सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' (Agyeya) आधुनिक हिंदी साहित्य के उन विरले रचनाकारों में से हैं, जिन्होंने मनुष्य के मन और उसके अस्तित्व (Existentialism) के सबसे गहरे रहस्यों को अपनी कविताओं में पिरोया है। उनकी प्रसिद्ध कविता "उधार" (Udhaar) प्रकृति से मनुष्य के लेन-देन और ईश्वर या मृत्यु के साथ उसके रहस्यमयी साक्षात्कार की एक अद्भुत दार्शनिक रचना है। इस कविता में जीवन का उल्लास भी है और रात के अंधेरे में छिपा हुआ वह अज्ञात भय भी, जिसका सामना हर मनुष्य को एकांत में करना पड़ता है। आइए, इस उत्कृष्ट रचना को पढ़ते हैं और इसकी गहराई को समझते हैं।
उधार - अज्ञेय (Poem Lyrics)
और एक चिड़िया अभी-अभी गा गई थी।
मैनें धूप से कहा: मुझे थोड़ी गरमाई दोगी उधार
चिड़िया से कहा: थोड़ी मिठास उधार दोगी?
मैनें घास की पत्ती से पूछा: तनिक हरियाली दोगी—
तिनके की नोक-भर?
शंखपुष्पी से पूछा: उजास दोगी—
किरण की ओक-भर?
मैने हवा से मांगा: थोड़ा खुलापन—बस एक प्रश्वास,
लहर से: एक रोम की सिहरन-भर उल्लास।
मैने आकाश से मांगी
आँख की झपकी-भर असीमता—उधार।
यों मैं जिया और जीता हूँ
क्योंकि यही सब तो है जीवन—
गरमाई, मिठास, हरियाली, उजाला,
गन्धवाही मुक्त खुलापन,
लोच, उल्लास, लहरिल प्रवाह,
और बोध भव्य निर्व्यास निस्सीम का:
ये सब उधार पाये हुए द्रव्य।
सामने से जागा जिस में
एक अनदेखे अरूप ने पुकार कर
मुझ से पूछा था: "क्यों जी,
तुम्हारे इस जीवन के
इतने विविध अनुभव हैं
इतने तुम धनी हो,
तो मुझे थोड़ा प्यार दोगे—उधार—जिसे मैं
सौ-गुने सूद के साथ लौटाऊँगा—
और वह भी सौ-सौ बार गिन के—
जब-जब मैं आऊँगा?"
मैने कहा: प्यार? उधार?
स्वर अचकचाया था, क्योंकि मेरे
अनुभव से परे था ऐसा व्यवहार ।
उस अनदेखे अरूप ने कहा: "हाँ,
क्योंकि ये ही सब चीज़ें तो प्यार हैं—
यह अकेलापन, यह अकुलाहट,
यह असमंजस, अचकचाहट,
आर्त अनुभव,
यह खोज, यह द्वैत, यह असहाय
विरह व्यथा,
यह अन्धकार में जाग कर सहसा पहचानना
कि जो मेरा है वही ममेतर है
यह सब तुम्हारे पास है
तो थोड़ा मुझे दे दो—उधार—इस एक बार—
मुझे जो चरम आवश्यकता है।"
उस ने यह कहा,
पर रात के घुप अंधेरे में
मैं सहमा हुआ चुप रहा; अभी तक मौन हूँ:
अनदेखे अरूप को
उधार देते मैं डरता हूँ:
क्या जाने
यह याचक कौन है?
कविता का विस्तृत साहित्यिक विश्लेषण (Meaning & Analysis)
अज्ञेय की कविता 'उधार' मानव मनोविज्ञान और दार्शनिक रहस्यवाद का एक उत्कृष्ट दस्तावेज़ है। कविता के पहले भाग में कवि जीवन जीने के लिए प्रकृति के अलग-अलग उपादानों से कुछ न कुछ 'उधार' मांगता है—धूप से गर्माहट, चिड़िया से मिठास, घास से हरियाली और आकाश से असीमता। मनुष्य जीवन भर इन्हीं बाहरी सुखों को समेटता है और सोचता है कि यही असली जीवन है। इस जीवन की निरंतरता और आगे बढ़ने की प्रेरणा हमें त्रिलोचन की रचना पथ पर चलते रहो निरंतर में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
लेकिन कविता का असली 'ट्विस्ट' और दार्शनिक गहराई दूसरे भाग में आती है। जब रात के गहन अंधकार में एक 'अनदेखा अरूप' (ईश्वर, नियति या मृत्यु) कवि से उसके व्यक्तिगत अनुभव—उसका अकेलापन, अकुलाहट, असमंजस और विरह व्यथा—उधार मांगता है, तो कवि भयभीत हो जाता है। वह समझ नहीं पाता कि जो दुख और पीड़ा उसने जीवन भर सहे हैं, उन्हें कोई 'प्यार' का नाम देकर क्यों मांग रहा है? अज्ञेय की ही एक अन्य कविता घृणा का गान में भी हमें मानवीय भावनाओं के ऐसे ही जटिल अंतर्द्वंद्व देखने को मिलते हैं।
अज्ञेय का यह अस्तित्ववादी (Existential) संकट और रात के अंधेरे में अपनी ही चेतना से सामना करना, गजानन माधव मुक्तिबोध की कालजयी रचना अंधेरे में की याद दिलाता है, जहाँ कवि खुद से और उस अज्ञात सत्ता से छिपता फिरता है। यह एकांत और स्वयं से संघर्ष रमेश चंद्र शाह की कविता अकेला मेला के भावबोध के भी बेहद करीब है।
अंत में, कवि का यह डर कि "क्या जाने यह याचक कौन है?" मृत्यु के भय और जीवन के अंत को दर्शाता है। मृत्यु और अंत के इस अबूझ रहस्य को केदारनाथ सिंह ने अपनी सुप्रसिद्ध कविता अंत महज़ एक मुहावरा है में भी बड़ी शिद्दत से उकेरा है। और जहाँ तक मनुष्य के मौन और उसकी आंखों में छिपे इस सन्नाटे की बात है, उसे श्रीकांत वर्मा की रचना माँ की आँखें जैसी कविताओं में बड़ी मार्मिकता से समझा जा सकता है।
निष्कर्ष: अज्ञेय की यह कविता हमें आत्म-मंथन के उस शिखर पर ले जाती है जहाँ हम यह सोचने पर विवश हो जाते हैं कि भौतिक सुखों को लेना कितना आसान है, लेकिन अपनी पीड़ा, अपने एकांत और अपने 'स्व' को उस परम सत्ता को सौंप देना कितना डरावना है। साहित्य की ऐसी ही और गहन यात्राओं के लिए साहित्यशाला के साथ जुड़े रहें।