क्या एक गरीब इंसान की जान से ज्यादा कीमती हैं 'साहब के जूते'?
भारतीय नौकरशाही और सिस्टम की संवेदनहीनता पर कई कहानियाँ लिखी गई हैं, लेकिन आज साहित्यशाला के मंच पर हम जो कहानी प्रस्तुत कर रहे हैं, वह आपके रोंगटे खड़े कर देगी। हमारे एक युवा और होनहार लेखक जुनेद अख्तर (कुशीनगर, उत्तर प्रदेश) ने अपनी एक बेहद मार्मिक रचना हमें भेजी है—"साहब के जूते"।
यह कहानी सिर्फ एक बुजुर्ग किसान केशव की व्यथा नहीं है, बल्कि यह उस कड़वे सच का आईना है जहाँ एक आम इंसान इंसाफ की गुहार लगाते-लगाते अपनी गरिमा तक दांव पर लगा देता है। यह यथार्थ आपको सत्य का श्रृंगार नहीं होता के उस दर्शन की याद दिलाएगा, जहाँ गरीबी और बेबसी पर कोई पर्दा नहीं डाला जा सकता। आइए, पढ़ते हैं वह दास्तान जहाँ एक इंसान के स्वाभिमान से ज्यादा अहमियत जूतों की होती है।
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साहब के जूते
लेखक: जुनेद अख्तर
तहसील के लोहे वाले बड़े फाटक के बाहर आज पैर रखने की जगह नहीं थी। धूल का एक बवंडर सा उड़ रहा था, जो आती-जाती सरकारी गाड़ियों के पहियों से छूटकर सीधे लोगों के मुंह पर चिपक रहा था। महीने का पहला मंगलवार—समाधान दिवस। यानी वो दिन जब देहात के कोने-कोने से लोग इस आस में खिंचे चले आते हैं कि शायद आज कोई बड़ा साहब उनकी बात सुन ले।
फाटक के ठीक किनारे, ईंटों की एक टूटी दीवार से टेक लगाए केशव खड़ा था। उम्र कोई साठ के पार रही होगी, पर जिस्म से सत्तर का लगता था। धूप में झुलसी काली चमड़ी, माथे पर गहरी लकीरें और कमर में हल्का सा झुकाव। दोनों हाथों से उसने अपनी पुरानी लाठी को इतनी मजबूती से थाम रखा था, जैसे फिसलती हुई जिंदगी को किसी तरह टिकाये रखने की कोशिश कर रहा हो।
कंधे पर लटका मैला सा झोला बार-बार सरक रहा था। केशव ने उसे उंगलियों से थोड़ा संभाला। उस झोले में मुड़े-तुड़े, पीले पड़ चुके सरकारी कागजों की एक गड्डी थी। कुछ नक्शे, दो-चार पुरानी दरखास्तें और पिछले छह महीनों में अलग-अलग बाबुओं से मिली तारीखों की रसीदें। हर कागज के कोने पसीने और धूल से काले पड़ चुके थे।
आस-पास अजीब सी हलचल मची थी। कोई किसी वकील को घेरकर खड़ा था, कोई अर्जी लेखक से दस रुपए देकर अपनी फरियाद लिखवा रहा था। हर चेहरे पर वही एक बेचैनी थी, जो सालों से दफ्तरों के चक्कर काटने वालों की आंखों में जम जाती है। यह भीड़ तंत्र और व्यवस्था की उस राजनीति को दर्शाती है जहाँ आम आदमी हमेशा हाशिए पर खड़ा रहता है।
मीटिंग हॉल के बाहर चपरासी बार-बार भीड़ को डपट कर पीछे धकेल रहा था। अंदर पंखे चल रहे थे और बाहर लोग पसीने से तर-बतर थे। केशव ने एक बार अपनी पथराई आंखों से तहसील के उस भारी भरकम बरामदे को देखा, फिर धीरे से लाठी को जमीन पर टिकाते हुए एक कदम आगे बढ़ाया। मन में बस यही एक धुंधली सी उम्मीद थी—शायद आज, इतने बड़े-बड़े साहबों के बीच, उसकी भी कोई सुन ले।
"केशव दास... साकिन पिपरी... कौन है भाई?"
चपरासी की तेज, कर्कश आवाज बरामदे की दीवारों से टकराई। केशव चौंक पड़ा। उसने कांपते हाथों से लाठी संभाली, झोले को छाती से सटाया और लड़खड़ाते कदमों से पर्दे को हटाकर बड़े कमरे में दाखिल हुआ।
कमरे के भीतर आते ही ठंडी हवा का एक झोंका मुंह पर लगा। सामने बड़ी सी मेज पर नीले रंग का मोटा कपड़ा बिछा था, जिस पर फाइलों का अंबार लगा था। बीच में बैठे थे डीएम साहब। चश्मे के पीछे उनकी आंखें सामने रखी किसी फाइल पर टिकी थीं।
केशव ने दोनों हाथ जोड़कर सिर झुका दिया, "माई-बाप परनाम!"
उसने अपनी बात कहनी शुरू ही की थी—"हजूर, हम पिपरी से आए हैं, हमरे साथ बहुत अन्याय..."
लेकिन डीएम साहब ने एक पल के लिए भी अपनी नजर फाइल से ऊपर नहीं उठाई। कलम से पन्ने पर कुछ घसीटते हुए, हाथ के एक इशारे से कोने में बैठे एक दूसरे अधिकारी की तरफ इशारा कर दिया, "इनके पास जाओ। ये देखेंगे तुम्हारा।"
केशव पल भर के लिए ठिठक गया। फिर धीरे-धीरे मुड़कर उस दूसरे साहब की मेज के पास जाकर खड़ा हो गया। उस साहब ने हाथ बढ़ाकर अर्जी ली और बिना खोले, बाकी कागजों के ढेर के नीचे दबाते हुए बोले, "हां, बताओ, क्या बात है?"
साहब का सवाल सुनते ही केशव का सालों से दबा बांध जैसे टूट पड़ा। उसकी जुबान थरथराने लगी, देहाती बोली में हर लफ्ज दर्द बनकर फूटने लगा—
"साहब... तीन साल पहिले हमार लड़का जमीन का नपाई करवले रहल। सब ठीक ठाक चलत रहे हुजूर बाकिर छह महीना पहिले, ऊ हमार एकर-एक लड़का, हमनी के बीच डगरिए छोड़ के भगवान के पियारा हो गइल।"
केशव का गला रुँध गया, उसने अपने मैले कुर्ते की आस्तीन से आंख का कोना पोंछा। एक पिता का यह विलाप उन गहरी भावनाओं का प्रतीक है जिन्हें शब्दों में पिरोना मुश्किल होता है, ठीक वैसे ही जैसे गीतों और कविताओं के गहरे अर्थों में जीवन का दर्द छिपा होता है।
"अब बस हम आ हमार बुढ़िया बचे हईं साहब। लड़का के मरे के बाद, हमार सगा भाई कुछ दिन बड़ा सेवा-पानी कइलस। हमनी सोचे कि चलो, भाई काम आवत बा। बाकिर हम का जानत रहलीं साहब... छल कइके, बिना कुछ बतवले, धोखे से हमार अंगूठा जमीन के कागज पर लगवा लिहलस।"
केशव दोनों हथेलियां फैलाकर मेज के सामने झुक गया। उसकी आंखों में बेबसी का समंदर था। रिश्तों में यह धोखा हमें याद दिलाता है कि स्वार्थ के आगे अक्सर इंसानियत दम तोड़ देती है, मानो यही दुनिया का सबसे कड़वा सच हो।
"अब जब जमीन अपने नामे करा लिहलस, त हमनी के धक्का मार के घरे से निकाल दिहलस साहब। अब न सिर पर छप्पर बा, न दुआर। कोर्ट-कचहरी हम अनपढ़ गवार का समझब हजूर? न हमरा ई सब भावेला, न कुछ सूझेला। अउर हम ऊ जमीन का लेके का करब? जेकरे खातिर जमीन रहे, ऊ अनमोल धन त भगवान पहिले ही छीन लिहलन... बाकिर जब ले ई देह में सांस बा, तब ले रहे खातिर बस छत दिलवा दीं साहब, हमार बुढ़िया ई बारिश में थर-थर कांपत बिया... बड़ी मेहरबानी होई सरकार..."
कमरे में कुछ पलों के लिए सन्नाटा छा गया। सामने बैठे साहब ने केशव के चेहरे की झुर्रियों, उसकी कांपती लाठी और फटेहाल हाल को देखा। अर्जी पर दबा उनका हाथ रुक गया था। उनका चेहरा एकदम गंभीर हो गया और आंखों में एक अजीब सी नरमी उतर आई। साहब ने धीरे से सांस खींची और अपनी कुर्सी से थोड़ा आगे झुकते हुए बोले, "बाबा... तुम यहीं बैठो, थोड़ा सब्र रखो। हम कुछ करते हैं अभी।"
दिन का तीसरा पहर ढल रहा था। धूप की तल्खी कम हो चुकी थी और आसमान पर बादलों की एक भारी, मटमैली परत छाने लगी थी। तहसील के बरामदे में बैठा केशव टकटकी लगाए अंदर के दरवाजे को ही देख रहा था। तभी एक नए साहब तेजी से बाहर निकले। बदन पर कड़क की हुई पैंट-कमीज, सलीके से संवारे हुए बाल और चेहरे पर एक सख्त सरकारी रोब। बाहर आकर उन्होंने इधर-उधर देखा और ऊंची आवाज में पूछा, "केशव कौन है भाई? केशव पिपरी वाला?"
केशव हड़बड़ाकर लाठी के सहारे खड़ा हुआ, "हुजूर, हम... हमई केशव हैं।"
"चलो, तुम्हारे गांव चलना है। मामला आज ही निबटाना है," साहब ने कहा और अपनी सरकारी गाड़ी की तरफ बढ़ गए।
गांव की तरफ बढ़ते हुए मौसम का मिजाज और बिगड़ने लगा। आसमान से बूंदाबांदी शुरू हो चुकी थी। पिपरी गांव की सरहद शुरू होते ही पक्की सड़क खत्म हो गई। आगे बस एक संकरी, टेढ़ी-मेढ़ी कच्ची पगडंडी थी। रास्ता इतना तंग और फिसलन भरा था कि उस पर किसी भी हाल में गाड़ी आगे नहीं जा सकती थी। ड्राइवर ने गाड़ी को किनारे रोक दिया।
साहब अपने एक साथी के साथ नीचे उतरे। सामने का नजारा देखकर दोनों ठिठक गए। बारिश के पानी ने कच्चे रास्ते को पूरी तरह डुबो दिया था। ऊपर की सूखी मिट्टी बह चुकी थी और नीचे का चिकना, गाढ़ा कीचड़ पानी के नीचे छुपा हुआ था। कुछ दिखाई नहीं दे रहा था कि कहां गड्ढा है और कहां पैर रखने लायक जमीन।
साहब के साथ आए साथी ने पानी की तरफ देखकर मुंह बिचकाया और बोला, "पटवारी साहब, इस रास्ते से उस पार जाना तो नामुमकिन है। पैर डालते ही फिसल जाएंगे। आज वापस चलते हैं, रास्ता सूख जाएगा तब आकर देख लेंगे।"
साहब चुप रहे, लेकिन उनके दिमाग में जोड़-घटाव तेजी से चल रहा था। ऊपर से साफ हिदायत थी कि आज के आज ही इस मामले की जांच पूरी करके रिपोर्ट भेजनी है। काम टालना आसान नहीं था। लेकिन दूसरी तरफ उनकी निगाहें बार-बार अपने पैरों पर जा टिकती थीं। पैरों में गहरे भूरे रंग के चमचमाते, बिल्कुल नए लेदर के जूते थे। कल ही तो उनकी धर्मपत्नी ने बड़े लाड़ से उनके जन्मदिन पर यह महंगा, नामी ब्रांड का जूता तोहफे में दिया था। ऐसे कीमती जूतों को इस देहाती कीचड़ और गंदे पानी में डुबोकर बर्बाद कर देना? उनका मन किसी भी सूरत में इस बात की गवाही नहीं दे रहा था।
तभी साहब की नजर सामने कांपते हुए खड़े बूढ़े केशव पर पड़ी, और उनके दिमाग में एक युक्ति आई। साहब ने अपनी पैंट को थोड़ा ऊपर खींचते हुए केशव से कहा, "देखो केशव, ऐसे गंदे रास्ते से पैदल तो मैं जाने से रहा। और गांव पहुंचे बिना तुम्हारी समस्या का कोई हल निकल नहीं सकता। वैसे भी, इस बारिश में तुम्हारी बीमार बुढ़िया वहां खुले में भीग रही होगी, उसका भी ख्याल करो।"
केशव ने दोनों हाथ जोड़ लिए, उसकी आवाज में गिड़गिड़ाहट थी, "माई-बाप... कुछ रस्ता निकालिए हुजूर, गरीब का घर बच जाएगा।"
साहब ने अपने जूतों पर जमी हल्की सी धूल को रूमाल से झाड़ते हुए कहा, "रास्ता तो एक ही है। मैं चल तो सकता हूं, लेकिन तभी, जब तुम मुझे इस कीचड़ और पानी से बचाकर उस पार पहुंचा दो।"
केशव समझ नहीं पाया, उसने सवालिया नजरों से देखा।
साहब ने बिना किसी हिचकिचाहट के दो टूक कहा, "सीधी बात है। अगर तुम अपनी पीठ पर बैठाकर मुझे यह पूरा रास्ता पार करा दो, तो मैं चलने को तैयार हूं।"
यह सुनते ही केशव ने एक पल के लिए भी नहीं सोचा। अपने साठ साल के कमजोर, बूढ़े जिस्म की लाचारी, रीढ़ की हड्डी का दर्द या सांस की बीमारी—उसे किसी बात का तनिक भी ख्याल नहीं रहा। दिमाग में बस एक ही धुन सवार थी कि किसी तरह साहब गांव पहुंच जाएं और उसका उजड़ा हुआ घर फिर से बस जाए। यह उस आम भारतीय का संघर्ष है जो अपने मौलिक अधिकारों और न्याय की खातिर अपना सब कुछ लुटाने को तैयार रहता है।
उसने फौरन सिर झुकाकर हामी भर दी, "मालिक, आप चढ़िए... हम पार करा देंगे।"
साहब ने मुड़कर एक आखिरी शर्त और जोड़ दी, "और हां, ध्यान रखना, लौटते वक्त भी मुझे इसी तरह वापस गाड़ी तक छोड़ना होगा।"
केशव ने अपने दोनों घुटने मोड़े और पानी के किनारे झुक गया। एक हाथ में लाठी को कसकर जमीन में गड़ाया और दूसरा हाथ पीछे की तरफ फैला दिया। साहब ने अपनी पैंट को थोड़ा और समेटा और बिना किसी झिझक के उस बूढ़े, झुकी हुई रीढ़ वाले जिस्म पर सवार हो गए। साहब का भारी-भरकम वजन पड़ते ही केशव के घुटने एक बार चटके। साँस सीने में अटक कर रह गई। लेकिन उसने दांत भींच लिए, लाठी पर पूरा जोर दिया और अपने लड़खड़ाते, कांपते पैरों को कीचड़ भरे पानी में उतार दिया।
बारिश की बूंदें अब तेज हो चुकी थीं। केशव की पीठ पर साहब का पूरा बोझ था और पैरों के नीचे चिकनी, जानलेवा मिट्टी। हर एक कदम किसी इम्तिहान जैसा था। पानी इतना गंदा था कि नीचे का गड्ढा दिखाई नहीं दे रहा था। केशव की सांसें तेज चलने लगी थीं, लाठी पानी में धंसती और वह बड़ी मुश्किल से उसे खींचकर अगला कदम बढ़ाता।
आधा रास्ता लगभग पार हो चुका था। तभी एक छिपे हुए गहरे गड्ढे में केशव का दायां पैर पड़ा। नीचे की काईदार चिकनी मिट्टी पर पैर टिक नहीं पाया। केशव संभलने की कोशिश में छटपटाया, उसने लाठी को टिकाना चाहा, लेकिन लाठी गहरे कीचड़ में धंस गई। संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका था।
एक चीख के साथ केशव औंधे मुंह गिरा, और उसके साथ ही साहब भी सीधे छपाक से उस सड़े हुए कीचड़ और गंदे पानी में जा गिरे।
साहब का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उनका कड़क पैंट-कमीज मिट्टी से सन चुका था। लेकिन जैसे ही उनकी नजर अपने पैरों पर पड़ी, उनकी आंखें लाल हो गईं। वे नए, चमचमाते, महंगे ब्रांड के लेदर के जूते... अब उस बदबूदार, काले कीचड़ में पूरी तरह सन चुके थे। चमड़े पर चिकनी मिट्टी की एक मोटी परत चढ़ गई थी। यह देखकर पटवारी साहब आपा पूरी तरह खो बैठे।
केशव कांपते हुए, कीचड़ से सने हाथों के बल खुद को उठाने की कोशिश कर रहा था, "माई-बाप... गलती हो गई... माफ..."
उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि साहब ने अपने उसी कीचड़ सने भारी जूते से केशव की छाती पर पूरी ताकत से एक लात रसीद कर दी।
"हरामखोर! नीच, औकात देख अपनी!"
बूढ़े कमजोर जिस्म पर उस भारी जूते की मार इतनी जोरदार थी कि उठने की कोशिश करता केशव छटपटाकर फिर उसी कीचड़ में जा गिरा। शायद साहब को लगा कि इस बूढ़े की असली जगह यही है—इसी गंदे कीचड़ में, जहां उसे पड़े रहना चाहिए।
साहब बदहवास होकर कीचड़ को झाड़ते हुए उल्टे कदमों से गाड़ी की तरफ भागे। साथी ने हड़बड़ाहट में दरवाजा खोला। साहब गुस्से में गाड़ी में बैठे, जोर से दरवाजा पटका और गाड़ी तेज रफ्तार में कीचड़ उड़ाती हुई वापस शहर की तरफ मुड़ गई।
सन्नाटा छा गया। सिर्फ बारिश की गिरती बूंदों की छप-छप आवाज बची थी।
केशव काफी देर तक उसी दलदल में निढाल पड़ा रहा। सीने में जूते की नोक का दर्द टीस मार रहा था, सांस उखड़ रही थी और मुंह में गंदा पानी भर चुका था। लेकिन केशव को इस बात की कोई तकलीफ नहीं थी कि वह कीचड़ में पड़ा है, न ही उस अपमान और लात का कोई मलाल था। जिंदगी ने तो उसे पहले ही बहुत बार रौंदा था। यह स्थिति उस गहरे आत्मलोचन (आत्ममंथन) की तरह थी जहाँ इंसान को अपनी ही नियति बेमानी लगने लगती है।
उसकी पथराई आंखें आसमान से गिरती बारिश को देख रही थीं और मन में बस एक ही ख्याल उसे अंदर तक चीर रहा था—वह अब गांव जाकर अपनी उस बुढ़िया से क्या कहेगा? जो इस तेज बारिश में, ठंड से थर-थर कांपती हुई, गांव के चौराहे वाले बरगद के नीचे सिर्फ इस उम्मीद में टकटकी लगाए बैठी है कि आज उसका केशव किसी साहब से मिलने गया है... और आज उनके सिर पर दोबारा अपनी छत लौट आएगी।
।।समाप्त।।
निष्कर्ष: क्या हमारे समाज की संवेदनाएं मर चुकी हैं?
'साहब के जूते' महज़ एक कहानी नहीं है। यह भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की उस सड़ांध का प्रमाण है, जिसे कोई भी महँगा जूता या रुतबा नहीं छिपा सकता। केशव की टूटी हुई उम्मीदें और साहब का वह हिंसक अहंकार यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि विकास के इन बड़े-बड़े दावों के बीच, इंसानियत कहाँ दफ्न हो गई?
- क्या आपने भी कभी सिस्टम की ऐसी क्रूरता देखी है?
- क्या एक गरीब को इंसाफ पाने के लिए हमेशा अपने स्वाभिमान की बलि देनी पड़ेगी?
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
यह कहानी मुख्य रूप से नौकरशाही के अहंकार, ग्रामीण भारत की गरीबी, और सिस्टम की संवेदनहीनता को दर्शाती है। यह दिखाती है कि कैसे भ्रष्ट तंत्र में एक लाचार गरीब की जान से ज्यादा अहमियत एक अधिकारी के महंगे जूतों की होती है।
'साहब के जूते' कहानी के लेखक युवा रचनाकार जुनेद अख्तर हैं, जो कुशीनगर, उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं।
केशव के जवान बेटे की मृत्यु के बाद, उसके सगे भाई ने छल से अनपढ़ केशव का अंगूठा कागजों पर लगवा लिया और उसकी सारी जमीन अपने नाम कर ली। घर से निकाले जाने के बाद, केशव अपनी पत्नी के लिए एक छत की गुहार लेकर तहसील में भटक रहा था।