, वे पीढ़ियाँ पार कर जाते हैं।"

इंसानी रिश्तों और पीढ़ियों के टकराव (Generational Gap) की एक अनकही और कड़वी सच्चाई को शब्दों में पिरोया है युवा कवि हर्ष नाथ झा जी ने। उनकी रचना "दौर" महज़ एक कविता नहीं, बल्कि एक निर्मम दर्पण है। यह क्रोध को नहीं, क्रोध की उस 'विरासत' को विषय बनाती है, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को अनजाने में मिल जाती है।

जिस तरह मर्यादा पुरुषोत्तम राम का जीवन संघर्षों की गाथा रहा है, वैसे ही हर आम पिता का जीवन अपने ही परिवार के अंतर्द्वंद्वों से होकर गुज़रता है। हर्ष नाथ झा की लेखनी घर के भीतर की उस भाषा को पकड़ती है, जो बनावटी नहीं है, बल्कि यथार्थ की ज़मीन पर खड़ी है। चाहे आप उनके संयुक्ताक्षर के प्रयोग देखें या भारत पर लिखी उनकी अद्भुत कविताएँ, उनका शिल्प हमेशा दिल पर सीधा वार करता है।

आइए, इस दार्शनिक यात्रा पर चलते हैं...

A modern son shouting at his father and a past scene of that father shouting at his own father
बेटा पिता नहीं बनता, पिता दोहराया जाता है।

दौर

(रचनाकार: हर्ष नाथ झा)

चलते-चलते घुल जाते हैं
नए दौर के भेद
खुद की वाणी याद न रहती
न होता कोई खेद
बकते-बकते बक जाते हैं
चुभने वाली बात
खून नहीं, वो वाणी है जो
चुनती सबकी जात।


क्रोध बहुत है, तो बोला
धीरज हो गया भंग
किसने मेरी बातें काटी
जैसे एक भुजंग
तो इक दिन की बात सुनो जी
क्रोध हुआ था आज
आंखों में वो अकड़ लिए था
जैसे मेरा ताज।

आवाज़ उठाई, सीना ताना
घूरी मैंने आँखें
ये कैसे है, वो कैसे है
पेड़ हैं हम, न शाखें
इस क्षण था कोई और नहीं
था सामने मेरा बाप
उसी क्रोध में पूछ उठा मैं
"क्या कर बैठे आप?"

एक थप्पड़ में अकड़ निकल गई
चढ़ गया देह का ताप
दांत भी भींचे, खून भी खौला
ज्यों ही जड़ा कंटाप
वहां से तब मैं भाग गया
पड़ी गाल पर छाप
छोड़ गया मैं ज़ख्म एक गहरा
"कर क्या बैठे आप?"

A young man looking regretful with a red mark on his face
पूरे दिन ही मुँह फुलाकर
सो गया था गहरा
उसी रात को बैठा था कोई
ठण्ड में एकदम ठहरा

वो ज़ख्म जो छोड़ा था मैंने
थी मेरी तरुणाई
पर प्रश्न कई, और बातें भी
ज़हन में उनके आयी

कैसे उसने पूछ लिया कि
"क्या कर बैठे हम"
खाना पीना रहना सोना
न उसको कोई ग़म
जो भी माँगा जो भी चाहा
सबसे उसको तार दिया
न बदले में कुछ माँगा मैंने
न कम मैंने प्यार दिया

हर दिन ही तो मैं श्रम करता
टूटी मेरी पीठ
दिखा न उसको, अँधा है वो
बेटा मेरा ढीठ
फ़र्ज़ी चीजें क्यों ही ले दूं
कैसे रूप और रंग
जो मैं कहता बस वो करदे
दुनिया का ये ढंग

न देखी है उसने ये दुनिया
नरभक्षी जैसे तौर
पल में मिल जाता है सब
था कुछ अपना दौर
जैसे सोचा उनने फिरसे
ज़हन में आई बात
आंसू छलके आंखों से
पुरानी इक वारदात


An elderly father sitting sadly in a blanket at night, reminiscing about his youth
सालों पहले जब घर छोड़ा
कमाने के लिए गांव
बहस हुई थी बड़ी भयंकर
हृदय का जर्जर घाव
दौर की बातें, तौर की बातें
दुनिया के जो ढंग
खाना पीना रहना सोना
मर्जी के कुछ रंग ।

गांव है छोटा, फर्जी है ये
साधन यहां पर अल्प
छोटा हूं, छोटा मर जाऊं
मुझको एक विकल्प?
इस क्षण था कोई और नहीं
थे सामने उनके बाप
उसी क्रोध में पूछ उठे खुद
"क्या कर बैठे आप?”

कविता के निहितार्थ: एक गहरा विश्लेषण

1. भावनात्मक अर्थ (The Emotional Resonance)

यह कविता रुलाती नहीं है, बल्कि धीरे-धीरे शर्मिंदा करती है। यह क्रोध के उस अंधेरे पहलू को सामने लाती है, जहाँ हम अपनों को ही सबसे गहरे घाव दे जाते हैं। "ठण्ड में एकदम ठहरा"—यह पंक्ति सिर्फ मौसम की ठंडक नहीं, बल्कि उस भावनात्मक सुन्नपन को दर्शाती है जहाँ एक पिता के पास शब्द खत्म हो जाते हैं। विष्णु विराट की गज़ल की तरह, यहाँ भी एक हताशा है, लेकिन यह हताशा अपनों से मिली है।

2. दार्शनिक निष्कर्ष (The Philosophical Truth)

कविता का अंत उपदेशात्मक नहीं, बल्कि अनिवार्य लगता है। "क्या कर बैठे आप?"—यह सवाल कविता में चार बार उभरता है और हर बार इसका मनोवैज्ञानिक अर्थ बदल जाता है। कभी इसमें अहंकार है, कभी पश्चाताप, तो कभी हैरानी। अंत में आकर यह स्पष्ट हो जाता है कि समय केवल स्वयं को दोहराता है। श्री कृष्ण के गीता ज्ञान की ही तरह, यह सत्य है कि जिसे हम आज 'नया दौर' कहकर बगावत कर रहे हैं, वह कल का ही बीता हुआ रूप है।

Indian Hindi poet Harsh Nath Jha

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कविता पाठ (Audio/Video Integration)

कवि की ही सजीव आवाज़ में इस रचना को सुनकर इसके भावों को और गहराई से महसूस करें:

क्या कर बैठे आप? | Full Poem Recitation

"था सामने मेरा बाप..." | Emotional Poetry Shorts

हारी हुई सी जीत & बिंदी | Heart Touching Poetry

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. 'दौर' कविता का मुख्य विषय क्या है?
यह कविता जनरेशन गैप (पीढ़ियों के टकराव), युवावस्था के अहंकार, क्रोध और पिता-पुत्र के मध्य होने वाले वैचारिक मतभेद एवं आत्म-मंथन पर आधारित है।
2. हर्ष नाथ झा कौन हैं?
हर्ष नाथ झा एक युवा और प्रतिभाशाली हिंदी कवि हैं। उनकी रचनाएँ पारिवारिक रिश्तों, मनोवैज्ञानिक अंतर्द्वंद्वों और समाज के यथार्थ को गहराई से दर्शाती हैं।
3. साहित्यशाला (Sahityashala) पर और क्या पढ़ा जा सकता है?
साहित्यशाला एक उत्कृष्ट मंच है जहाँ आपको हिंदी की श्रेष्ठ कविताएँ, ग़ज़लें, English Poetry और मैथिली साहित्य पढ़ने को मिलता है।

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