हम रह गए – एक संवेदनात्मक हिंदी ग़ज़ल | Miss Poega
“हम रह गए” Miss Poega की एक गहन संवेदनात्मक हिंदी ग़ज़ल है, जो मौन पीड़ा, टूटते रिश्तों और मानवीय संवेदना की कमी को शुद्ध हिंदी में उर्दू लहजे की नज़ाकत के साथ अभिव्यक्त करती है। यह रचना बिना किसी आडंबर के सीधे हृदय से संवाद करती है।
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| एक प्रतीकात्मक चित्रण: ‘हम रह गए’ — जब सहारे की ज़रूरत होती है, तब समाज संवेदना के स्थान पर केवल परामर्श देता है। |
ग़ज़ल
शीर्षक: हम रह गए
विधा: ग़ज़ल
भाषा: शुद्ध हिंदी (उर्दू लहजा)
तख़ल्लुस: Miss Poega
दर्द की लहर जो उठी, हृदय में समा के रह गए,
कहने को जो थे भाव, अधरों तक आ के रह गए।
संवेदना के मुखौटे, हर चेहरे पर छाए रहे,
सत्य के सारे भाव मगर, नेत्रों में धोखा रह गए।
प्यार के बंधन को इस पीड़ा ने यूँ खोल दिया,
जो अपने थे कल तक, आज पराए रह गए।
कष्टों के इस पथ पर स्वयं को इतना खो दिया,
नेत्रों में जो अश्रु थे, वे भी सूख के रह गए।
समझाने वाले बहुत मिले, विधि-विधान बताते रह गए,
जो भीतर टीस थी, उस पर हाथ धरने कौन आए—रह गए।
उपायों की लंबी सूची, हर स्वर में दोहराई गई,
पर पीड़ा को पहचानने वाले, मौन में ही रह गए।
मार्ग दिखाए गए अनेक, “यह करो, वह मत करो”,
जिसे कंधे की ज़रूरत थी, उसे शब्द ही रह गए।
मन की धड़कन सुनने वाला कोई पास न था,
सबने उत्तर दिए प्रश्नों के, पर प्रश्न रह गए।
मलहम नहीं, परामर्श मिला हर टूटन के बदले,
और हम शालीनता में अपने घाव ढँकते रह गए।
अब कुछ भी साबित करना नहीं रहा ज़रूरी,
जो थे अपने सबूत, ख़ामोशी बन के रह गए।
वीडियो प्रस्तुति
संक्षिप्त भावार्थ
यह ग़ज़ल उस अवस्था को व्यक्त करती है जहाँ व्यक्ति अपने दुख के साथ अकेला खड़ा रह जाता है। चारों ओर सुझाव और परामर्श होते हैं, लेकिन सच्ची संवेदना और साथ का अभाव होता है। “हम रह गए” इसी मौन पीड़ा और टूटती मानवीय निकटता की सशक्त अभिव्यक्ति है।