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बिंदी (Bindi): पिता-पुत्री के अटूट प्रेम की कविता | Harsh Nath Jha

भारतीय समाज में पिता-पुत्री का रिश्ता अक्सर 'विदाई' के आंसुओं तक सीमित कर दिया जाता है, लेकिन हर्ष नाथ झा की यह कविता "बिंदी" उस सोच को बदलती है। यह कहानी है एक पिता के गर्व, लाड़ और विश्वास की।

जैसे श्री राम का वनवास उनका संघर्ष था, वैसे ही एक पिता का मौन संघर्ष अपनी नन्हीं परी को 'शेरनी' जैसा निडर बनाना है।

बिंदी (Bindi)

मेरी इक हथेली पे सवार थी,
पहली बार उसे जब देखा था।
मेरे आंसू गिरने वाले थे,
पिता बनके मैंने रोका था।
जिन अश्क़ों को मैंने रोका था,
उनमे बहुत-सी दुआएं थी...
मेरा दिल व्याकुल, परेशां था,
पर, सुकून की उनमे आहें थी।
क्षणों में सपनों को बनते देखा,
कांपते हाथों ने चीज़ें जताई थी।
पहला तौफा उसका लाया था मैं,
उस माथे पे, इक बिंदिया सजाई थी।
उस बिंदी में मैंने आरजू समाये,
उस बिंदी में, समाया मैंने नाज़,
मेरी माँ की इक झलक भी थी उसमें,
वही शेरनी-सा अंदाज़।
A young Indian father holds his newborn daughter's tiny hand and looks at her with immense love. A small red bindi is on her forehead, illustrating the starting lines of Harsh Nath Jha's poem 'Bindi'.
"पहली बार उसे जब देखा था... उस माथे पे, इक बिंदिया सजाई थी।"
वो छोटी, वो प्यारी, वो लाल-सी बिंदी,
वो शरद, वो सावन, वो गुलाल-सी बिंदी।
वो माँ की गोद, उस लाड़-सी बिन्दीं,
इक बिसरे प्रेम, दुलार-सी बिंदी।
साहित्यिक सोलह श्रृंगार-सी बिंदी,
दुकानों में चूड़ी संग बाजार-सी बिंदी,
ख़रीदूँ दुनिया की सब इक बार में बिंदी,
हर पिता के लिए निज-संसार-सी बिंदी।
क्षण भर में सारे जो सपने संजोये,
रिश्ते की माला में अश्रु पिरोये।
जो चाहे, जो मांगे सब उसको मैं देदूं,
जहाँ ऊँगली वो रख दे सब उसको मैं ले दूँ।
जो बनाना चाहे वो मुझको बना दे,
"ये साड़ी, ये लाली, बापू तू ला दे..."
बनारसी, काँची, लकनवी या सिंधी,
वो छोटी, वो प्यारी, वो लाल-सी बिंदी।
न बोले जताता, न बातें बताता,
न बताता उसे मैं, वो सब कुछ ही है।
इक ऐसा पिता मै उसका बनजाऊं,
मेरी राजकुमारी वो सच मुच ही है।
जब उसको न देखूं जी मेरा है डरता,
मेरी बेटी मुझसे कहीं रूठी तो नहीं,
वो बिंदी, वो झुमका, वो चूड़ी, वो सब,
समय के साथ मुझसे छूटी तो नहीं।
An older Indian man with grey hair gently touches the head of a young girl who has a bindi on her forehead. This reflects the theme of a father's lifelong blessings in the Hindi poem 'Bindi' on Sahityashala.
"वो बिंदी... समय के साथ मुझसे छूटी तो नहीं।"
जो आंसू रुके थे, कभी तो गिरेंगे,
वो आंसू लबों से कभी तो मिलेंगे।
कभी तो वो बिंदी दूजे की होगी,
किसी और के वो हसाए हसेगी।
वो नन्हीं सी आँखें दुख भी सहेंगी,
मुश्किल है हमसे वो कुछ भी कहेगी,
न जाने तब मैं कहां पर रहूँगा,
किसी और की बिंदी मैं कैसे सहूंगा?
थी सादगी की वो प्यारी निशानी,
थी बसी जिसमें एक नन्हीं कहानी।
वो प्यारी बिंदी, ज्यों सूरज सवेरा,
मेरी प्यारी बेटी, उसका सुंदर चेहरा।
आज वही बिंदी सिंदूर में ढली है,
पालकी सजाए कही और ही चली है।
उस शादी के जोड़े से ऐसी कुढ़न थी,
मेरी बिंदी को उसके सिंदूर से जलन थी।
वो पहली बिंदी मैने अब भी रखी है,
उसे न मैंने अभी तक है फेंका,
इतनी सी हथेली पे वो सवार थी मेरे,
पहली बार जब उसे मैंने था देखा।

भावार्थ: 'सिंदूर' से जलन क्यों?

कविता के अंत में जब कवि कहता है, "मेरी बिंदी को उसके सिंदूर से जलन थी", तो यह कोई नकारात्मक भाव नहीं है। यह एक पिता का अधिकार (Possessiveness) है। 'बिंदी' बेटी की उस स्वतंत्र पहचान का प्रतीक है जो पिता ने उसे दी, जबकि 'सिंदूर' उसके नए जीवन का।

एक पिता के लिए यह स्वीकार करना कठिन होता है कि उसकी मूक तपस्या (Silent Sacrifice) अब पूर्ण हो चुकी है। यह कविता बेटी के जीवन प्रबंधन (Life Management) में पिता की भूमिका को रेखांकित करती है।

🎬 कविता पाठ - हर्ष नाथ झा

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q: इस कविता का मुख्य संदेश क्या है?
A: यह कविता पिता और पुत्री के बीच के प्रेम और गर्व को दर्शाती है। यह विदाई के दुख से ज्यादा उस मज़बूत रिश्ते (Relationship) का उत्सव है जो समय के साथ और गहरा होता जाता है।
Q: कविता में 'शेरनी-सा अंदाज़' का क्या अर्थ है?
A: इसका अर्थ है कि बेटी केवल कोमल ही नहीं, बल्कि अपनी दादी (कवि की माँ) की तरह साहसी और निडर भी है। पिता ने उसे केवल लाड़ नहीं, बल्कि ताकत भी दी है।
"हर्ष नाथ झा स्मृति, रिश्तों और मानवीय संवेदनाओं के कवि हैं। उनकी रचनाएँ पितृत्व और सामाजिक मौन को स्वर देती हैं।"

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