अमृता प्रीतम: वह बेबाक आवाज़ जिसने कविता और स्त्री के मायने हमेशा के लिए बदल दिए
क्या एक औरत समाज की बेड़ियों को तोड़कर अपनी शर्तों पर मोहब्बत कर सकती है?
हर साल 31 अक्टूबर का दिन साहित्य जगत में एक गहरी खामोशी और फिर एक गूँज लेकर आता है। यह दिन उस अज़ीम लेखिका और कवयित्री अमृता प्रीतम की पुण्यतिथि का है, जिन्होंने अपनी कलम से मोहब्बत, दर्द, बगावत और रूहानियत की वह इबारत लिखी जो सदियों तक मिटाई नहीं जा सकेगी। आज हम साहित्यशाला के इस विशेष ब्लॉग में याद कर रहे हैं उस अमृता को, जो सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि साहित्य के आसमान का एक ऐसा धधकता हुआ सूरज हैं जिनकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ सकती।
अमृता के जीवन और उनके क्रांतिकारी विचारों को गहराई से समझने के लिए आप हमारी विशेष श्रेणी --पंजाबी साहित्य के दिग्गज-- पर जा सकते हैं, जहाँ उनके युग के अन्य महान लेखकों की गाथाएँ दर्ज हैं।
साहित्य में स्त्री की गूँज: "ऑब्जेक्ट" से "सब्जेक्ट" तक का सफर
अमृता प्रीतम से पहले हिंदी और पंजाबी कविता में स्त्री की छवि अक्सर एक मौन प्रेमिका, एक आदर्श त्याग की मूरत या फिर विरह में जलती हुई अबला की हुआ करती थी। कविता में स्त्री महज़ एक 'विषय' (Object) थी, जिसकी सुंदरता का बखान पुरुष कवि किया करते थे। लेकिन अमृता ने इस सांचे को हमेशा-हमेशा के लिए तोड़ दिया!
उन्होंने साहित्य में स्त्री को उसकी अपनी आवाज़, इच्छाएँ (Desires) और हक़ दिया। अमृता ने सिखाया कि एक औरत भी अपने हक़ के लिए लड़ सकती है, खुलकर प्यार कर सकती है और समाज की परवाह किए बिना अपनी शर्तों पर जी सकती है। उनके साहसिक जीवन के बारे में अधिक जानने के लिए आप विकिपीडिया पर अमृता प्रीतम का जीवन परिचय पढ़ सकते हैं।
'मुलाक़ात': बादलों की भीड़ से बेखौफ गुज़र जाने का नाम है अमृता
(अनुवाद : अमिया कुँवर)
इस कविता में 'काले और गरजते बादल' समाज की उन बंदिशों और बाधाओं का प्रतीक हैं जो एक स्त्री या प्रेमी को डराते हैं, लेकिन प्रेम की गहराई इन सब से परे है।
पर घबराई हुई खड़ी थी...
कि बादलों की भीड़ में से कैसे गुज़रूँगी...
कई बादल स्याह काले थे
ख़ुदा जाने—कब के और किन संस्कारों के
कई बादल गरजते दिखते
जैसे वे नसीब होते हैं राहगीरों के...
मैं नहीं जानती थी कि क्या और किसे कहूँ
कि काया के अंदर एक आसमान होता है
और उसकी मोहब्बत का तकाज़ा...
वह कायनाती आसमान का दीदार माँगता है...
उसने तो इश्क़ की एक कनी खा ली थी
और एक दरवेश की मानिंद उसने
मेरे श्वासों की धूनी रमा ली थी...
कहा—
तुम किसी से रास्ता न माँगना
और किसी भी दीवार को
हाथ न लगाना
न घबराना
न किसी के बहलावे में आना
और बादलों की भीड़ में से—
तुम पवन की तरह गुज़र जाना।
स्रोत : पुस्तक : मैं तुम्हें फिर मिलूँगी (पृष्ठ 33)
देह और आत्मा का दार्शनिक मिलन
अमृता जी की कविताओं में देह और आत्मा के बीच का द्वंद्व बहुत ही रहस्यमयी अंदाज़ में सामने आता है। अमृता जी की ऐसी ही अन्य शानदार कविताओं का डिजिटल संग्रह आप हिंदवी (Hindwi) की आधिकारिक वेबसाइट पर पढ़ सकते हैं।
'गुफा-चित्र': देह के पार जाती काया का रहस्य
(अनुवाद : अमिया कुँवर)
जब गुफा के द्वार पर आया...
तो कई रंगों का
शाही जामा पहन कर आया...
जाने ख़ुदा!—इस गुफा में से
कैसा आकर्षण उठा था
कि सूरज ने सिर झुकाया
और गुफा के सँकरे द्वार में से आया...
चित्र प्राणमय हुए, हँसे
और कहने लगे—
काया से गुज़र कर
जो काया का टुकड़ा
काया के पार जाता है
उसका कभी चित्र नहीं बनता...
मैं नहीं जानती—
यह किस काल की गाथा
पर इतना जानती हूँ कि एक वक़्त आया था
कि गुफा के चित्रों को देखता
सूरज दरवेश हुआ था...
स्रोत : पुस्तक : मैं तुम्हें फिर मिलूँगी (पृष्ठ 21)
साहित्य में महिला रचनाकारों के इस बेखौफ संघर्ष को समझने के लिए हमारी सीरीज़ --भारतीय साहित्य की विद्रोही लेखिकाएँ-- ज़रूर पढ़ें। वैश्विक मंच पर उनके योगदान को पोएट्री फाउंडेशन (Poetry Foundation) द्वारा भी सराहा गया है।
अमृता प्रीतम: एक दुर्लभ चित्र-दीर्घा (Album)
उनके जीवन, संघर्ष और प्रेम के अनदेखे और खूबसूरत लम्हें।
अमृता प्रीतम के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. अमृता प्रीतम की पुण्यतिथि कब मनाई जाती है?
अमृता प्रीतम का निधन 31 अक्टूबर 2005 को हुआ था। हर वर्ष इस दिन साहित्य जगत उन्हें भारी मन से याद करता है और उनकी रचनाओं का पाठ किया जाता है।
2. अमृता प्रीतम और साहिर लुधियानवी का रिश्ता क्या था?
अमृता जी का मशहूर शायर साहिर लुधियानवी से गहरा एकतरफा और रूहानी प्रेम था, जिसका ज़िक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा "रसीदी टिकट" में बेहद बेबाकी से किया है। हालाँकि, अंततः उन्हें सच्चा सुकून और जीवनभर का साथ आर्टिस्ट इमरोज़ के रूप में मिला।
3. साहित्य में उनके सबसे बड़े योगदान के लिए उन्हें कौन से पुरस्कार मिले?
उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (1956 - यह सम्मान पाने वाली वह पहली महिला थीं), ज्ञानपीठ पुरस्कार (1981) और भारत सरकार द्वारा पद्म विभूषण (2004) से सम्मानित किया गया था।
निष्कर्ष: "मैं तुम्हें फिर मिलूँगी" - एक चिरंजीवी विरासत
31 अक्टूबर 2005 को अमृता प्रीतम ने भले ही इस दुनिया को अलविदा कह दिया था, लेकिन क्या वे सच में गईं? बिल्कुल नहीं। उन्होंने खुद कहा था, "मैं तुम्हें फिर मिलूँगी..." और वे आज भी हर रोज़ अपनी कविताओं, अपनी कहानियों और अपने बागी विचारों के ज़रिए हमसे मिलती हैं।
जब भी कोई औरत समाज के "काले बादलों" के बीच से "पवन की तरह गुज़र जाने" का साहस करती है, तो उस साहस में अमृता की ही परछाई होती है। साहित्यशाला की ओर से इस महान लेखिका को उनकी पुण्यतिथि पर शत-शत नमन।
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