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सत्य का श्रृंगार नहीं होता: प्रभाष पाठक का मार्मिक एवं विचारपरक आलेख

हो गई है पीर पर्वत - Ho Gayi Hai Peer Parvat | दुष्यंत कुमार (Class 12 Notes & Summary)

हो गई है पीर पर्वत-सी: संपूर्ण ग़ज़ल और अर्थ

हिंदी साहित्य में जब भी बदलाव और जन-जागरण की बात होती है, दुष्यंत कुमार (Dushyant Kumar) की यह पंक्तियाँ सबसे पहले याद आती हैं। उनकी यह कालजयी ग़ज़ल 'साये में धूप' संग्रह से ली गई है। यह केवल एक कविता नहीं, बल्कि एक मशाल है जो आज भी अंधेरे में रास्ता दिखाती है।

नीचे दी गई पंक्तियाँ न केवल हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों (Class 12) के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए हैं जो समाज में सकारात्मक बदलाव (Change) चाहता है।


हो गई है पीर पर्वत-सी (Hindi Lyrics)

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

Ho Gayi Hai Peer Parvat Si (Hinglish Lyrics)

Ho gayi hai peer parvat-si pighalni chahiye
Is Himalaya se koi Ganga nikalni chahiye

Aaj yeh deewar, pardon ki tarah hilne lagi
Shart thi lekin ki ye buniyaad hilni chahiye

Har sadak par, har gali mein, har nagar, har gaon mein
Haath lehraate hue har laash chalni chahiye

Sirf hungama khada karna mera maqsad nahi
Meri koshish hai ki ye surat badalni chahiye

Mere seene mein nahi to tere seene mein sahi
Ho kahin bhi aag, lekin aag jalni chahiye

कविता का भावार्थ और व्याख्या (Summary & Meaning)

दुष्यंत कुमार की यह ग़ज़ल जनवादी चेतना का प्रतीक है। यहाँ कवि ने प्रतीकों (Metaphors) का अद्भुत प्रयोग किया है:

  • 1. पीर पर्वत-सी (Mountain of Pain):
    जनता का दुख और पीड़ा अब पर्वत के समान विशाल हो गई है। अब इसे सहन करना असंभव है, इसलिए किसी बदलाव रूपी गंगा का निकलना ज़रूरी है।
  • 2. बुनियाद हिलनी चाहिए (Shaking the Foundation):
    कवि कहते हैं कि केवल सत्ता का चेहरा बदलना (दीवार का हिलना) काफी नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था की नींव बदलनी चाहिए ताकि आम आदमी को न्याय मिल सके।
  • 3. आग जलनी चाहिए (The Fire of Revolution):
    क्रांति और बदलाव की चाह किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यह एक सामूहिक मशाल है जिसे हर दिल में जलना चाहिए।
दुष्यंत कुमार (Dushyant Kumar)
जनकवि दुष्यंत कुमार

काव्य पाठ सुनें (Video)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न: 'हो गई है पीर पर्वत-सी' का क्या अर्थ है?
उत्तर: इसका अर्थ है कि जनता की पीड़ा अब पर्वत जितनी विशाल हो गई है और अब इसे दूर करने के लिए बदलाव (गंगा) का आना ज़रूरी है।

प्रश्न: यह गज़ल किस संग्रह से ली गई है?
उत्तर: यह प्रसिद्ध गज़ल दुष्यंत कुमार के गज़ल संग्रह 'साये में धूप' से ली गई है।

प्रश्न: 'मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही' का भाव क्या है?
उत्तर: कवि कहना चाहते हैं कि क्रांति किसी एक व्यक्ति की नहीं होती। बदलाव की आग किसी के भी दिल में हो, उसका जलते रहना ही सबसे महत्वपूर्ण है।

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