ओ मेरी ज़िन्दगी: अस्तित्व और संघर्ष का संवाद
हिंदी साहित्य में दुष्यंत कुमार की पहचान अक्सर एक 'कवि-योद्धा' के रूप में होती है, जिन्होंने 'हो गई है पीर पर्वत-सी' जैसी हुंकार भरी गज़लें लिखीं। लेकिन 'ओ मेरी ज़िन्दगी' (O Meri Zindagi) उनकी एक ऐसी रचना है जो बाहरी दुनिया के शोर से दूर, उनके अंतर्मन के सन्नाटे को उजागर करती है।
यह कविता जीवन के साथ उस 'समझौते' और 'समर्पण' की कहानी है जो प्रेम से ज्यादा 'संस्कारों' पर टिकी है। जहाँ एक तरफ उनकी गज़ल 'कहाँ तो तय था चराग़ाँ' व्यवस्था की विफलता पर चोट करती है, वहीं यह कविता व्यक्ति की आंतरिक विफलता और फिर भी चलते रहने की जिद्द को बयां करती है।
ओ मेरी ज़िन्दगी (Hindi Lyrics)
मैं जो अनवरत
तुम्हारा हाथ पकड़े
स्त्री-परायण पति सा
इस वन की पगडंडियों पर
भूलता-भटकता आगे बढ़ता जा रहा हूँ,
सो इसलिए नहीं
कि मुझे दैवी चमत्कारों पर विश्वास है,
या तुम्हारे बिना मैं अपूर्ण हूँ,
बल्कि इसलिए कि मैं पुरुष हूँ
और तुम चाहे परंपरा से बँधी मेरी पत्नी न हो,
पर एक ऐसी शर्त ज़रूर है,
जो मुझे संस्कारों से प्राप्त हुई,
कि मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता।
पहले
जब पहला सपना टूटा था,
तब मेरे हाथ की पकड़
तुम्हें ढीली महसूस हुई होगी।
सच,
वही तुम्हारे बिलगाव का मुकाम हो सकता था।
पर उसके बाद तो
कुछ टूटने की इतनी आवाज़ें हुईं
कि आज तक उन्हें सुनता रहता हूँ।
आवाज़ें और कुछ नहीं सुनने देतीं!
तुम जो हर घड़ी की साथिन हो,
तुमझे झूठ क्या बोलूँ?
खुद तुम्हारा स्पंदन अनुभव किए भी
मुझे अरसा गुजर गया!
लेकिन तुम्हारे हाथों को हाथों में लिए
मैं उस समय तक चलूँगा
जब तक उँगलियाँ गलकर न गिर जाएँ।
तुम फिर भी अपनी हो,
वह फिर भी ग़ैर थी जो छूट गई;
और उसके सामने कभी मैं
यह प्रगट न होने दूँगा
कि मेरी उँगलियाँ दग़ाबाज़ हैं,
या मेरी पकड़ कमज़ोर है,
मैं चाहे कलम पकड़ूँ या कलाई।
मगर ओ मेरी जिंदगी!
मुझे यह तो बता
तू मुझे क्यों निभा रही है?
मेरे साथ चलते हुए
क्या तुझे कभी ये अहसास होता है
कि तू अकेली नहीं?
O Meri Zindagi (Hinglish Lyrics)
Main jo anvarat
Tumhara haath pakde
Stree-parayan pati sa
Is van ki pagdandiyon par
Bhulta-bhatakta aage badhta ja raha hoon,
So isliye nahi
Ki mujhe daivi chamatkaron par vishwas hai...
Balki isliye ki main purush hoon
Aur tum chahe parampara se bandhi meri patni na ho,
Par ek aisi shart zaroor hai,
Jo mujhe sanskaron se prapt hui,
Ki main tumhe chhod nahi sakta.
(Full lyrics in Hindi above)
शब्दार्थ (Word Meanings):
- अनवरत (Anvarat): निरंतर, बिना रुके (Continuously).
- स्त्री-परायण (Stree-parayan): पत्नी के प्रति समर्पित (Devoted husband).
- पगडंडियों (Pagdandiyan): सँकरे रास्ते (Narrow paths/Trails).
- बिलगाव (Bilgaav): अलग होना, विच्छेद (Separation).
- स्पंदन (Spandan): धड़कन, कंपन (Vibration/Heartbeat).
- दग़ाबाज़ (Dagabaaz): धोखेबाज़ (Betrayer).
भावार्थ और साहित्यिक विश्लेषण (Deep Analysis)
1. जीवन एक 'स्त्री-परायण पति' की तरह:
दुष्यंत कुमार यहाँ एक बहुत ही अनूठा रूपक (Metaphor) इस्तेमाल करते हैं। वे कहते हैं कि मैं जीवन के साथ इसलिए नहीं हूँ कि मुझे कोई चमत्कार की उम्मीद है, बल्कि इसलिए हूँ जैसे एक 'स्त्री-परायण पति' अपनी पत्नी का साथ निभाता है—प्रेम से ज्यादा 'कर्तव्य' और 'संस्कार' के कारण। यह भाव उनकी कविता 'मापदण्ड बदलो' के संघर्ष से काफी अलग है, जहाँ वे लड़ने की बात करते हैं, यहाँ वे 'निभाने' की बात कर रहे हैं।
2. सपनों का टूटना और आदत पड़ जाना:
कवि स्वीकारते हैं कि जब पहला सपना टूटा था, तब शायद जीवन से उनकी पकड़ ढीली हुई थी। लेकिन अब, जब टूटना एक आम बात हो गई है, तो उन्हें इसकी आदत पड़ गई है। यह सूनापन और आदत हमें 'आज वीरान अपना घर देखा' में भी देखने को मिलती है, जहाँ वे अपने ही घर में अजनबी महसूस करते हैं।
3. स्वाभिमान की रक्षा (Self-Respect):
"मैं यह प्रगट न होने दूँगा कि मेरी उँगलियाँ दग़ाबाज़ हैं..." यह पंक्ति दुष्यंत के चरित्र को परिभाषित करती है। चाहे वे 'कलम' पकड़ें (लेखक के रूप में) या 'कलाई' (मनुष्य के रूप में), वे अपनी कमजोरी दुनिया को नहीं दिखाना चाहते। यह वही खुद्दारी है जो 'वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है' में 'फटेहाल' होने के बावजूद 'संविधान' रखने वाले आदमी में दिखती है।
4. अस्तित्व का प्रश्न:
अंत में कवि ज़िन्दगी से ही सवाल पूछते हैं—"तू मुझे क्यों निभा रही है?" यह प्रश्न उस अकेलेपन को चीरता है जिसे हर संवेदनशील व्यक्ति महसूस करता है। क्या जीवन भी हमारे साथ चलकर कम अकेला महसूस करता है?
काव्य पाठ (Video Recitation)
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न: 'ओ मेरी ज़िन्दगी' कविता का केंद्रीय भाव क्या है?
उत्तर: यह कविता जीवन के साथ एक ऐसे रिश्ते को दर्शाती है जो प्रेम या उत्साह से नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, संस्कारों और अटूट साथ से बंधा है।
प्रश्न: 'चाहे कलम पकड़ूँ या कलाई' से कवि का क्या आशय है?
उत्तर: कवि कहना चाहते हैं कि चाहे वे एक लेखक (कलम) की भूमिका में हों या एक साधारण मनुष्य (कलाई) की, वे अपनी निष्ठा और जीवन पर पकड़ कभी ढीली नहीं होने देंगे।
प्रश्न: यह कविता दुष्यंत कुमार के किस संग्रह से है?
उत्तर: यह कविता दुष्यंत कुमार के प्रसिद्ध काव्य संग्रहों में से एक का हिस्सा है और उनकी पारंपरिक गज़लों से अलग एक गहन दार्शनिक शैली प्रस्तुत करती है।