पाश की कविता "सपने हर किसी को नहीं आते": चेतना का बोझ और यथार्थ का दार्शनिक विश्लेषण
यदि "सबसे ख़तरनाक" कविता में पाश ने हमें 'सपनों के मर जाने' के खौफ से डराया था, तो अपनी इस छोटी लेकिन बेहद मारक कविता "सपने हर किसी को नहीं आते" में वे हमें बताते हैं कि असल में सपने देखने का अधिकारी कौन है। यह कविता महज़ रात में आने वाले ख़्वाबों की बात नहीं करती, बल्कि यह एक ज़िंदा और संवेदनशील समाज (Vibrant Society) के भविष्य-दर्शन (Vision) की बात करती है।
साहित्यशाला की इस पाश-शृंखला की तीसरी कड़ी में हम एक ऐसे मनोवैज्ञानिक यथार्थ में उतरेंगे, जहाँ सपने मुफ्त नहीं मिलते। उनके लिए "नींद की नज़र होना" (अर्थात अपना सुकून खोना) और "झेलने वाले दिलों का होना" (सहानुभूति और पीड़ा को महसूस करने की क्षमता) अनिवार्य है। जो लोग केवल मुनाफ़ाखोर हैं या व्यवस्था के अंधे सिपाही हैं, उनके पास 'सपने' नहीं होते, केवल 'हिसाब' होता है।
कविता का मूल पाठ: सपने हर किसी को नहीं आते
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स्रोत : पुस्तक: लहू है कि तब भी गाता है (पृष्ठ 26) | अनुवाद: चमनलाल
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गहन मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक विश्लेषण
यह छोटी-सी कविता दर्शनशास्त्र (Philosophy) के एक बहुत बड़े सिद्धांत 'Burden of Consciousness' (चेतना का बोझ) पर बात करती है। मनोवैज्ञानिक रूप से, जो व्यक्ति दूसरों का शोषण करता है ("बदी के लिए उठी हुई हथेली"), उसकी Empathy (सहानुभूति) मर चुकी होती है। और बिना सहानुभूति के कोई भी व्यक्ति एक बेहतर दुनिया का 'सपना' (Utopia) नहीं देख सकता।
पाश यहाँ अदम गोंडवी की तरह ज़मीनी यथार्थ का चश्मा पहनते हैं, जहाँ वे बताते हैं कि "बेजान बारूद" (जिसमें शक्ति तो है पर दिशा नहीं) या "इतिहास के ग्रंथ" (जो केवल अतीत में जी रहे हैं) कभी भविष्य के सपने नहीं बुन सकते। सपने बुनने के लिए वर्तमान में "झेलने वाले दिल" (पीड़ा सहने वाले संवेदनशील इंसान) की ज़रूरत होती है।
क्या आप 'Deferred Life Syndrome' के शिकार हैं?
आज का युवा अक्सर अपनी ज़िंदगी को 'कल' पर टाल देता है—कि जब आर्थिक स्थिति (Finance) ठीक होगी, तब जिएंगे। इसे मनोविज्ञान में Deferred Life Syndrome कहते हैं। पाश कहते हैं कि जो अपनी 'नींद की नज़र' (अर्थात वर्तमान का सुकून) बलिदान नहीं कर सकता, वह कभी सपने देखने का अधिकारी नहीं है। जैसे दुष्यंत कुमार ने कहा था, "सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं," वैसे ही पाश के लिए सपने देखना केवल सोने की क्रिया नहीं, बल्कि जागते हुए एक बेहतर समाज के लिए दर्द सहने का संकल्प है।
हिंदी व्याकरण और मारक बिंब (Imagery)
- मानवीकरण (Personification): पाश ने निर्जीव चीज़ों का मानवीकरण किया है—बारूद की आग, हथेली का पसीना, और इतिहास के ग्रंथ। इन सभी को उन्होंने 'सपनों' से वंचित बताया है, क्योंकि इनमें मानवीय पीड़ा का अहसास (Consciousness) नहीं है।
- विरोधाभास (Contrast): एक ओर "सोई आग" (निष्क्रियता) है, तो दूसरी ओर "नींद की नज़र होना" (नींद का बलिदान देकर सक्रिय होना) है।
निष्कर्ष: क्या आपके पास "झेलने वाला दिल" है?
यह कविता हमें एक आत्म-मूल्यांकन (Self-Reflection) के कटघरे में खड़ा करती है। क्या हम महज़ 'इतिहास के ग्रंथों' की तरह धूल फाँक रहे हैं, या हम उन सिसकियाँ देते हुए दिलों में शामिल हैं जो एक नया सूरज उगाने की क्षमता रखते हैं? सपने मुफ़्त नहीं हैं; इनकी कीमत आपकी रातों की नींद और आपकी रूह की तड़प है।
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External Authoritative References
https://en.wikipedia.org/wiki/Pash, https://www.rekhta.org/poets/pash/poems, https://hindisamay.com/content/1155/1/
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. पाश के अनुसार 'सपने' किसे नहीं आते?
कविता के अनुसार, बारूद के बेजान कणों (दिशाहीन शक्ति), बुराई के लिए उठी हुई हथेली (शोषक वर्ग) और शेल्फ़ों में पड़े इतिहास-ग्रंथों (अतीत के मुर्दा पन्नों) को सपने नहीं आते।
2. "झेलने वाले दिलों का होना" से कवि का क्या तात्पर्य है?
इसका अर्थ है एक ऐसा संवेदनशील हृदय होना जो समाज की पीड़ा, अन्याय और दुख को गहराई से महसूस कर सके (सहानुभूति/Empathy)। केवल ऐसे ही लोग एक बेहतर समाज का सपना देख सकते हैं।
3. सपने देखने के लिए क्या 'लाज़िमी' (ज़रूरी) बताया गया है?
पाश के अनुसार, सपने देखने के लिए "नींद की नज़र होना" यानी अपने सुकून और आराम का बलिदान करना सबसे ज़रूरी (लाज़िमी) शर्त है।
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