🔥 परशुराम की प्रतीक्षा: 1962 की हार का प्रतिशोध
क्या शांति की कीमत कायरता है? जब 1962 में चीन ने भारत के भरोसे का गला घोंटा, तब राष्ट्रकवि दिनकर की कलम से स्याही नहीं, आग बरसी।
- 1962 युद्ध की अनकही हताशा और दिनकर का आक्रोश।
- क्यों 'शक्ति के बिना शांति' एक छलावा है?
- परशुराम का आह्वान: आज के भारत के लिए चेतावनी।
यदि आप Inspirational Hindi Poems और वीर रस की तलाश में हैं, तो यह कविता आपकी रगों में रक्त का प्रवाह तेज कर देगी।
जब हिमालय की चोटियों पर भारत का स्वाभिमान घायल हुआ, तब रामधारी सिंह 'दिनकर' ने इस ओजस्वी कृति की रचना की—'परशुराम की प्रतीक्षा'। दिनकर जी का मानना था कि हमने 'शांति' के नाम पर अपनी 'शक्ति' को भुला दिया है।
दिनकर जी अतीत के महानायकों को आवाज देते हैं: "टेरो, टेरो... विक्रमी तेज, असि की उद्दाम प्रभा को।"
जिस तरह उन्होंने सच है विपत्ति जब आती है (रश्मिरथी) में पौरुष का गान किया था, वैसे ही यहाँ वे भगवान परशुराम का आह्वान करते हैं। परशुराम—जो शास्त्र भी जानते हैं और शस्त्र भी।
खंड 1: कायरता बनाम अहिंसा (The Dilemma of Non-Violence)
कविता के पहले खंड में दिनकर जी उस 'कायर शांति' पर प्रहार करते हैं जिसने देश को कमजोर बना दिया। वे पूछते हैं कि हमने अपनी तलवारें गलाकर तकली (चरखा) क्यों बना लीं? यह स्थिति कृष्ण की चेतावनी की याद दिलाती है।
शोणित से तुम किसका कलंक धोते हो ?
उनका, जिनमें कारुण्य असीम तरल था,
तारुण्य-ताप था नहीं, न रंच गरल था;
सस्ती सुकीर्ति पा कर जो फूल गये थे,
निर्वीर्य कल्पनाओं में भूल गये थे;
गीता में जो त्रिपिटक-निकाय पढ़ते हैं,
तलवार गला कर जो तकली गढ़ते हैं;
शीतल करते हैं अनल प्रबुद्ध प्रजा का,
शेरों को सिखलाते हैं धर्म अजा का;
सारी वसुन्धरा में गुरु-पद पाने को,
प्यासी धरती के लिए अमृत लाने को
जो सन्त लोग सीधे पाताल चले थे,
(अच्छे हैं अबः; पहले भी बहुत भले थे।)
हम उसी धर्म की लाश यहाँ ढोते हैं,
शोणित से सन्तों का कलंक धोते हैं।
"शोणित से तुम किसका कलंक धोते हो?" यह चित्र उस भारी कीमत को दर्शाता है जो गलत नीतियों के कारण सैनिकों को चुकानी पड़ी।
💡 भावार्थ:
कवि कहते हैं कि 'बकरी धर्म' (कायरता) की शिक्षा का बोझ आज देश के वीरों को अपने खून से धोना पड़ रहा है। दिनकर जी परशुराम अवतार की तरह याद दिलाते हैं: अत्याचारी के सामने शस्त्र डाल देना धर्म नहीं, पाप है।
खंड 2: भारत अपने घर में ही हार गया (The Enemy Within)
दूसरे खंड में, दिनकर जी का आक्रोश उस व्यवस्था पर है जो "कमरे में गलत हुक्म लिखती है"।
"घातक है, जो देवता-सदृश दिखता है, लेकिन, कमरे में गलत हुक्म लिखता है।"
हम दोषी किसको कहें तुम्हारे वध का ?
घातक है, जो देवता-सदृश दिखता है,
लेकिन, कमरे में गलत हुक्म लिखता है,
जिस पापी को गुण नहीं; गोत्र प्यारा है,
समझो, उसने ही हमें यहाँ मारा है।
यह पाप उन्हीं का हमको मार गया है,
भारत अपने घर में ही हार गया है।
है कौन यहाँ, कारण जो नहीं विपद् का ?
किस पर जिम्मा है नहीं हमारे वध का ?
जो चरम पाप है, हमें उसी की लत है,
दैहिक बल को रहता यह देश ग़लत है।
नेता निमग्न दिन-रात शान्ति-चिन्तन में,
कवि-कलाकार ऊपर उड़ रहे गगन में।
यज्ञाग्नि हिन्द में समिध नहीं पाती है,
पौरुष की ज्वाला रोज बुझी जाती है।
वीरता जहाँ पर नहीं, पुण्य का क्षय है,
वीरता जहाँ पर नहीं, स्वार्थ की जय है।
तलवार पुण्य की सखी, धर्मपालक है,
लालच पर अंकुश कठिन, लोभ-सालक है।
असि छोड़, भीरु बन जहाँ धर्म सोता है,
पातक प्रचण्डतम वहीं प्रकट होता है।
पूछो कुबेर से, कब सुवर्ण वे देंगे ?
यदि आज नहीं तो सुयश और कब लेंगे ?
तूफान उठेगा, प्रलय-वाण छूटेगा,
है जहाँ स्वर्ण, बम वहीं, स्यात्, फूटेगा।
रिपु नहीं, यही अन्याय हमें मारेगा,
अपने घर में ही फिर स्वदेश हारेगा।
💡 भावार्थ:
भारत बाहरी दुश्मन से नहीं, बल्कि आंतरिक भ्रष्टाचार और नैतिक पतन से हारा है। यह संदेश दानवीर कर्ण की कथा जैसा ही मार्मिक है, जहाँ योग्यता होते हुए भी परिस्थितियों ने उसे बांध दिया।
खंड 3: प्रतिशोध और नव-निर्माण (Revenge & Redemption)
अंतिम खंड में, दिनकर जी हताशा को त्यागकर युद्ध की हुंकार भरते हैं। वे कहते हैं: "जनमे हैं तो दो बार नहीं मरना है।"
"गरजो, अम्बर की भरो रणोच्चारों से... यह आग मात्र सीमा की नहीं लपट है।"
किस नयी फसल के बीज वीर ! बोते हो ?
दुर्दान्त दस्यु को सेल हूलते हैं हम;
यम की दंष्ट्रा से खेल झूलते हैं हम।
वैसे तो कोई बात नहीं कहने को,
हम टूट रहे केवल स्वतंत्र रहने को।
सामने देश माता का भव्य चरण है,
जिह्वा पर जलता हुआ एक, बस प्रण है,
काटेंगे अरि का मुण्ड कि स्वयं कटेंगे,
पीछे, परन्तु, सीमा से नहीं हटेंगे।
देखोगे, कैसा प्रलय चण्ड होता है !
असिवन्त हिन्द कितना प्रचण्ड होता है !
गरजो, अम्बर की भरो रणोच्चारों से,
क्रोधान्ध रोर, हाँकों से, हुंकारों से。
यह आग मात्र सीमा की नहीं लपट है,
मूढ़ो ! स्वतंत्रता पर ही यह संकट है।
कुत्सित कलंक का बोध नहीं छोड़ेंगे,
हम बिना लिये प्रतिशोध नहीं छोड़ेंगे,
अरि का विरोध-अवरोध नहीं छोड़ेंगे,
जब तक जीवित है, क्रोध नहीं छोड़ेंगे।
झकझोरो, झकझोरो महान् सुप्तों को,
टेरो, टेरो चाणक्य-चन्द्रगुप्तों को;
विक्रमी तेज, असि की उद्दाम प्रभा को,
राणा प्रताप, गोविन्द, शिवा, सरजा को;
खोजो, टीपू सुलतान कहाँ सोये हैं ?
अशफ़ाक़ और उसमान कहाँ सोये हैं ?
बमवाले वीर जवान कहाँ सोये हैं ?
वे भगतसिंह बलवान कहाँ सोये हैं ?
जा कहो, करें अब कृपा, नहीं रूठें वे,
बम उठा बाज़ के सदृश व्यग्र टूटें वे।
हम मान गये, जब क्रान्तिकाल होता है,
सारी लपटों का रंग लाल होता है।
जाग्रत पौरुष प्रज्वलित ज्वाल होता हैं,
शूरत्व नहीं कोमल, कराल होता है।
💡 भावार्थ:
कवि अतीत के वीरों—टीपू सुल्तान, भगत सिंह, और नेताजी—को जगाते हैं। जिस तरह भीष्म ने शरशैया पर लेटे हुए भी उपदेश दिया था, वैसे ही दिनकर भारत की सोई हुई आत्मा को जगा रहे हैं।
📖 कविता का विस्तृत विश्लेषण:
🎤 सम्पूर्ण कविता पाठ:
निष्कर्ष: शक्ति और शांति का संतुलन
रामधारी सिंह दिनकर की 'परशुराम की प्रतीक्षा' केवल युद्धघोष नहीं, एक नैतिक चेतावनी है।
"शक्ति बिना विवेक के और शांति बिना शक्ति के—दोनों ही विनाशक हैं।"
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
'परशुराम की प्रतीक्षा' कविता का मुख्य संदेश क्या है?
इस कविता का मुख्य संदेश है कि राष्ट्र की सुरक्षा के लिए अहिंसा के साथ-साथ शक्ति (पौरुष) का होना भी अनिवार्य है। कायरतापूर्ण शांति देश को गुलाम बना देती है।
यह कविता किस युद्ध के बाद लिखी गई थी?
यह कविता 1962 के भारत-चीन युद्ध (Indo-China War) में भारत की पराजय के बाद उपजी हताशा को दूर करने के लिए लिखी गई थी।
दिनकर ने परशुराम का प्रतीक क्यों चुना?
भगवान परशुराम अन्याय के विरुद्ध शस्त्र उठाने वाले ऋषि हैं। वे यह दर्शाते हैं कि अत्याचारी को क्षमा करना नहीं, बल्कि उसका नाश करना धर्म है।