पाश की कविता "हमारे समयों में": खोखले विकास और राजनीतिक पतन का काला दस्तावेज़
जब एक देश का 'सम्मान' उसकी जनता के गिरते हुए कंधों पर टिक जाए, तो उस देश का यथार्थ कैसा होगा? यदि "तुम्हारे बग़ैर" में पाश ने अपने भीतर के शून्य से बात की थी, तो "हमारे समयों में" कविता उस शून्य की बात करती है जो सत्ता ने पूरे समाज के भीतर पैदा कर दिया है। यह कविता 70 के दशक के भारत का वह एक्सरे है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है。
साहित्यशाला के इस मंच पर हम देख चुके हैं कि पाश ने कैसे 'देश की सुरक्षा' के नाम पर फैले छद्म राष्ट्रवाद (Jingoism) को बेनकाब किया था। इस सातवीं कविता में पाश एक अत्यंत कठोर राजनीतिक व्यंग्य रचते हैं। जहाँ प्रधानमंत्री की तस्वीर केवल कैलेंडरों में सिमट जाती है, परमाणु परीक्षणों (Atomic tests) की राख भूखी जनता की रूह पर गिरती है, और मार्क्सवाद जैसी महान विचारधाराएँ सत्ता के गलियारों में "मिमियाने" लगती हैं। यह कविता हमें बताती है कि हम 'धीमे-धीमे मरने' को ही ज़िंदा रहना समझ बैठे हैं।
कविता का मूल पाठ: हमारे समयों में
▶ पूर्ण देवनागरी कविता (यहाँ क्लिक करें)
स्रोत : पुस्तक: लहू है कि तब भी गाता है (पृष्ठ 37) | अनुवाद: चमनलाल
▶ Hinglish Transliteration (Click to read)
राजनीतिक और मिथकीय व्यंग्य (Political & Mythological Satire)
इस कविता में 1970 के दशक की भारतीय राजनीति का सबसे खौफनाक और सजीव चित्रण है। जब देश पोखरण में अपना पहला 'शानदार एटमी तजर्बा' (Nuclear Test - 1974) कर रहा था, उसी समय देश के कोने-कोने में भयंकर गरीबी और भुखमरी थी। पाश इस विडंबना को उजागर करते हैं कि राष्ट्र के 'सम्मान' का यह पौधा भूखे इंसानों के 'घटते हुए कंधों' पर उगाया जा रहा था। जब अर्थव्यवस्था (Economy) इतनी गिर जाए कि रोटी माँगने आए अध्यापकों का लहू सड़कों पर बहे, तो परमाणु बम का गर्व किस काम का?
मिथकों का टूटना और मार्क्सवाद का पतन
कविता का सबसे मारक व्यंग्य पौराणिक और राजनीतिक मिथकों पर है:
- रावण और तेल का टिन: दशहरे के मैदान में जो बूढ़ा रावण का किरदार निभा रहा है, वह सीता का अपहरण करने वाला महापराक्रमी राजा नहीं है, बल्कि वह राशन की कतार में 'तेल का टिन' माँगता हुआ एक लाचार इंसान है।
- मार्क्स का मिमियाता सिर: कार्ल मार्क्स की विचारधारा (जिसने "हम लड़ेंगे साथी" जैसे वर्ग-संघर्ष को जन्म दिया), दिल्ली की सत्ता के गलियारों में जाकर सिंह की बजाय 'भेड़' की तरह मिमियाने लगी है। यानी वामपंथी नेता सत्ता के दलाल बन गए हैं।
यह विचार बिल्कुल अदम गोंडवी की ग़ज़लों से मेल खाता है, जहाँ सत्ता के खोखले वादों को नंगा किया गया है。
धीमे-धीमे मरना: दार्शनिक निष्कर्ष (Existential Crisis)
कवि हमें उस खौफनाक 'Status Quo' से आगाह करता है जहाँ "हम धीमे-धीमे मरने को ही जीना समझ बैठे थे"। यह दुष्यंत कुमार की उस ग़ज़ल की याद दिलाता है—"हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए।" पाश कहते हैं कि समय का मापन घड़ियों से नहीं, बल्कि "हड्डियों के खुरने" (शोषण) से हो रहा है। लेकिन अंत में वे निराशा में नहीं डूबते, बल्कि एक खिलाड़ी के जुझारूपन (Resilience) की तरह घोषणा करते हैं कि हमारे समय को इसी गंदलाए समुद्र से नफ़रत निथारकर बाहर निकलने का गौरव मिलेगा।
निष्कर्ष: क्या हमारा समय भी अभिशप्त है?
जब हम आज के युग में विकास के बड़े-बड़े दावों को देखते हैं और दूसरी तरफ बेरोज़गारी की खुरदरी ज़मीन पर खड़े होते हैं, तो पाश की यह कविता एक आईना बन जाती है। "कच्ची दीवारों पर लटकते कैलेंडरों ने प्रधानमंत्री की फ़ोटो बनकर रह जाना था"—यह पंक्ति आज के डिजिटल प्रोपेगैंडा युग पर भी उतनी ही गहरी चोट करती है। क्या हम अब भी 'धीमे-धीमे मरने' को जीना समझ रहे हैं?
साहित्य की ऐसी ही आग उगलती और रूह कंपा देने वाली कविताओं की इस यात्रा में Sahityashala.in और हमारे English Poetry तथा Maithili Poems खंडों से जुड़े रहें।
External Authoritative References
https://en.wikipedia.org/wiki/Pash, https://www.rekhta.org/poets/pash/poems, https://hindisamay.com/content/1155/1/
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. "शानदार एटमी तजर्बे" से पाश का क्या आशय है?
यह 1974 में भारत द्वारा किए गए पहले परमाणु परीक्षण (Nuclear Test) की ओर व्यंग्य है। पाश का कहना है कि जिस देश में शिक्षक रोटी के लिए सड़क पर खून बहा रहे हों, वहाँ ऐसे 'शानदार' परीक्षण खोखले राष्ट्रवाद का प्रतीक हैं。
2. "मार्क्स का सिंह जैसा सिर मिमियाता फिरता है" - इसका क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि कार्ल मार्क्स की वह क्रांतिकारी विचारधारा जिसने दुनिया भर के मज़दूरों को लड़ने की ताकत दी, वह दिल्ली की सत्ता और राजनीति के गलियारों में आकर समझौतावादी (भेड़ की तरह मिमियाने वाली) हो गई है。
3. कविता में 'धीमे-धीमे मरने' से कवि क्या संदेश देना चाहता है?
कवि बताना चाहता है कि अभावों, शोषण और चुप रहने की आदत ने समाज को मानसिक रूप से मार दिया है। लोग बिना विरोध के घुट-घुट कर जीने (धीमे-धीमे मरने) को ही अपनी नियति (ज़िंदगी) मान चुके हैं。