हिंदी साहित्य का कैनवास इतना विशाल है कि इसमें मिथिला की मिठास और अवध की नज़ाकत, दोनों का समावेश है। जब हम हिंदी गज़ल के इतिहास और उसके विकास की बात करते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान सिर्फ शिल्प पर जाता है, लेकिन असली जादू उस 'भाव' में है जो जनमानस की आवाज़ बनता है। आज साहित्याशाला (Sahityashala) के इस पन्ने पर, हम अतीत और वर्तमान के उन तारों को जोड़ने का प्रयास करेंगे जो विद्यापति की पदावली से शुरू होकर नागार्जुन की हुंकार तक जाते हैं, और अंततः दुष्यंत कुमार की गज़लों में एक इंकलाब बनकर गूँजते हैं।
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| दुष्यंत कुमार की गज़लें: परंपरा और आधुनिकता का संगम |
चाहे वह गज़ल का इतिहास और उसका शास्त्र हो या आधुनिक कविताओं का यथार्थ, कवियों ने हमेशा समय की नब्ज़ को पकड़ा है। नीचे दिया गया लेख एक ऐसे ही तुलनात्मक अध्ययन और भावनात्मक यात्रा का दस्तावेज़ है।
मिथिला के संस्कार और अवध के अदब के साथ, आप मेरा प्रणाम स्वीकार करें।
मिथिलांचल में जितने भी मुख्यधारा के कवि हुए, उन्होंने कभी भी स्वयं को एक 'विधा' या एक ही प्रकार के विषय तक सीमित नहीं रखा। इस विविधता को समझने के लिए आप मिथिला की कविताओं (Maithili Poems) की गहराई में भी उतर सकते हैं।
कवि कोकिल विद्यापति अगर साहित्यिक भक्ति लिखते हैं, तो वहीं समाज की विसंगतियों पर भी चोट करते हैं — 'पिया मोर बालक हम तरूणी गे...'
दूसरी तरफ जहाँ बैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' या नागार्जुन हैं — जो जहाँ एक ओर समाज का चित्रण करते हैं, वहीं दूसरी ओर सत्ता से लोहा भी लेते हैं — 'इन्दु जी, इन्दु जी क्या हुआ आपको?' नागार्जुन की यह जनवादी चेतना उन्हें हिंदी कविता कोश के उन शिखरों पर बैठाती है, जहाँ से दुष्यंत कुमार की परंपरा शुरू होती है।
दुष्यंत कुमार, विद्यापति और नागार्जुन के इसी 'हिन्दुस्तानी भाषायी संगम' हैं; जहाँ वे प्रेम से लेकर प्रतिरोध तक, और समाज से लेकर राजनीति तक, हर विषय को साधने वाले एक बेजोड़ रचनाकार हैं। इसे हम आधुनिक उर्दू और हिंदी गज़ल के यथार्थ के रूप में देख सकते हैं।
1. प्रेम और विवशता: मध्यमवर्गीय जीवन का दस्तावेज़
यह ग़ज़ल उस मध्यमवर्गीय प्रेम की विवशता और आकर्षण का दस्तावेज़ है, जहाँ प्रेमिका एक गुज़रती हुई 'रेल' है और प्रेमी एक कांपता हुआ 'पुल'।
मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ
मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ
एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ
तू किसी रेल-सी गुज़रती है
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ
हर तरफ़ ऐतराज़ होता है
मैं अगर रौशनी में आता हूँ
एक बाज़ू उखड़ गया जबसे
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ
मैं तुझे भूलने की कोशिश में
आज कितने क़रीब पाता हूँ
कौन ये फ़ासला निभाएगा
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ
दुष्यंत की कविताओं का पूरा संग्रह पढ़ने के लिए आप हमारे दुष्यंत कुमार कविता संग्रह को देख सकते हैं।
2. उम्मीद और प्रतिरोध: अँधेरे में भीगी हुई बाती
निजी पीड़ा से निकलकर, अब उस ग़ज़ल की ओर बढ़ते हैं जो हताशा के दौर में 'उम्मीद का गीत' बन गई। जब चारों तरफ अंधेरा हो, तो यह रचना उस 'भीगी हुई बाती' की तरह है, जिसमें जलने और लड़ने की ज़िद अब भी शेष है। यह ठीक वैसी ही जिजीविषा है जो हमें 'हो गई है पीर पर्वत-सी' में देखने को मिलती है।
इस नदी की धार से ठंडी हवा आती तो है
इस नदी की धार से ठंडी हवा आती तो है
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है
एक चिंगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तो
इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है
एक खँडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी
आदमी की पीर गूँगी ही सही, गाती तो है
एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी
यह अँधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है
निर्वसन मैदान में लेटी हुई है जो नदी
पत्थरों से ओट में जा-जा के बतियाती तो है
दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है
इसी उम्मीद की लौ को जलाए रखने की बात दुष्यंत अपनी एक और रचना 'कहाँ तो तय था चिरागाँ' में भी करते हैं, जहाँ वे सिस्टम के खोखलेपन को उजागर करते हैं।
3. सत्ता से सीधा संवाद: भूख और सियासत
"और अंत में... आज हम दिल्ली में हैं—सत्ता के केंद्र में। दुष्यंत की यह ग़ज़ल इसी दिल्ली की सड़कों और भूख की सियासत पर सबसे करारा तमाचा है। यह उन 'बंद खिड़कियों' का सच है जो किसी वारदात पर भी नहीं खुलतीं, बस तमाशबीन बनी रहती हैं। यह वही दर्द है जो कभी-कभी 'आज वीरान अपना घर देखा' जैसी पंक्तियों में झलकता है, जहाँ आम आदमी बेबस है।
भूक है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ
भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ
आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुदद्आ ।
मौत ने तो धर दबोचा एक चीते कि तरह
ज़िंदगी ने जब छुआ तो फ़ासला रखकर छुआ ।
गिड़गिड़ाने का यहां कोई असर होता नही
पेट भरकर गालियां दो, आह भरकर बददुआ ।
क्या वज़ह है प्यास ज्यादा तेज़ लगती है यहाँ
लोग कहते हैं कि पहले इस जगह पर था कुँआ ।
आप दस्ताने पहनकर छू रहे हैं आग को
आप के भी ख़ून का रंग हो गया है साँवला ।
इस अंगीठी तक गली से कुछ हवा आने तो दो
जब तलक खिलते नहीं ये कोयले देंगे धुँआ ।
दोस्त, अपने मुल्क कि किस्मत पे रंजीदा न हो
उनके हाथों में है पिंजरा, उनके पिंजरे में सुआ ।
इस शहर मे वो कोई बारात हो या वारदात
अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियाँ ।
जीवन की इन कठोर सच्चाइयों को और करीब से महसूस करने के लिए दुष्यंत की कविता 'ओ मेरी ज़िन्दगी' का पाठ अवश्य करें।
दुष्यंत कुमार के शब्द अंगारे हैं, और मैंने प्रयास किया है कि उस आंच को, उस ताप को आप तक ज्यों का त्यों पहुँचा सकूँ। आप सभी के धैर्य और स्नेह के लिए हृदय से आभार।
दुष्यंत कुमार: एक आवाज़ (वीडियो देखें)
निष्कर्ष
दुष्यंत कुमार महज़ एक शायर नहीं थे, वे उस दौर की एक ज़रूरी आवाज़ थे जब लोकतंत्र लड़खड़ा रहा था और आम आदमी की उम्मीदें टूट रही थीं। उनकी गज़लें आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी 1975 में थीं। चाहे आप हिंदवी (Hindwi) पर पढ़ें या हिंदी कविता की वेबसाइट्स पर, दुष्यंत का स्वर हर जगह एक मशाल की तरह जलता हुआ मिलता है।
हमें उम्मीद है कि साहित्याशाला (Sahityashala) का यह प्रयास आपको पसंद आया होगा। साहित्य, खेल और अन्य रोचक जानकारियों के लिए हमारे नेटवर्क English Sahityashala और Sports Sahityashala से जुड़े रहें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न: दुष्यंत कुमार को 'साये में धूप' के लिए क्यों जाना जाता है?
उत्तर: 'साये में धूप' दुष्यंत कुमार का वह गज़ल संग्रह है जिसने हिंदी गज़ल को उर्दू के दरबार से निकालकर आम आदमी की जुबान पर ला खड़ा किया। यह संग्रह सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक है।
प्रश्न: 'तू किसी रेल-सी गुज़रती है' गज़ल का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर: यह गज़ल एक तरफ प्रेम की तीव्रता और दूसरी तरफ एक आम आदमी (पुल की तरह थरथराता हुआ) के जीवन की अस्थिरता और संघर्ष को दर्शाती है।
प्रश्न: नागार्जुन और दुष्यंत कुमार में क्या समानता है?
उत्तर: दोनों ही कवि जनकवि हैं। नागार्जुन और दुष्यंत कुमार, दोनों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से शोषित वर्ग की पीड़ा को उठाया और सत्ता को सीधे चुनौती दी।