पाश की कविता "युद्ध और शांति": सत्ता की 'शांति' का पाखंड और संघर्ष के 'प्रेम' का घोषणापत्र
दुनिया का हर शोषक तंत्र अपने नागरिकों को एक अफीम चटाता है, जिसका नाम है—'शांति'। यदि "23 मार्च" में पाश ने शहादत को भुनाने वाले नेताओं को नंगा किया था, तो "युद्ध और शांति" उस पूरी व्यवस्था पर एक वैचारिक बम है जो हमें लड़ना भूलकर 'रेंगने' पर मजबूर करती है। यह कविता स्थापित करती है कि जो शांति आपको कायर बना दे, वह दरअसल बाघ के जबड़े में टपकता हुआ आपका ही खून है।
साहित्यशाला के इस मंच पर हम पाश के सबसे उग्र मार्क्सवादी और अस्तित्ववादी दर्शन को डिकोड करने जा रहे हैं। पाश कहते हैं कि युद्ध (संघर्ष) विनाश नहीं है, बल्कि वह बच्चों के लिए खिलौने, बीवियों के लिए दूध और माँ के लिए ऐनक लाने का एकमात्र रास्ता है। यह कविता उन बुद्धिजीवियों पर एक गहरा तमाचा है जो 'शांति' का जाप करते हुए आम आदमी को फाँसी के फंदे तक पहुँचा देते हैं।
कविता का मूल पाठ: युद्ध और शांति
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स्रोत : पुस्तक: लहू है कि तब भी गाता है (पृष्ठ 46) | अनुवाद: चमनलाल
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दार्शनिक और राजनीतिक विश्लेषण: 'शांति' का भ्रम
पाश इस कविता में 'False Pacifism' (झूठे शांतिवाद) की धज्जियाँ उड़ाते हैं। समाज हमेशा हमें 'शरीफ़' बनने और समझौता करने (Adjustment) की सीख देता है। इसी समझौते (शांति) की चाहत में एक आम इंसान इतना 'छोटा' हो जाता है कि वह व्यवस्था से लड़ने के बजाय अपने ही घर में आर्थिक तंगी (Finance) का गुस्सा अपने थके हुए बाप ("अन्नखाऊ बुड्ढा") और भूखी बीवी ("चुड़ैल का साया") पर उतारता है। पाश कहते हैं कि यह कायरता है; यह "आत्मा में छिपे गीदड़ों का हौंकना है।"
गांधीवादी शांति और सत्ता का खद्दर
कविता का सबसे विस्फ़ोटक और विवादास्पद हिस्सा वह है जहाँ पाश लिखते हैं—"शांति गांधी का जाँघिया है, जिसकी तनियों को चालीस करोड़ आदमियों को फाँसी लगाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।" यह पंक्ति भारतीय राज्य के State-Sponsored Non-violence पर सबसे भयंकर व्यंग्य है। पाश का तर्क है कि शासक वर्ग 'शांति' और 'अहिंसा' का पाठ इसलिए पढ़ाता है ताकि शोषित और भूखी जनता (अदम गोंडवी की ग़ज़लों का यथार्थ) कभी बग़ावत न कर सके। यह शांति दुष्यंत कुमार के "गूँगे निकल पड़े हैं ज़बाँ की तलाश में" को चुप कराने की साज़िश है।
'युद्ध' की नई परिभाषा: प्रेम और सृजन का शिखर
पाश के लिए 'युद्ध' खून-खराबा नहीं है। युद्ध 'वर्ग-संघर्ष' (Class Struggle) है।
- युद्ध एक जुझारू खेल (Sportsmanship) की तरह "जीने की गर्मी का नाम है।"
- युद्ध सृजन है: "बच्चों के लिए गेंद", "बीवियों के स्तनों में दूध", और "बूढ़ी माँ की नज़र की ऐनक"।
जब तक इंसान अपने हक़ के लिए लड़ेगा नहीं, तब तक उसे यह बुनियादी ज़रूरतें नहीं मिलेंगी। "युद्ध के बग़ैर हम बहुत अकेले हैं... युद्ध ही इस घोड़े (निरंकुश सत्ता) की लगाम बन सकेगा।"
निष्कर्ष: क्या आप संदूक़ में छिपे हैं या युद्ध कर रहे हैं?
पाश की यह कविता हमें झकझोरती है कि हम 'शांति' के नाम पर अपनी कायरता को न छिपाएँ। जो शांति आपको आपकी चेतना और अधिकारों से वंचित कर दे, वह शांति नहीं, एक धीमा ज़हर है। सच्चा प्रेम और जीवन केवल उस 'युद्ध' के पार है, जहाँ आप अपने अस्तित्व के लिए लड़ना सीख जाते हैं।
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External Authoritative References
https://en.wikipedia.org/wiki/Pash, https://www.rekhta.org/poets/pash/poems, https://hindisamay.com/content/1155/1/
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. पाश ने 'शांति' को एक धोखा क्यों कहा है?
पाश का मानना है कि शासक वर्ग 'शांति' का पाठ इसलिए पढ़ाता है ताकि शोषित जनता कभी बग़ावत न कर सके। उनके लिए शांति का मतलब है अत्याचार सहते हुए चुप रहना और कायरों की तरह संदूक में छिपकर ज़िंदगी बिताना।
2. कविता में 'गांधी के जाँघिए' वाली पंक्ति का क्या अर्थ है?
यह राज्य-प्रायोजित शांतिवाद (State-sponsored pacifism) पर एक कठोर कटाक्ष है। कवि कहता है कि अहिंसा के जिस आवरण (जाँघिए) के पीछे सत्ता छिपती है, असल में उसी का इस्तेमाल करके वह करोड़ों गरीबों की आवाज़ को घोंटती (फाँसी लगाती) है।
3. पाश के लिए 'युद्ध' का असली अर्थ क्या है?
पाश के लिए युद्ध कोई खून-खराबा या देशों की लड़ाई नहीं है; यह 'वर्ग-संघर्ष' (Class Struggle) और अपने अधिकारों की लड़ाई है। वे इसे 'इश्क़ का शिखर' मानते हैं, क्योंकि इसी संघर्ष से बच्चों के लिए खिलौने और घर में रोटी आती है।
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