वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है: आम आदमी का संविधान
हिंदी गज़ल को नई दिशा देने वाले दुष्यंत कुमार (Dushyant Kumar) की यह गज़ल लोकतंत्र और आम आदमी की विडंबना को सबसे सटीक तरीके से बयां करती है। यह रचना उनके प्रसिद्ध संग्रह 'साये में धूप' का हिस्सा है।
जब भी हिंदी साहित्य में प्रतिरोध के स्वर की बात होती है, तो "झोले में उसके पास कोई संविधान है" वाली यह गज़ल बरबस याद आ जाती है। नीचे इस गज़ल के हिंदी/हिंग्लिश बोल (Lyrics) और इसका विस्तृत भावार्थ दिया गया है।
वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है (Lyrics)
वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है
माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है
वो कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तुगू
मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है
सामान कुछ नहीं है फटे-हाल है मगर
झोले में उस के पास कोई संविधान है
उस सर-फिरे को यूँ नहीं बहला सकेंगे आप
वो आदमी नया है मगर सावधान है
फिस्ले जो उस जगह तो लुढ़कते चले गए
हम को पता नहीं था कि इतनी ढलान है
देखे हैं हम ने दौर कई अब ख़बर नहीं
पावँ तले ज़मीन है या आसमान है
वो आदमी मिला था मुझे उस की बात से
ऐसा लगा कि वो भी बहुत बे-ज़बान है
Wo Aadmi Nahi Hai Mukammal Bayan Hai (Hinglish)
Wo aadmī nahīñ hai mukammal bayān hai
Māthe pe us ke choT kā gahrā nishān hai
Vo kar rahe haiñ ishq pe sanjīda guftugū
Maiñ kyā batāūñ merā kahīñ aur dhyān hai
Sāmān kuchh nahīñ hai phaTe-hāl hai magar
Jhole meñ us ke paas koī samvidhān hai
Us sar-phire ko yuuñ nahīñ bahlā sakeñge aap
Vo aadmī nayā hai magar sāvdhān hai
Phisle jo us jagah to luḌhakte chale gaye
Ham ko pata nahīñ thā ki itnī Dhalān hai
Dekhe haiñ ham ne daur kaī ab ḳhabar nahīñ
Paaoñ tale zamīn hai yā āsmān hai
Vo aadmī milā thā mujhe us kī baat se
Aisā lagā ki vo bhī bahut be-zabān hai
शब्दार्थ (Word Meanings):
- मुकम्मल बयान (Mukammal Bayan): पूर्ण वक्तव्य, पूरी कहानी (Complete Statement)।
- संजीदा गुफ़्तुगू (Sanjeeda Guftugu): गंभीर बातचीत (Serious Conversation)।
- फटे-हाल (Phate-haal): बुरी दशा में, गरीब।
- संविधान (Samvidhan): देश का कानून (Constitution), यहाँ अधिकारों का प्रतीक।
- बे-ज़बान (Be-zaban): मूक, जो अपनी बात न कह सके।
दुष्यंत कुमार की अन्य रचनाओं को पढ़ने के लिए आप दुष्यंत कुमार कविता संग्रह देख सकते हैं।
भावार्थ और व्याख्या (Summary & Meaning)
1. संघर्ष का प्रतीक (Symbol of Struggle):
"वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है..." कवि कहते हैं कि वह व्यक्ति केवल एक इंसान नहीं, बल्कि अपने आप में एक पूरी दास्तां है। उसके माथे का निशान उसके संघर्षों और समाज द्वारा दिए गए घावों का गवाह है।
2. लोकतंत्र और आम आदमी (Democracy & Common Man):
"सामान कुछ नहीं है फटे-हाल है मगर, झोले में उस के पास कोई संविधान है..." यह दुष्यंत कुमार का सबसे प्रसिद्ध शेर है। यह पंक्ति उस विरोधाभास को दर्शाती है जहाँ आम आदमी गरीब और फटेहाल तो है, लेकिन उसके पास 'संविधान' यानी उसके अधिकार और लोकतंत्र की ताकत मौजूद है। यह जागरूकता का प्रतीक है।
3. नया और जागरूक नागरिक (The Awakened Citizen):
"वो आदमी नया है मगर सावधान है..." सत्ता अब जनता को झूठे वादों से नहीं बहला सकती। आज का आदमी जागरूक (सावधान) है और अपने अधिकारों को समझता है। यह चेतना हमें उनकी एक और गज़ल 'कहाँ तो तय था चराग़ाँ' में भी दिखती है।
4. फिसलन और ढलान (The Decline):
"फिस्ले जो उस जगह तो लुढ़कते चले गए..." यह नैतिक पतन और सामाजिक गिरावट का चित्रण है। एक बार जब मूल्यों से समझौता हो जाता है, तो गिरावट (ढलान) बहुत तेज़ होती है।
दुष्यंत कुमार की शायरी (Video)
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न: 'झोले में उसके पास कोई संविधान है' का क्या अर्थ है?
उत्तर: इसका अर्थ है कि भले ही आम आदमी गरीब (फटेहाल) है, लेकिन उसके पास देश का संविधान और उसके अधिकार हैं जो उसे ताकत देते हैं।
प्रश्न: 'वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है' किस कवि की रचना है?
उत्तर: यह प्रसिद्ध जनवादी कवि दुष्यंत कुमार (Dushyant Kumar) की रचना है।
प्रश्न: इस गज़ल का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर: यह गज़ल आम आदमी के संघर्ष, जागरूकता और लोकतंत्र में उसकी स्थिति को दर्शाती है।