पाश की कविता "उम्र": अस्तित्व का संकट और 'ज़िंदा' रहने पर एक दार्शनिक अट्टहास
यदि एक इंसान की ज़िंदगी में कोई चेतना, कोई संघर्ष या कोई विद्रोह नहीं है, तो उसके जीने का क्या अर्थ है? जब "संसद" में पाश ने बताया था कि लोकतंत्र एक भ्रम है और "संविधान" में इंसान को 'सोया हुआ पशु' कहा था, तो इस कविता में वे उस सोए हुए इंसान के पूरे वजूद को ही खारिज कर देते हैं। "उम्र" महज़ दो पंक्तियों की कविता है, लेकिन यह मनुष्य के आत्मसम्मान को चीर कर रख देती है।
साहित्यशाला के इस मंच पर हमने अब तक पाश के व्यवस्था-विरोधी सुर सुने हैं। लेकिन यहाँ पाश का आक्रोश व्यवस्था पर नहीं, बल्कि उस आम आदमी की 'कायरता' पर है जो बस साँस लेने को ही जीना समझ बैठा है। यह कविता हमें चुनौती देती है कि यदि हम अन्याय के खिलाफ खड़े नहीं हो सकते, तो हमें अपनी यह लंबी 'उम्र' किसी रेंगने वाले साँप या कूड़ा खाने वाले कव्वे को दान कर देनी चाहिए।
कविता का मूल पाठ: उम्र
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स्रोत : पुस्तक: लहू है कि तब भी गाता है (पृष्ठ 36) | अनुवाद: चमनलाल
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अस्तित्ववादी शून्यता (Existential Nihilism) और बिंब-विधान
यह कविता मनुष्य के अस्तित्व पर एक गहरा 'Existential Crisis' (अस्तित्ववादी संकट) पैदा करती है। अगर हम सिर्फ पैदा होते हैं, व्यवस्था की गुलामी करते हैं, महज़ चंद पैसों (Finance) के लिए अपने ज़मीर का सौदा करते हैं और चुपचाप मर जाते हैं—तो हममें और एक जानवर में क्या फ़र्क़ है? पाश कहते हैं, "आदमी का भी कोई जीना है!" यह विस्मयादिबोधक निराशा अदम गोंडवी की उस पीड़ा के समान है जहाँ वे समाज की मुर्दा-शांति पर रोते हैं।
कौवा और साँप: एक खौफनाक रूपक
पाश ने 'उम्र दान' करने के लिए शेर, चील या हंस का नाम नहीं लिया। उन्होंने जानबूझकर 'कव्वे' (Crow) और 'साँप' (Snake) को चुना है। इसके पीछे गहरा मनोविज्ञान है:
- कौवा (The Scavenger): कौवा लंबा जीवन जीता है, लेकिन वह जीवन भर जूठन और कूड़ा खाता है। जो इंसान आत्मसम्मान गँवाकर सत्ता की फेंकी हुई जूठन पर पलता है, उसका जीवन कौवे के समान ही तो है।
- साँप (The Crawler): साँप ज़मीन पर रेंगता है और उसके भीतर ज़हर होता है। जो इंसान सीना तान कर (रीढ़ की हड्डी के साथ) नहीं चल सकता, वह समाज में रेंगता हुआ साँप ही है, जो केवल दूसरों से ईर्ष्या (ज़हर) रखता है लेकिन व्यवस्था से नहीं लड़ता।
खेल और ज़िंदगी का फ़र्क़
जैसे खेल (Sports) में एक टीम हारने के बावजूद तब तक सम्मान पाती है जब तक वह आखिरी साँस तक लड़ती है, वैसे ही ज़िंदगी है। पाश का दर्शन स्पष्ट है: बिना 'संघर्ष' के सौ साल जीने से बेहतर है कि वह उम्र किसी साँप या कौवे को 'बख़्शीश' (दान) में दे दी जाए। यह विचार दुष्यंत कुमार की उस लाइन को पुख्ता करता है—"जिएँ तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले, मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए।"
निष्कर्ष: क्या आपकी उम्र सिर्फ 'कैलेंडर' बदल रही है?
महज़ चौदह शब्दों की यह कविता साहित्य के इतिहास में एक एटमी तजर्बे (Nuclear explosion) की तरह है। यह हर उस इंसान से जवाब माँगती है जो अन्याय देखकर आँखें मूँद लेता है। पाश हमें चेताते हैं कि लंबी उम्र का कोई गौरव नहीं होता, गौरव 'चेतना' का होता है। अगर ज़मीर मर चुका है, तो आप जी नहीं रहे हैं, बस अपनी उम्र काट रहे हैं।
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External Authoritative References
https://en.wikipedia.org/wiki/Pash, https://www.rekhta.org/poets/pash/poems, https://hindisamay.com/content/1155/1/
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. पाश ने अपनी उम्र 'कव्वे या साँप' को दान करने की बात क्यों कही है?
कौवा जूठन खाता है और साँप ज़मीन पर रेंगता है। पाश का व्यंग्य है कि जो इंसान आत्मसम्मान गँवाकर सत्ता की जूठन पर पलता है और बिना रीढ़ की हड्डी के रेंगता है, वह वैसे भी साँप या कौवे का ही जीवन जी रहा है, इसलिए उसे अपनी उम्र इन्हीं जानवरों को दे देनी चाहिए।
2. "आदमी का भी कोई जीना है" इस पंक्ति में कौन सा भाव छिपा है?
इस पंक्ति में गहरी 'अस्तित्ववादी निराशा' (Existential Disgust) है। कवि उस आम आदमी की कायरता और निष्क्रियता से निराश है जो अन्याय के खिलाफ लड़ना छोड़ चुका है और महज़ साँस लेने को ही जीवन समझ रहा है।
3. क्या दो पंक्तियों की यह कविता वास्तव में पूरी है?
हाँ, वैचारिक रूप से यह पूर्ण है। पाश को जो मारक संदेश देना था—कि बिना चेतना और आत्मसम्मान के मानव जीवन व्यर्थ है—उसे उन्होंने सिर्फ दो बिंबों (कौवा और साँप) के माध्यम से पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है।
पाश को सुनें और समझें (Video Analysis)
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