पाश की कविता "23 मार्च": शहादत का बाज़ारीकरण और एक शहीद का ईश्वरीय एकांत
इतिहास गवाह है कि शहादत हमेशा क्रांतिकारियों के हिस्से आती है, लेकिन उसका 'मुनाफ़ा' सत्ता में बैठे राजनेता उठाते हैं। यदि "उम्र" कविता में पाश ने एक कायर जीवन पर सवाल उठाया था, तो "23 मार्च" उस जीवन का जश्न है जो फाँसी के फंदे पर झूल कर अमर हो गया। यह कविता स्पष्ट रूप से भगत सिंह की शहादत के इर्द-गिर्द बुनी गई है, लेकिन इसका मुख्य निशाना वह राजनीतिक पाखंड है जो शहादत के अगले ही दिन शुरू हो जाता है।
साहित्यशाला के मंच पर हम पाश के इस तीखे मनोवैज्ञानिक वार को समझने जा रहे हैं। जब एक शहीद जाता है, तो जनता कैसे अनाथ हो जाती है और कैसे देश की 'सबसे बड़ी पार्टी' के नेता झूठे आँसू बहाने की बजाय अपनी नाक पोंछकर सिर्फ भाषण देने की प्रैक्टिस (मशक़) करते हैं। यह कविता "संसद" के ज़हरीले छत्ते में बैठी मक्खियों का असली चेहरा बेनकाब करती है।
कविता का मूल पाठ: 23 मार्च
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स्रोत : पुस्तक: लहू है कि तब भी गाता है (पृष्ठ 31) | अनुवाद: चमनलाल
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राजनीतिक व्यंग्य और शहादत का मनोविज्ञान
यह कविता भारतीय इतिहास के एक विशिष्ट 'Timeline' (23 मार्च 1931 - भगत सिंह की फाँसी) को केंद्र में रखती है। पाश बताते हैं कि एक नायक के जाने के बाद समाज अनाथ हो जाता है। "बाक़ी लोग किसी दृश्य की तरह बचे"—यानी आम जनता के पास अब करने को कुछ नहीं था, वे केवल मूक दर्शक बन गए थे।
नेताओं का पाखंड: "आँसू नहीं, नाक पोंछी"
कविता का सबसे मारक व्यंग्य वह है जहाँ पाश 'देश की सबसे बड़ी पार्टी' (तात्कालिक संदर्भ में कांग्रेस) के पाखंड पर प्रहार करते हैं। शहादत के बाद राजनेताओं ने शोक में 'आँसू' नहीं बहाए, बल्कि रुमाल से सिर्फ 'नाक पोंछी' (दिखावा किया), और तुरंत अपना "गला साफ़ कर बोलने की मशक़ (Practice) की"। वे जानते थे कि अब इस शहादत को चुनावी और राजनीतिक मुनाफ़े में कैसे बदलना है। यह व्यंग्य हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ राजनीतिक व्यंग्यों की श्रेणी में सबसे ऊपर खड़ा होता है।
जनता से जुड़ाव और ईश्वरीय तुलना
राजनीति से हटकर, पाश ने शहीद का आम जनता से जुड़ाव बहुत ही कोमल बिंब में उकेरा है—"लोगों के घरों में, उनके तकियों में छिपे हुए कपड़े की महक की तरह बिखर गया।" शहीद कोई पत्थर की मूर्ति नहीं था, वह हर माँ के बेटे, हर प्रेमिका के प्रिय की तरह लोगों के बिस्तर की महक में ज़िंदा रहा।
अंतिम पंक्ति दार्शनिक विद्रोह का चरम है: "वह अकेला था ईश्वर की तरह, लेकिन ईश्वर की तरह वह निस्तेज न था।" फाँसी के फंदे पर वह अकेला था (सर्वशक्तिमान ईश्वर की तरह), लेकिन ईश्वर की तरह 'निस्तेज' (निष्क्रिय/उदासीन) नहीं था। उसके चेहरे पर क्रांति का तेज़ था, जो अदम गोंडवी या दुष्यंत कुमार की रचनाओं में दिखाई देने वाली आग के समान प्रज्वलित था।
निष्कर्ष: शहादत किसकी, और भाषण किसका?
आज भी हम हर '23 मार्च' को राजनेताओं को लंबे-लंबे भाषण देते देखते हैं। पाश की यह कविता हमें मजबूर करती है कि हम उस पाखंड को पहचानें जहाँ शहादत का इस्तेमाल सिर्फ वोट बैंक के लिए किया जाता है। असली शहीद तो आज भी उस आम जनता के पसीने और संघर्ष (Sports/Struggle) की महक में ज़िंदा है, न कि सत्ता के खोखले वादों में।
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External Authoritative References
https://en.wikipedia.org/wiki/Pash, https://www.rekhta.org/poets/pash/poems, https://hindisamay.com/content/1155/1/
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. "23 मार्च" कविता का ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?
यह कविता 23 मार्च 1931 को शहीद-ए-आज़म भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को दी गई फाँसी (शहादत) के संदर्भ में लिखी गई है, जिसमें उनकी मौत के बाद देश के राजनीतिक हालात का चित्रण है।
2. "चेहरे से आँसू नहीं, नाक पोंछी" के माध्यम से पाश क्या कहना चाहते हैं?
यह देश की तत्कालीन सबसे बड़ी पार्टी (राजनेताओं) के पाखंड पर व्यंग्य है। उन्होंने शहीद की मौत पर सच्चा शोक (आँसू) नहीं मनाया, बल्कि महज़ दिखावा किया और तुरंत इस शहादत को भुनाने के लिए भाषणों की प्रैक्टिस शुरू कर दी।
3. "ईश्वर की तरह वह निस्तेज न था" का क्या दार्शनिक अर्थ है?
पाश कहते हैं कि फाँसी के फंदे पर भगत सिंह अकेले ज़रूर थे (जैसे ईश्वर अकेला होता है), लेकिन वे ईश्वर की तरह संसार के दुखों के प्रति उदासीन या 'निस्तेज' (बिना चमक/आग के) नहीं थे। उनके चेहरे पर क्रांति का गहरा तेज़ और सक्रियता थी।