अज्ञेय की 'घृणा का गान': भावार्थ, सारांश और विस्तृत विश्लेषण
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' को हिंदी साहित्य में हम मुख्य रूप से 'प्रयोगवाद' और व्यक्तिवाद के सूक्ष्म शिल्पी के रूप में जानते हैं। लेकिन, 30 जनवरी 1935 को लाहौर की पृष्ठभूमि में रचित उनकी यह कविता 'घृणा का गान' उनके रचना-संसार का एक बिल्कुल अलग, दहकता हुआ पृष्ठ है।
यह कविता महज़ कुछ पंक्तियों का समूह नहीं है; यह एक खुली अदालत है—एक ऐसा आरोप-पत्र जो सदियों से चले आ रहे वर्गीय शोषण, छुआछूत, पूँजीवाद और धार्मिक आडंबर की बखिया उधेड़ देता है। जब भी हम पाश की विद्रोही कविता ‘जब बगावत खौलती है’ का विश्लेषण पढ़ते हैं या अज्ञेय की अन्य प्रसिद्ध और गूढ़ कविताओं से गुज़रते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि अज्ञेय बहुत पहले ही इस वैचारिक 'रण-भेरी' को बजा चुके थे। आइए, साहित्यशाला के इस विशेष लेख में इस कालजयी रचना का गहराई से विश्लेषण करें।
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' - एक ऐसा रचनाकार जिसने निजता के साथ-साथ समाज की नग्न सच्चाइयों को भी अपने साहित्य में बेबाकी से जगह दी।
घृणा का गान - मूल कविता (Original Poem Lyrics)
हिंदी (Devnagari)
सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान!
तुम, जो भाई को अछूत कह वस्त्र बचा कर भागे,
तुम, जो बहिनें छोड़ बिलखती, बढ़े जा रहे आगे!
रुक कर उत्तर दो, मेरा है अप्रतिहत आह्वान-
सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान!
तुम, जो बड़े-बड़े गद्दों पर ऊँची दूकानों में,
उन्हें कोसते हो जो भूखे मरते हैं खानों में,
तुम, जो रक्त चूस ठठरी को देते हो जल-दान-
सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान!
तुम, जो महलों में बैठे दे सकते हो आदेश,
'मरने दो बच्चे, ले आओ खींच पकड़ कर केश!'
नहीं देख सकते निर्धन के घर दो मुट्ठी धान-
सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान!
तुम, जो पा कर शक्ति कलम में हर लेने की प्राण-
'नि:शक्तों' की हत्या में कर सकते हो अभिमान!
जिनका मत है, 'नीच मरें, दृढ़ रहे हमारा स्थान'-
सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान!
तुम, जो मन्दिर में वेदी पर डाल रहे हो फूल,
और इधर कहते जाते हो, 'जीवन क्या है? धूल!'
तुम, जिस की लोलुपता ने ही धूल किया उद्यान-
सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान!
तुम, सत्ताधारी, मानवता के शव पर आसीन,
जीवन के चिर-रिपु, विकास के प्रतिद्वन्द्वी प्राचीन,
तुम, श्मशान के देव! सुनो यह रण-भेरी की तान-
आज तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान!
— लाहौर, 30 जनवरी, 1935
Hinglish (Roman Hindi)
Suno, tumhe lalkar raha hoon, suno ghrina ka gaan! Tum, jo bhai ko achhoot kah vastra bacha kar bhaage, Tum, jo bahinein chhod bilakhti, badhe ja rahe aage! Ruk kar uttar do, mera hai apratihat aahvaan- Suno, tumhe lalkar raha hoon, suno ghrina ka gaan! Tum, jo bade-bade gaddon par oonchi dukanon mein, Unhein kosate ho jo bhookhe marte hain khanon mein, Tum, jo rakt choos thathri ko dete ho jal-daan- Suno, tumhe lalkar raha hoon, suno ghrina ka gaan! Tum, jo mahlon mein baithe de sakte ho aadesh, 'Marne do bachche, le aao kheench pakad kar kesh!' Nahi dekh sakte nirdhan ke ghar do mutthi dhaan- Suno, tumhe lalkar raha hoon, suno ghrina ka gaan! Tum, jo pa kar shakti kalam mein har lene ki praan- 'Nishakton' ki hatya mein kar sakte ho abhimaan! Jinka mat hai, 'neech marein, dridh rahe hamara sthaan'- Suno, tumhe lalkar raha hoon, suno ghrina ka gaan! Tum, jo mandir mein vedi par daal rahe ho phool, Aur idhar kahte jaate ho, 'jeevan kya hai? dhool!' Tum, jis ki lolupta ne hi dhool kiya udyaan- Suno, tumhe lalkar raha hoon, suno ghrina ka gaan! Tum, sattadhari, manavta ke shav par aaseen, Jeevan ke chir-ripu, vikas ke pratidvandvi pracheen, Tum, shmashan ke dev! Suno yah ran-bheri ki taan- Aaj tumhe lalkar raha hoon, suno ghrina ka gaan!
कविता का भावार्थ और वर्गीय विमर्श (Poem Meaning)
अज्ञेय समाज के अलग-अलग शोषक वर्गों को सीधे कटघरे में खड़ा करते हैं। "सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान!" की आवृत्ति एक उद्घोषक की तरह काम करती है।
- सामाजिक कुरीति और अमानवीयता: "तुम, जो भाई को अछूत कह वस्त्र बचा कर भागे..." कवि उस सवर्ण या उच्च वर्ग को ललकार रहा है जो छुआछूत का पालन करता है। यह बिल्कुल वैसा ही दर्द है जिसे हम अदम गोंडवी की गज़ल ‘वेद में जिनका हवाला’ (शंबूक प्रसंग) में शोषितों के प्रति अमानवीयता के रूप में देखते हैं।
- पूँजीवादी शोषण (Capitalist Exploitation): यहाँ निशाना वे पूँजीपति हैं जो ऊँची दुकानों और गद्दों पर बैठकर मुनाफा कमाते हैं, लेकिन उन मज़दूरों को कोसते हैं जो खदानों के अंधेरे में उनके लिए अपनी जान गँवाते हैं। इस मज़दूर वर्ग की पीड़ा का सजीव चित्रण हमें पाश की मार्मिक कविता 'उसके नाम' में भी मिलता है।
- बौद्धिक अहंकार और सत्ता: "नीच मरें, दृढ़ रहे हमारा स्थान।" यह उस बौद्धिक बेईमानी पर प्रहार है जो शोषितों की हत्या को कूटनीति के नाम पर उचित ठहराती है। इसी मानसिक द्वंद्व को गजानन माधव मुक्तिबोध ने अपनी रचना 'ब्रह्मराक्षस' में उकेरा है।
"तुम, जो रक्त चूस ठठरी को देते हो जल-दान" - पूँजीवादी व्यवस्था में शोषक और शोषित वर्ग के बीच की गहरी खाई का मनोवैज्ञानिक चित्रण।
राजनीतिक संदर्भ और वैचारिक विश्लेषण
1935 में लिखी गई यह कविता आज 21वीं सदी के वैश्विक परिदृश्य में भी उतनी ही प्रासंगिक है। आज जब हम बढ़ती आर्थिक असमानता की रिपोर्टें पढ़ते हैं, तब अज्ञेय के "बड़े-बड़े गद्दों पर ऊँची दूकानों में" बैठे लोग जीवंत हो उठते हैं। आम आदमी और सत्ता का यह क्रूर टकराव हमें त्रिलोचन की रचना 'आज मैं तुम्हारा हूँ' की याद दिलाता है।
अज्ञेय की वैचारिक यात्रा: क्रांतिकारी से अस्तित्ववादी
साहित्यिक दृष्टि से यह कविता अज्ञेय के भीतर के मार्क्सवादी (Marxist) प्रभाव को दर्शाती है। बाद में बाबा नागार्जुन या दुष्यंत कुमार की गज़लों में जो व्यवस्था के प्रति आक्रोश देखने को मिलता है (जैसे हमने दुष्यंत और नागार्जुन की तुलनात्मक समीक्षा में चर्चा की थी), उसकी स्पष्ट अनुगूंज इस कविता में है। हालाँकि, यह अज्ञेय के स्थायी मार्क्सवाद की नहीं, बल्कि उनके प्रारम्भिक क्रांतिकारी मानवीय आक्रोश की अभिव्यक्ति है। बाद में वे व्यक्तिवादी दर्शन की ओर मुड़ गए।
प्रतीकवाद: 'घृणा' का दार्शनिक अर्थ
निष्कर्ष: एक वैचारिक घोषणापत्र
अज्ञेय की 'घृणा का गान' महज़ एक कविता नहीं, बल्कि हर उस व्यवस्था के खिलाफ एक वैचारिक घोषणापत्र है जो मनुष्य को मनुष्य नहीं समझती। जिस तरह अब्दुल्लाह ज़रीम की रचना 'दस्त-ए-ताज़ीर चूमने वाले' सत्ता के चापलूसों पर प्रहार करती है, उसी तरह यह कविता हमारे गिरेबान में हाथ डालकर पूछती है कि क्या हमने वाकई उस 'श्मशान के देव' को हरा दिया है?
हमें त्रिलोचन के शब्दों में 'पथ पर चलते रहो निरंतर' के मंत्र को अपनाना होगा। क्योंकि जैसा कि कहा गया है: "वो आदमी नहीं है, मुकम्मल बयान है।" अंततः, सत्य की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता, और इतिहास में उनका नाम लिया ही जाएगा जिन्होंने अन्याय के खिलाफ आवाज़ बुलंद की।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. 'घृणा का गान' कविता अज्ञेय ने कब और कहाँ लिखी थी?
यह कविता 30 जनवरी 1935 को लाहौर में रची गई थी, जब अज्ञेय अपने शुरुआती क्रांतिकारी और समाजवादी विचारों के गहरे प्रभाव में थे।
2. इस कविता का मुख्य विषय (Theme) क्या है?
इस कविता का मुख्य विषय शोषक वर्ग (पूँजीपति, धर्म के ठेकेदार, और क्रूर सत्ताधीश) का कड़ा विरोध और समाज में व्याप्त छुआछूत, गरीबी और अमानवीयता के खिलाफ एक शंखनाद है।
3. अज्ञेय 'श्मशान के देव' किसे कहते हैं?
अज्ञेय उन सत्ताधारियों, पूँजीपतियों और शोषकों को 'श्मशान के देव' कहते हैं जो मानवता और विकास के शव पर बैठकर अपनी सत्ता और विलासिता का आनंद लेते हैं।
4. कविता में ‘घृणा’ शब्द का प्रतीकात्मक अर्थ क्या है?
यहाँ 'घृणा' कोई दुर्भावना नहीं है, बल्कि यह शोषक व्यवस्था और अन्याय के खिलाफ उठने वाली शुद्ध 'नैतिक प्रतिरोध की ऊर्जा' का प्रतीक है。
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