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प्रकृति पर 6 हिंदी कविताएँ: वर्षा, बसंत और हरियाली का सौंदर्य | Hindi Poems On Nature

50+ होली पर कविताएं | Holi Par Hasya Kavita & Best Hindi Poems Collection

Holi Par Hindi Poems Collection

होली पर कविता - Holi Par Hindi Poems

होली रंगों, उमंगों और प्रेम का त्यौहार है। साहित्यशाला पर प्रस्तुत है हिंदी साहित्य की चुनिंदा और बेहतरीन होली कविताओं का विशाल संग्रह।

1. होली पर हास्य कविताएं (Holi Funny Poems)

होली का मज़ा हंसी-ठिठोली के बिना अधूरा है। पेश हैं कुछ गुदगुदाने वाली हास्य कविताएं।

बैगन जी की होली - कृष्ण कुमार यादव

टेढ़े-मेढ़े बैगन जी होली पर ससुराल चले बीच सड़क पर लुढ़क-लुढ़क कैसी ढुलमुल चाल चले पत्नी भिण्डी मैके में बनी-ठनी तैयार मिलीं हाथ पकड़ कर वह उनका ड्राइंगरूम में साथ चलीं मारे खुशी, ससुर कद्दू देख बल्लियों उछल पड़े लौकी सास रंग भीगी बैगन जी भी फिसल पड़े इतने में उनकी साली मिर्ची जी भी टपक पड़ीं रंग भरी पिचकारी ले जीजाजी पर झपट पड़ीं बैगन जी गीले-गीले हुए बैगनी से पीले।

महंगाई की होली (हास्य व्यंग्य) - मनोज खरे

उमरिया हिरनिया हो गई, देह इन्द्र- दरबार। मौसम संग मोहित हुए, दर्पण-फूल-बहार॥ शाम सिंदूरी होंठ पर, आंखें उजली भोर। भैरन नदिया सा चढ़े, यौवन ये बरजोर॥ तितली झुक कर फूल पर, कहती है आदाब। सीने में दिल की जगह, रक्खा लाल गुलाब॥ रहे बदलते करवटें, हम तो पूरी रात। अब के जब हम मिलेंगे, करनी क्या-क्या बात॥ मन को बड़ा लुभा रही, हंसी तेरी मन मीत। काला जादू रूप का, कौन सकेगा जीत॥ गढ़े कसीदे नेह के, रंगों के आलेख। पास पिया को पाओगी, आंखें बंद कर देख॥ “हिन्दुस्तान का कवि: कितना आसान है दुश्मनी को भुलाना बस दुश्मन को घेरना और उसे रंग है लगाना...! अच्छा हुआ दोस्त जो तूने होली पर रंग लगा कर हंसा दिया वरना अपने चेहरे का रंग तो महंगाई ने कब का उड़ा दिया”

बनेगी होली

निकल पड़ी मद-मस्त ये टोली, सबकी जुबाँ पे एक ही बोली फिर से सजेगी रंग की महफिल, प्यार की धारा बनेगी होली। होली के ओजार कई हैं, जोड़ने वाले तार कई हैं रंग बिरंगे बादल से होने वाली बोछार कई है पिचकारी का ज़ोर क्या कम है, बन्दूक में ही रहने दो गोली फिर से सजेगी रंग की महफिल, प्यार की धारा बनेगी होली| कब तक रूठे रहोगे तुम, बोलो कुछ क्यों हो गुमसुम तुमको रंग लगाने में लगता कट जाएगी दुम कड़वाहट की कैद से निकलो; अब तो बन जाओ हमजोली फिर से सजेगी रंग की महफिल, प्यार की धारा बनेगी होली|

2. बच्चों के लिए होली बाल कविता (Holi Poems for Kids)

स्कूल जाने वाले नन्हे-मुन्ने बच्चों के लिए प्यारी कविताएं।

देखो-देखो होली है आई - श्रीमती ममता असाटी

देखो-देखो होली है आई चुन्नू-मुन्नू के चेहरे पर खुशियां हैं आई मौसम ने ली है अंगड़ाई। शीत ऋतु की हो रही है बिदाई ग्रीष्म ऋतु की आहट है आई सूरज की किरणों ने उष्णता है दिखलाई देखो-देखो होली है आई। बच्चों ने होली की योजना खूब है बनाई रंगबिरंगी पिचकारियां बाबा से है मंगवाई रंगों और गुलाल की सूची है रखवाई जिसकी काका ने अनुमति है नहीं दिलवाई। दादाजी ने प्राकृतिक रंगों की बात है समझाई जिस पर सभी बच्चों ने सहमति है जतलाई बच्चों ने खूब मिठाइयां खाकर शहर में खूब धूम है मचाई देखो-देखो होली है आई। होली ने भक्त प्रहलाद की स्मृति है करवाई बच्चों और बड़ों ने कचरे और अवगुणों की होली है जलाई होली ने कर दी है अनबन की सफाई जिसने दी है प्रेम की जड़ों को गहराई। बच्चों! अब है परीक्षा की घड़ी आई तल्लीनता से करो पढ़ाई वरना सहनी पड़ेगी पिटाई अथक परिश्रम, पुनरावृत्ति देगी सफलता अपार जन-जन की मिलेगी बधाई होगा प्रतीत ऐसा होली-सी खुशियां हैं फिर लौट आई देखो-देखो होली है आई।

मुट्ठी में है लाल गुलाल – प्रभुदयाल श्रीवास्तव

नोमू का मुंह पुता लाल से सोमू की पीली गुलाल से कुर्ता भीगा राम रतन का, रम्मी के हैं गीले बाल। मुट्ठी में है लाल गुलाल।। चुनियां को मुनियां ने पकड़ा नीला रंग गालों पर चुपड़ा इतना रगड़ा जोर-जोर से, फूल गए हैं दोनों गाल। मुट्ठी में है लाल गुलाल।। लल्लू पीला रंग ले आया कल्लू ने भी हरा रंग उड़ाया रंग लगाया एक-दूजे को, लड़े-भिड़े थे परकी साल। मुट्ठी में है लाल गुलाल।। कुछ के हाथों में पिचकारी गुब्बारों की मारा-मारी। रंग-बिरंगे सबके कपड़े, रंग-रंगीले सबके भाल। मुट्ठी में है लाल गुलाल।। इन्द्रधनुष धरती पर उतरा रंगा, रंग से कतरा-कतरा नाच रहे हैं सब मस्ती में, बहुत मजा आया इस साल। मुट्ठी में है लाल गुलाल।।

पिचकारी रे पिचकारी – सुमित शर्मा

पिचकारी रे पिचकारी रे कितनी प्यारी पिचकारी। छुपकर रहती रोजाना, होली पर आ जाती है, रंग-बिरंगे रंगों को इक-दूजे पर बरसाती है। कोई हल्की, कोई भारी, कितनी प्यारी पिचकारी। होता रूप अजब अनूठा, कोई पतली, कोई छोटी, दुबली दिखती, गोल-मटोल, कोई रहती मोटी-मोटी। देखो सुन्दर लगती सारी, कितनी प्यारी पिचकारी। होली का त्योहार तो भैया, इसके बिना रहे अधूरा, नहीं छोड़े दूजों पर जब तक, मजा नहीं आता है पूरा। करती रंगों की तैयारी कितनी प्यारी पिचकारी।

अम्मा बोली - होली कोट्स

बड़े प्यार से अम्मा बोली। खूब मनाओ भैया होली।। नहीं करेंगे कभी कुसंग। डालो सभी परस्पर रंग।। एक वर्ष में होली आई। जी भर खेलो खाओ मिठाई।। ध्यान लगाकर सुनो-पढ़ो। नए-नए सोपान चढ़ो।। बच्चे शोर मचाए होली। उछले-कूदें खेलें होली।। बड़े प्यार से अम्मा बोली। खूब मनाओ भैया होली।।

रंग रंगीली आई होली – सीमा सचदेव (प्रेरक)

नन्ही गुड़िया माँ से बोली माँ मुझको पिचकारी ले दो इक छोटी सी लारी ले दो रंग-बिरंगे रंग भी ले दो उन रंगों में पानी भर दो मैं भी सबको रग डालूँगी रंगों के संग मज़े करूँगी मैं तो लारी में बैठूँगी अन्दर से गुलाल फेंकूँगी माँ ने गुड़िया को समझाया और प्यार से यह बतलाया तुम दूसरो पे रंग फेंकोगी और अपने ही लिए डरोगी रँग नहीं मिलते है अच्छे हुए बीमार जो इससे बच्चे तो क्या तुमको अच्छा लगेगा जो तुम सँग कोई न खेलेगा... (सीख: अनाथालय में होली मनाने की प्रेरणा) चलो अनाथालय में जाएँ भूखे बच्चों को खिलाएँ आओ उन संग खेले होली वो भी तेरे है हमजोली...

रंग फुहारों से (बाल कविता)

रंग फुहारों से हर ओर भींग रहा है घर आगंन फागुन के ठंडे बयार से थिरक रहा हर मानव मन ! लाल गुलाबी नीली पीली खुशियाँ रंगों जैसे छायीं ढोल मजीरे की तानों पर बजे उमंगों की शहनाई ! गुझिया पापड़ पकवानों के घर घर में लगते मेले खाते गाते धूम मचाते मन में खुशियों के फूल खिले ! रंग बिरंगी दुनिया में हर कोई लगता एक समान भेदभाव को दूर भागता रंगों का यह मंगलगान ! पिचकारी के बौछारों से चारो ओर छाई उमंग खुशियों के सागर में डूबी दुनिया में फैली प्रेम तरंग !

3. होली की सर्वश्रेष्ठ कविताएं (Best Hindi Poems)

रंगों का त्यौहार है होली - गुलशन मदान

रंगों का त्यौहार है होली खुशियों की बौछार है होली लाल गुलाबी पीले देखो रंग सभी रंगीले देखों पिचकारी भर-भर ले आते इक दूजे पर सभी चलाते होली पर अब ऐसा हाल हर चेहरे पर आज गुलाल आओ यारो इसी बहाने दुश्मन को भी चलो मनाने

सांझ से ही आ बैठी – प्रवीण पंडित

मन में भर उल्लास, मुट्ठियां भर भर रंग लिये सांझ से ही आ बैठी, होली मादक गंध लिये एक हथेली मे चुटकी भर ठंडा सा अहसास दूजे हाथ लिये किरची भर नरम धूप सौगात उजियारे के रंग पूनमी मटियाली बू-बास भीगे मौसम की अंगड़ाई लेकर आई पास अल्हड़-पन का भाव सुकोमल पूरे अंग लिये सांझ से ही आ बैठी होली मादक गंध लिये लहरों से लेकर हिचकोले,पवन से अठखेली चौखट-चौखट बजा मंजीरे, फिरती अलबेली कहीं से लाई रंग केसरी, कहीं से कस्तूरी लाजलजीली हुई कहीं पर खुल कर भी खेली नयन भरे कजरौट अधर भर भर मकरंद लिये सांझ से ही आ बैठी ,होली मादक गंध लिये...!

फागुन बनकर – शोभा महेन्द्रू

बरस गए हैं मेरी आँखों में हज़ारों सपने महकने लगे हैं टेसू और मन बावला हुआ जाता है सपनों की कलियाँ दिल की हर डाल पर फूट रही है और ये उपवन नन्दन हुआ जाता है समझ नहीं पा रही हूँ ये तुम हो या मौसम जो बरसा है मुझपर फागुन बनकर

काव्य की पिचकारी – आचार्य संजीव सलिल

रंगोत्सव पर काव्य की पिचकारी गह हाथ. शब्द-रंग से कीजिये, तर अपना सिर-माथ फागें, होरी गाइए, भावों से भरपूर. रस की वर्षा में रहें, मौज-मजे में चूर. भंग भवानी इष्ट हों, गुझिया को लें साथ बांह-चाह में जो मिले उसे मानिए नाथ. लक्षण जो-जैसे वही, कर देंगे कल्याण. दूरी सभी मिटाइये, हों इक तन-मन-प्राण.

नाना नव रंगों को फिर ले आयी होली – महेन्द्र भटनागर

नाना नव रंगों को फिर ले आयी होली, उन्मत्त उमंगों को फिर भर लायी होली ! आयी दिन में सोना बरसाती फिर होली, छायी, निशि भर चाँदी सरसाती फिर होली ! रुनझुन-रुनझुन घुँघरू कब बाँध गयी होली, अंगों में थिरकन भर, स्वर साध गयी होली ! उर मे बरबस आसव री ढाल गयी होली, देखो, अब तो अपनी यह चाल नयी हो ली ! स्वागत में ढम-ढम ढोल बजाते हैं होली, होकर मदहोश गुलाल उड़ाते हैं होली !

मतवाली टोली – अजय यादव

रंग गुलाल लिये कर में निकली मतवाली टोली है ढोल की थाप पे पाँव उठे औ गूँज उठी फिर ’होली है कहीं फाग की तानें छिड़ती हैं कहीं धूम मची है रसिया की गोरी के मुख से गाली भी लगती आज मीठी बोली है बादल भी लाल गुलाल हुआ उड़ते अबीर की छटा देख धरती पे रंगों की नदियाँ अंबर में सजी रंगोली है रंगों ने कलुष जरा धोया जो रोक रहा था प्रेम-मिलन मन मिलकर एकाकार हुये, प्राणों में मिसरी घोली है सबके चेहरे इकरूप हुये, ’अजय’ न भेद रहा कोई यूँ सारे अंतर मिट जायें तो हर दिन यारो होली है...!

होली पर कविता (Holi Poem 6)

आओ मिलकर खेलें होली सब एक दूजे के संग खाओ गुजिया पी लो भांग हर घर महके खुशियों की तरंग हर गलियों में बाजे ढोल और संग बाजे मृदंग हिमांशु-शानू हो हर अंग खेलें सब लाल, पीले रंगों के संग हर गली में मचा दें हम सब आज रंगों की हुडदंग दे दो नफरत की होलिका में आहूति रंगों से लगा दो हर माथे पर भभूती नफरत के सब मिटा दो रंग प्यार को जगा कर नई उमंग खेलो सब संग प्यार के रंग आओ मिलकर खेलो सब संग सबको मिलकर भांग पिलाएं पी कर कोई हसंता जाए कोई देर तक हुडदंग मचाए खेलों सब खुशियों के संग आओ मिलकर खेलें होली सब एक दूजे के संग!!!

का संग खेलूं मैं होरी – मोहिन्दर कुमार (बिरह रस)

का संग खेलूं मैं होरी.. पिया गयल हैं विदेस रे पीहर मा होती तो सखियों संग खेलती झांकन ना दे बाहर अटारिया से सासू का सख्त आदेस रे का संग खेलूं मैं होरी.. पिया गयल हैं विदेस रे लत्ता ना भावे मोको, गहना ना भावे सीने में उठती है हूक रे याद आवे पीहर की रंग से भीगी देहरिया और गुलाल से रंगे मुख-केस रे का संग खेलूं मैं होरी.. पिया गयल हैं विदेस रे अंबुआ पे झुलना, सखियों की बतियां नीर बहाऊं और सोचूं मैं दिन रतियां पिया छोड के आजा ऐसी नौकरिया जिसने है डाला सारा कलेस रे का संग खेलूं मैं होरी.. पिया गयल हैं विदेस रे...

4. पौराणिक और पारंपरिक होली (Ram-Sita)

होली केवल साधारण मनुष्यों का नहीं, देवताओं का भी प्रिय पर्व है।

होली खेले सिया की सखियां – स्व. शांति देवी वर्मा

होली खेलें सिया की सखियाँ, जनकपुर में छायो उल्लास.... रजत कलश में रंग घुले हैं, मलें अबीर सहास. होली खेलें सिया की सखियाँ... रंगें चीर रघुनाथ लला का, करें हास-परिहास. होली खेलें सिया की सखियाँ... एक कहे: 'पकडो, मुंह रंग दो, निकरे जी की हुलास' होली खेलें सिया की सखियाँ... दूजी कहे: 'कोऊ रंग चढ़े ना, श्याम रंग है खास.' होली खेलें सिया की सखियाँ... सिया कहें: 'रंग अटल प्रीत का, कोऊ न अइयो पास.' होली खेलें सिया की सखियाँ... सियाजी, श्यामल हैं प्रभु, कमल-भ्रमर आभास. होली खेलें सिया की सखियाँ... "शान्ति" निरख छवि, बलि-बलि जाए, अमिट दरस की प्यास. होली खेलें सिया की सखियाँ...

होली खेले चारों भाई – स्व. शांति देवी वर्मा

होली खेले चारों भाई , अवधपुरी के महलों में... अंगना में कई हौज बनवाये, भांति-भांति के रंग घुलाये. पिचकारी भर धूम मचाएं, अवधपुरी के महलों में... राम-लखन पिचकारी चलायें, भारत-शत्रुघ्न अबीर लगायें. लखें दशरथ होएं निहाल, अवधपुरी के महलों में... सिया-श्रुतकीर्ति रंग में नहाई, उर्मिला-मांडवी चीन्ही न जाई. हुए लाल-गुलाबी बाल, अवधपुरी के महलों में... कौशल्या कैकेई सुमित्रा, तीनों माता लेंय बलेंयाँ. पुरजन गायें मंगल फाग, अवधपुरी के महलों में... मंत्री सुमंत्र भेंटते होली, नृप दशरथ से करें ठिठोली. बूढे भी लगते जवान, अवधपुरी के महलों में... दास लाये गुझिया-ठंडाई, हिल-मिल सबने मौज मनाई. ढोल बजे फागें भी गाईं,अवधपुरी के महलों में... दस दिश में सुख-आनंद छाया, हर मन फागुन में बौराया. "शान्ति" संग त्यौहार मनाया, अवधपुरी के महलों में...

5. सामाजिक संदेश और देशभक्ति (Social Message)

अबकी बार होली में (वीर रस) – आचार्य संजीव सलिल

करो आतंकियों पर वार अबकी बार होली में, न उनको मिल सके घर-द्वार अबकी बार होली में, बना तोपों की पिचकारी चलाओ यार अब जी भर, बना तोपों की पिचकारी चलाओ यार अब जी भर, बहुत की शांति की बातें, लगाओ अब उन्हें लातें, न कर पायें घातें कोई अबकी बार होली में, पिलाओ भांग उनको फिर नचाओ भांगडा जी भर, कहो बम चला कर बम, दोस्त अबकी बार होली में, छिपे जो पाक में नापाक हरकत कर रहे जी भर, करो बस सूपड़ा ही साफ़ अब की बार होली में, न मानें देव लातों के कभी बातों से सच मानो, चलो नहले पे दहला यार अबकी बार होली में, जहाँ भी छिपे हैं वे, जा वहीं पर खून की होली, चलो खेलें "सलिल" मिल साथ अबकी बार होली में॥

रंगों में तिरंगा

"अलग-अलग धर्मों के फ्लेग्स ने होली मनाई, एक-दूसरे को खूब रंगा बाद में सबने देखा तो पता चला उनमें से हर एक बन चुका था तिरंगा" "आपको रंगों से एलर्जी है चलिए आपको रंग नहीं लगाएंगे मगर साथ तो बैठिएगा रंगीन बातों से ही होली मनाएंगे"

होली की मस्ती कविता – मदन मोहन (सुधार)

कुछ एसा अदभुत चमत्कार अबकी होली में हो जाये, कुछ एसा अदभुत चमत्कार हो जाये भ्रष्टाचार स्वाहा, महगाई,झगड़े, लूटमार सब लाज शर्म को छोड़ छाड़,हम करें प्रेम से छेड़ छाड़ गौरी के गोरे गालों पर ,अपने हाथों से मल गुलाल जा लगे रंग,महके अनंग,हर अंग अंग हो सरोबार इस मस्ती में,हर बस्ती में,बस जाये केवल प्यार प्यार दुर्भाव हटे,कटुता सिमटे,हो भातृभाव का बस प्रचार अबकी होली में हो जाये,कुछ एसा अदभुत चमत्कार॥

इस होली पर कैसे – योगेश समदर्शी (सामाजिक दर्द)

अभी हरे हैं घाव, कहां से लाऊं चाव, नहीं बुझी है राख, अभी तक ताज की खून, खून का रंग, देख-देख मैं दंग, इस होली पर कैसे, करलूं बातें साज की उसके कैसे रंगू मैं गाल जिसका सूखा नहीं रुमाल उन भीगे होठों को कह दूं मैं होली किस अंदाज की इस होली पर कैसे, करलूं बातें साज की...!

जश्न जारी… – धीरेन्द्र सिंह “काफ़िर”

पतझड़ में पत्ते शाखें छोड़ देते हैं सदाबहार जब आता है तो बहार जवाँ होती है हम भी कुछ इसी तरह से जश्न जारी रखते हैं मातम भी मनाते हैं अपने-अपने इन पेड़-पौधों जैसा नहीं कुछ भी साथ-साथ नहीं दिवाली में पटाखे जलाए उजाला मचाया होली में रंग गए रंग उडाये मगर रूह में वही पुराना अँधेरा वही कालिख..

6. होली स्टेटस और शुभकामना संदेश (Short Poems)

रंग दे रंगवाले

रंगवाले देर क्या है मेरा चोला रंग दे । और सारे रंग धो कर रंग अपना रंग दे ॥ कितने ही रंगो से मैने आज तक है रंगा इसे । पर वो सारे फीके निकले तू ही गाढ़ा रंग दे ॥ तूने रंगे हैं ज़मीं और आसमां जिस रंग से । बस उसी रंग से तू आख़िर मेरा चोला रंग दे ॥ मैं तो जानूंगा तभी तेरी ये रंगन्दाज़ियां । जितना धोऊं उतना चमके अब तो ऐसा रंग दे ॥

मेरे रंग तुम्हारा चेहरा

“मेरे रंग तुम्हारा चेहरा होली के दिन बिठाना पहरा दिल तुम्हारा पास है मेरे अब बचाना अपना चेहरा”

Holi Poem 23

होली है आई आज मेरे द्वार, मिल जाएंगे सखा सहेली और पुराने यार, शोर से मोहल्ला सराबोर है, होली गीत के ही बजते ढ़ोल है, कोई बजाए ढोलक कोई मंजीरे, कोई बजाए लिए रंग गुलाल हाथ में कोई भरे पिचकारी, कोई झूमे भंगे के नशे में कोई फाग के गीतों में, दिल से दिल मिल जाए, कोयल यही मल्हार गाये। रंग रंगीला है यह त्यौहार साज जाए यादे जब मिले जाए यार....!

7. होली का महत्व और कहानी

होली के त्यौहार को मनाने के लिए अनेकों विधियां हैं। होली का त्यौहार केवल रंगों से ही नहीं मनाया जाता उसे अपने तरीके से किसी भी तरह मनाया जा सकता है जैसे कि होली की कविताएं, होली पर निबंध, होली के भाषण, होली पर शायरी आदि।

होली का त्यौहार बुराई पर अच्छाई की जीत का त्यौहार है। इसके पीछे भक्त प्रहलाद और हिरण्यकश्यप की कहानी है। हिरण्यकश्यप अपनी बहन होलिका (जिसे अग्नि में न जलने का वरदान था) के साथ प्रहलाद को जलाने बैठा, लेकिन विष्णु जी की कृपा से होलिका जल गई और प्रहलाद बच गए।

हरी हरी जप ले तेरा क्या जाता है, राजा तो कोई भी बन जाता है। हरि भक्त केवल वही कहलाता है जो हरी को दिल में बसाता है। होली का त्यौहार खुशियों का त्योहार है, इसे व्यर्थ ना जाने देना।

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सुना था कि बेहद सुनहरी है दिल्ली (Lyrics & Meaning) - Imran Pratapgarhi

सुना था कि बेहद सुनहरी है दिल्ली (Lyrics & Meaning) - Imran Pratapgarhi "Suna Tha Ki Behad Sunheri Hai Dilli" – यह सिर्फ एक कविता की पंक्ति नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों पर किया गया एक बेहद तीखा और मार्मिक राजनीतिक व्यंग्य है। इमरान प्रतापगढ़ी की यह रचना एक माँ की तड़प को आवाज़ देती है, जो चकाचौंध से भरी 'सुनहरी' दिल्ली में अपने लापता लाल (बेटे) और इंसाफ के लिए दर-दर भटक रही है। साहित्यशाला के इस लेख में हम केवल इस मशहूर कविता के पूरे बोल (Lyrics) ही नहीं पढ़ेंगे, बल्कि इसके पीछे छिपे उस गहरे प्रतीकात्मक अर्थ (Metaphorical Meaning) का भी विश्लेषण करेंगे, जिसने भारतीय राजनीति और समाज को झकझोर कर रख दिया था। प्रतीकात्मक चित्र: "सुनहरी" दिल्ली की खामोशी और एक बेबस माँ की गुहार। (Suna Tha Ki Behad Sunheri Hai Dilli - Visual Meaning) कविता की पृष्ठभूमि और राजनीतिक संदर्भ (Context) साहित्य हमेशा समाज का दर्पण होता है। जब भी सत्ता अपनी ज़िम्मेदारियों से मुँह मोड़ती है, तब फैज़ अहमद फैज़ की ...

Baba Jani Poem Lyrics: पिता-पुत्र की इस रुला देने वाली कविता ने लाखों दिलों को छुआ!

साहित्य का मूल उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के उन पृष्ठों को खोलना है जिन पर अक्सर धूल जम जाती है। "बाबा जानी" (Baba Jani) आधुनिक दौर की एक ऐसी ही मार्मिक रचना है, जो पीढ़ियों के बीच पनपते संवादहीनता (Generational Gap) और वृद्धावस्था के मनोवैज्ञानिक पहलुओं को बड़ी सूक्ष्मता से उकेरती है। जिस तरह सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की 'सरोज स्मृति' ने एक पिता के असीम वात्सल्य और शोक को अमर कर दिया, ठीक उसी तरह यह कविता एक वृद्ध, असहाय पिता और उसके अधीर, युवा बेटे के बीच के उस जटिल संवाद को प्रस्तुत करती है, जो आज के समाज का एक कड़वा यथार्थ बन चुका है। हिंदी साहित्य में जहाँ एक ओर धूमिल की 'किस्सा जनतन्त्र' जैसे रचनाओं में व्यवस्था और रोज़गार का संघर्ष झलकता है, और दिनकर की 'व्याल विजय' में सत्ता का वैचारिक द्वंद्व दिखाई देता है; वहीं, 'बाबा जानी' घर की चारदीवारी के भीतर चलने वाले उस मौन संघर्ष को स्वर देती है जहाँ मनुष्य की शारीरिक लाचारी उसके आत्मसम्मान से टकराती है...

Mahabharata Poem in Hindi: कृष्ण-अर्जुन संवाद (Amit Sharma) | Lyrics & Video

Last Updated: October 2026 Table of Contents: 1. Introduction 2. Full Lyrics (Krishna-Arjun Samvad) 3. Watch Video Performance 4. Literary Analysis (Sahitya Vishleshan) महाभारत पर रोंगटे खड़े कर देने वाली कविता Mahabharata Poem On Arjuna by Amit Sharma Visual representation of the epic dialogue between Krishna and Arjuna. This is one of the most requested Inspirational Hindi Poems based on the epic conversation between Lord Krishna and Arjuna. Explore our Best Hindi Poetry Collection for more Veer Ras Kavitayein. तलवार, धनुष और पैदल सैनिक कुरुक्षेत्र में खड़े हुए, रक्त पिपासु महारथी इक दूजे सम्मुख अड़े हुए | कई लाख सेना के सम्मुख पांडव पाँच बिचारे थे, एक तरफ थे योद्धा सब, एक तरफ समय के मारे थे | महा-समर की प्रतिक्षा में सारे ताक रहे थे जी, और पार्थ के रथ को केशव स्वयं हाँक रहे थे जी || रणभूमि के सभी नजारे देखन में कुछ खास लगे, माधव ने अर्जुन को देखा, अर्जुन उन्हें उदास लगे | ...