भारतीय लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा उत्सव है। लेकिन जब यह उत्सव साल के बारहों महीने चलता रहे, तो क्या यह प्रगति के लिए बाधक बन जाता है? आज देश के बौद्धिक गलियारों में “एक राष्ट्र, एक चुनाव” (One Nation, One Election) की गूँज है।
जैसे India that is Bharat अपनी प्राचीन जड़ों और आधुनिक आकांक्षाओं के बीच संतुलन बना रहा है, वैसे ही हमारी चुनावी प्रक्रिया भी एक बड़े बदलाव की ओर देख रही है। इस लेख में हम साहित्यशाला के प्रमुख कवि अभिषेक मिश्रा "बलिया" की कलम से निकली कविता के माध्यम से इस नीतिगत मुद्दे की भावनात्मक और व्यावहारिक पड़ताल करेंगे।
एक राष्ट्र, एक चुनाव – नई दिशा, नया सफ़र
बार-बार चुनाव का शोर, कभी यहाँ, कभी वहाँ मतदाता की कतार,
कभी लोकसभा, कभी विधान सभा, कभी पंचायत, कभी नगर-पार,
हर बार घोषणा पत्र, हर बार नारा, हर बार रैली, हर बार प्रचार,
धन और समय का अपव्यय, अधूरी योजनाओं का बोझ अपार।
आचार संहिता लगते ही ठहर जातीं सड़कों की रफ़्तार,
रुक जाते विकास के काम, जनता कहती — “फिर चुनावी त्यौहार!”
नेता दौड़ते गाँव-गाँव, वादों का बक्सा खोल,
पर असली मुद्दे पीछे छूटते, जनता का विश्वास हो जाता डोल।
अब सोचो ज़रा —
अगर एक ही बार सब चुनाव हो जाएँ,
तो कितनी राहत जनता को मिल जाए।
एक बार कतार, एक बार मेहनत, एक बार मतदान,
पाँच बरस चैन से काम, विकास का होगा सम्मान।
खर्च बचेगा अरबों-खरबों का,
समय बचेगा करोड़ों घंटों का,
सुरक्षा बल भी राहत पाएँगे,
लोकतंत्र के प्रहरी मुस्काएँगे।
जनता को भी मिलेगा आराम,
न हर साल झूठे वादों का इनाम।
सरकारें चलेंगी पूरे कार्यकाल,
न गिरने का डर, न टूटने का जाल।
पर साथ ही सवाल भी उठते हैं —
क्या सभी राज्यों को साथ लाना आसान होगा?
क्या संवैधानिक बदलाव तुरंत संभव होगा?
क्या छोटी सरकारें बड़ी सरकार के संग ताल मिला पाएँगी?
क्या जनता की स्थानीय आवाज़ कहीं दब तो न जाएगी?
लोकतंत्र का सौंदर्य है विविधता,
हर राज्य की अपनी नीति, अपनी स्थिति, अपनी सत्ता।
एकसाथ चुनाव में संतुलन कैसे बनेगा,
ये संशोधन किस राह से चलेगा?
फिर भी सपनों को सच करने का हौसला चाहिए,
क्योंकि नया भारत, नई व्यवस्था, नया क़ानून, नया साहस चाहिए।
“एक राष्ट्र, एक चुनाव” है नारा नहीं,
ये है लोकतंत्र को मज़बूत करने की एक गहरी सोच सही।
आओ मिलकर चर्चा करें, बहस करें, समाधान खोजें,
सवालों को अनसुना नहीं, बल्कि जवाब में उम्मीद बोएँ।
क्योंकि लोकतंत्र का भविष्य हम सबके हाथों में है,
निर्णय की डोर, जनता के साथों में है।
काव्य और यथार्थ: एक विश्लेषण
अभिषेक मिश्रा की यह कविता केवल कोरी कल्पना नहीं है, बल्कि यह देश की नब्ज को टटोलती है। जब कवि कहते हैं, "निर्णय की डोर, जनता के साथों में है", तो यह पंक्ति हमें विनोद कुमार शुक्ल की उस साहित्यिक संवेदनशीलता की याद दिलाती है जहाँ आम आदमी केंद्र में होता है।
1. आर्थिक बोझ और विकास (Economic Impact)
भारत जैसे विकासशील देश में जहाँ वित्त और अर्थव्यवस्था का संतुलन बनाना चुनौती है, वहाँ चुनावों पर होने वाला हजारों करोड़ का खर्च चिंताजनक है। कविता की पंक्ति "खर्च बचेगा अरबों-खरबों का" इसी ओर इशारा करती है। बार-बार आचार संहिता लगने से 'पॉलिसी पैरालिसिस' की स्थिति बनती है, जिसका सीधा असर हमारी वैश्विक छवि पर पड़ता है, जैसा कि हमने गाँव से ग्लोबल तक की यात्रा में देखा है।
2. मतदाता का मनोविज्ञान (Voter Psychology)
क्या मतदाता 'लोकसभा' और 'विधानसभा' के लिए अलग-अलग बटन दबाने में सक्षम है? या वह भ्रमित होगा? यह दिल और दिमाग की अधूरी अदालत जैसा द्वंद्व है। समर्थकों का कहना है कि भारतीय मतदाता अब परिपक्व है, जबकि आलोचक इसे स्थानीय मुद्दों के लिए खतरा मानते हैं।
3. संघीय ढांचा (Federal Structure)
संविधान के अनुच्छेद 1 ( भारत राज्यों का संघ है ) की भावना को बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है। क्या 'एक देश एक चुनाव' से क्षेत्रीय विविधता प्रभावित होगी? जैसा कि ज़ाकिर खान अपनी पंक्ति "मैं शून्य पे सवार हूँ" में कहते हैं, हर नई शुरुआत शून्य से होती है—शायद हमें भी अपनी चुनावी प्रक्रिया को एक नए सिरे (शून्य) से सोचने की आवश्यकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
क्या भारत में पहले कभी एक साथ चुनाव हुए हैं?
जी हाँ, 1952, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ संपन्न हुए थे। यह चक्र बाद में कुछ विधानसभाओं के भंग होने से टूटा।
ONOE को लागू करने के लिए क्या करना होगा?
इसके लिए संविधान के कम से कम 5 अनुच्छेदों में संशोधन, ईवीएम मशीनों की संख्या दोगुनी करनी होगी और सभी राजनीतिक दलों में सहमति बनानी होगी।
एक साथ चुनाव से आम आदमी को क्या फायदा?
बार-बार की चुनावी रैलियों के शोर, ट्रैफिक जाम और सरकारी कामकाज के ठप होने से मुक्ति मिलेगी। सरकार का फोकस पूरे 5 साल काम पर रहेगा।
निष्कर्ष
लोकतंत्र ठहराव नहीं, सतत प्रवाह है। डिजिटल युग में जब हम हर चीज स्मार्ट चाहते हैं, तो चुनाव प्रक्रिया पुरानी क्यों रहे? कवि का यह आह्वान—"सवालों को अनसुना नहीं, बल्कि जवाब में उम्मीद बोएँ"—हमें एक स्वस्थ बहस के लिए आमंत्रित करता है।
देश प्रेम की भावना केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि सही नीति निर्माण में भी दिखती है, जैसा कि हमारी देशभक्ति कविताओं के संग्रह में झलकता है।
आपकी क्या राय है? क्या भारत 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' के लिए तैयार है? कमेंट बॉक्स में बताएं।
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