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प्रकृति पर 6 हिंदी कविताएँ: वर्षा, बसंत और हरियाली का सौंदर्य | Hindi Poems On Nature

भीष्म प्रतिज्ञा: महाभारत की वीर रस कविता | Bhishma Pratigya - Dr. Praveen Shukla

भीष्म पितामह (Bhishma Pitamah) का एक शक्तिशाली चित्रण, जो 'महाभारत पर हिंदी कविता' और उनकी प्रतिज्ञा का मुख्य विषय हैं।
चित्र: पितामह भीष्म - कुरुक्षेत्र के सर्वोच्च योद्धा
🔥 भीष्म प्रतिज्ञा का सार:
यह प्रसंग महाभारत में वह क्षण है जहाँ भक्त की प्रतिज्ञा निभाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण स्वयं अपना वचन तोड़ देते हैं। यह ‘धर्म बनाम संकल्प’ नहीं, बल्कि ‘भक्ति की विजय’ का आख्यान है।

महाभारत पर हिंदी कविता (Mahabharat Hindi Poem): कुरुक्षेत्र का युद्ध केवल शस्त्रों का टकराव नहीं था, बल्कि वह वचनों और प्रतिज्ञाओं का महासंग्राम था। एक ओर पितामह भीष्म की भीषण प्रतिज्ञा थी, तो दूसरी ओर योगेश्वर कृष्ण का संकल्प।

आज साहित्यशाला पर प्रस्तुत है डॉ. प्रवीण शुक्ल की वह ओजस्वी रचना, जो उस ऐतिहासिक क्षण का वर्णन करती है जब भक्त (भीष्म) की लाज रखने के लिए भगवान (कृष्ण) को अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर रथ का पहिया उठाना पड़ा। यह कविता वीर रस (Veer Ras) का अद्भुत उदाहरण है।

📜 कविता: भीष्म प्रतिज्ञा (Bhishma Pratigya)
✍️ रचयिता: डॉ. प्रवीण शुक्ल
🏹 संदर्भ: जब कृष्ण ने भीष्म के वध के लिए रथ का पहिया उठाया।

भीष्म और कृष्ण: महाभारत का सबसे महान प्रतिज्ञा-संघर्ष

|| महाभारत कविता : भीष्म प्रतिज्ञा ||

इस गद्दी के चक्कर ने भारत की हालत गारत की,
और इसी चक्कर में दुर्गति होती भारत की ।
ऊंच नीच और भेदभाव भी इसी कथा के हिस्से हैं ,
वैरभाव सहयोग त्याग के इसमें अनगिन किस्से है ||

इन किस्सों के कारण ही तो कुरुक्षेत्र में युद्ध हुआ,
पूरा भारत महायुद्ध से पल भर में आबद्ध हुआ ।
दोनों पक्षों की रक्षा को तत्पर सभी परिचित थे,
और परिचित गण भी तो रखते अपने अपने हित थे ||

Mahabharat War Dhritrashtra and Gandhari
धृतराष्ट्र का पुत्र मोह: महाभारत युद्ध का मूल कारण

श्रीकृष्ण ने महा समर में काम किए थे मिले जुले,
दुर्योधन को सेना दे दी और अर्जुन को स्वयं मिले ।
चतुरंगिणी सेना को पाकर दुर्योधन मन में खुश था,
पर अर्जुन के मन में भी तो कहीं नहीं किंचित दुख था ||

जिस प्रकार श्री कृष्ण पर लिखी कविताओं में उनकी लीला का वर्णन मिलता है, वैसा ही अद्भुत दृश्य यहाँ भी है:

कहां कृष्ण ने महासमर में ना अस्त्रों को धरूँगा,
मात्र सारथी बनकर अर्जुन को रणक्षेत्र उतारूंगा ।
अर्जुन को नादान समझ दुर्योधन मन में फूल गया,
माधव की मायावी माया को बिल्कुल ही भूल गया ||

(संदर्भ: पढ़ें कृष्ण की चेतावनी - रश्मिरथी तृतीय सर्ग का पूरा वर्णन)


पितामह का संकल्प

पितामह ने भी कृष्णा की प्रतिज्ञा के वचन सुने,
वचनों को सुन मन ही मन जाने क्या क्या भाव बुने ।
वह पितामह जो तन मन से कौरव सेना को अर्पित थे,
वह पितामह जो राजा की गद्दी को सदा समर्पित थे ।
वह पितामह जो दुर्योधन की सेना के सेनापति थे,
वह पितामह जिनके सब शब्द स्वयं काल की गति थे ||

वह पितामह जिनके अस्त्रो-शस्त्रों पर लक्ष्य सुअङ्कित थे ,
वह पितामह जिनकी शक्ति से सभी देवता शंकित थे ।
वह पितामह जिनके शस्त्रों से अंबर तक फट जाता था ,
वह पितामह जिनकी इच्छा से गंगाजल हट जाता था ||

Bhishma Pitamah starting the war in Kurukshetra
कुरुक्षेत्र में भीष्म पितामह का रौद्र रूप

जब सुने उन्होंने वचन कृष्ण के मन ही मन मुस्काए,
यह सोच चलो मौका आया माधव को झुठलाया जाए |
पितामह के यह विचार सुन सहमी सहमी प्रज्ञा थी,
एक और कृष्ण प्रतिज्ञा दूजी और भीष्म प्रतिज्ञा थी ||

दादा की प्रतिज्ञा को सुन अर्जुन मन ही मन विचलित था,
क्योंकि उनकी सभी शक्तियों से वह पूरा परिचित था ।
वह जान चुका था पितामह ने जैसे जो भी ठान लिया,
क्रूर काल ने भी उनकी इच्छा को वैसे मान लिया ||

विचलित अर्जुन के मस्तक पर उभर उठी चिंता रेखा,
श्रीकृष्ण ने व्याकुल-आकुल अर्जुन के मुख को देखा ।
बोल उठे हे पार्थ युद्ध से आज अगर डर जाओगे,
तो संभव है कि जीने से पहले ही तुम मर जाओगे ||

जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब हमें प्रेरणादायक हिंदी कविताओं की भाँति साहस की आवश्यकता होती है:

जीने मरने को लेकर यो चिंता और सिहरना क्या ?
जब तक तेरे रथ पर मैं हूं तुझको जग से डरना क्या ?
माधव की बातों से अर्जुन में शक्ति संचार हुआ,
कांधे पर गांडीव सजा वह लड़ने को तैयार हुआ ||

रणभूमि में तांडव

चढ़ा धनुष पर बाण उन्होंने खींचा जब प्रत्यंचा को,
बिजली कड़की सैनिक बोले डरकर के भागो-भागो |
शस्त्रों की वर्षा से अंबर आतुरता फट जाने को,
रत्नाकर मैं उठी हिलेरी नील गगन छू जाने को ||

तलवारों के टकराने से ध्वनि गूंजती थी टन-टन ।
बाढ़ हवा के सीने पर दस्तक देते थे सनन-सनन।
सनन-सनन से और भयानक हो उठती थी मंद पवन ।
कवच और कुंडल वीरों के बज उठते खनन-खनन।

Mahabharat Ran Chandi: Destruction of War
युद्ध की विभीषिका: जब रणभूमि श्मशान बनने लगी

चीखें गूंज उठी धरती पर चीख-चीख में क्रंदन था,
लगता था उस रोज़ धरा पर मृत्यु का अभिनंदन था।
महासमर में महारथी गण जब-जब कटकट गिरते थे,
ऐसा लगता था प्रलयंकर वहां तांडव करते थे ।

(तुलना: यह दृश्य कर्ण और परशुराम के संवाद की याद दिलाता है, पढ़ें: रश्मिरथी सर्ग 2 - कर्ण और परशुराम का संवाद)

बर्बादी को देख पार्थ ने जब गांडीव उठाया तो,
उसके द्वारा उसने अपना पहला बाण चलाया तो ।
पितामह के बाणों से टकरा कर के वह टूट गया,
अगले ही क्षण गांडीव मुष्टिका से अर्जुन की छूट गया ||

जब कृष्ण ने उठाया रथ का पहिया

पितामह को यू मनमानी ना करने दूंगा,
चाहे जो भी हो अर्जुन को ऐसे ना मरने दूंगा |
यह कहकर माधव ने रथ के पहिए को उठा लिया,
उसे सुदर्शन चक्र बनाकर पितामह की ओर किया ||

Lord Krishna attacking Bhishma with Chariot Wheel - Mahabharat Scene
ऐतिहासिक क्षण: जब कृष्ण ने तोड़ी अपनी प्रतिज्ञा

माधव की यह मुद्रा मानो महाकाल से मिलती थी,
उनकी इस मुद्रा से जैसे पूरी पृथ्वी हिलती थी ।
माधव को देखा धनुष रखा और दादा मन में फूल गए,
हाथ जोड़कर बोले माधव क्या प्रतिज्ञा भूल गए ?

पूरी सेना बोल उठी, बोलो हो करके निर्भय,
एक बार सब मिलकर बोलो, बोलो पितामह की जय ||

जिस परमपिता परमेश्वर की शक्ति का कोई अंत नहीं,
जिनके आगे प्रश्न कभी भी कोई राह ज्वलंत नहीं ।
उस परमपिता परमेश्वर को पितामह ने कैसे डरा दिया ?
यह बात असंभव है पर भक्ति ने भगवान को हरा दिया ||

कृष्ण चक्र लिए इसीलिए करने उन पर प्रहार गए,
करने भीष्म प्रतिज्ञा पूरी जान-बूझकर हार गए ||


भीष्म प्रतिज्ञा: एक बहुआयामी विश्लेषण (In-Depth Analysis)

डॉ. प्रवीण शुक्ल की यह कविता केवल एक युद्ध का वर्णन नहीं है, बल्कि यह भारतीय दर्शन, मनोविज्ञान और भक्ति परंपरा का एक उत्कृष्ट दस्तावेज है। आइए इस घटना को विभिन्न दृष्टिकोणों से समझें।

1. पौराणिक परिप्रेक्ष्य: दो प्रतिज्ञाओं का महासंग्राम

महाभारत के युद्ध में यह क्षण अद्वितीय था। एक तरफ 'योगेश्वर कृष्ण' थे जिन्होंने शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की थी, और दूसरी तरफ 'गंगापुत्र भीष्म' थे जिन्होंने कृष्ण को शस्त्र उठाने पर विवश करने की प्रतिज्ञा कर ली थी। यह युद्ध केवल योद्धाओं का नहीं, बल्कि 'भक्त और भगवान' का हो गया था।

भीष्म का कथन था: "आज जो हरिहि न शस्त्र गहाऊं, तौ लाजो गंगा जननी को शांतनु सुत न कहाऊं।"

यह वही दृढ़ता है जो हमें विद्यापति की पदावली और अर्थ-सौंदर्य में नायिका की निष्ठा में दिखाई देती है, जहाँ प्रेम और संकल्प की पराकाष्ठा होती है। यहाँ भीष्म का प्रेम 'वात्सल्य' और 'वीर' रस के अनूठे मिश्रण के रूप में प्रकट हुआ है।

2. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: भीष्म का अंतद्वंद्व

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें, तो भीष्म कर्तव्य और धर्म के बीच फँसे हुए थे। वे जानते थे कि वे अधर्म के पक्ष में हैं, किन्तु उनका शरीर हस्तिनापुर के सिंहासन से बंधा था। जब अर्जुन उनके बाणों से घायल होकर शिथिल पड़ने लगे, तो कृष्ण का क्रोधित होना स्वाभाविक था।

यह स्थिति हिंदी साहित्य में व्यंग्य की उस विधा से बिल्कुल विपरीत है जहाँ विसंगतियों पर प्रहार किया जाता है। यहाँ कोई व्यंग्य नहीं, बल्कि एक गहरी 'त्रासदी' है—एक महामानव अपनी ही प्रतिज्ञाओं के बोझ तले दबकर अपने ही प्रियजनों पर प्रहार कर रहा है।

3. भावनात्मक दृष्टिकोण: भक्ति की विजय

इस प्रसंग का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि भगवान हारकर भी जीत गए। कृष्ण जानते थे कि यदि वे शस्त्र नहीं उठाएंगे, तो भीष्म की प्रतिज्ञा झूठी हो जाएगी। और भगवान अपने भक्त को झूठा नहीं होने दे सकते। जैसे जगदंबा घर में दियरा बारू गीत में भक्त का समर्पण देवी को विवश कर देता है, वैसे ही भीष्म के बाणों ने त्रिभुवनपति को विवश कर दिया।

कृष्ण का रथ का पहिया उठाना यह सिद्ध करता है कि प्रेम और भक्ति के नियमों के आगे ब्रह्मांड के नियम भी गौण हैं। यह उसी तरह की करुणा है जो हनुमान बाहुक में तुलसीदास जी के कष्ट निवारण के लिए हनुमान जी की भक्ति में देखी जाती है।

4. वैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टिकोण: काल की गति

भीष्म को 'इच्छामृत्यु' का वरदान प्राप्त था, अर्थात वे 'काल' पर नियंत्रण रखते थे। कविता की पंक्ति "वह पितामह जिनके सब शब्द स्वयं काल की गति थे" इसी ओर संकेत करती है। दार्शनिक नजरिए से देखें तो यह ब्रह्मांडीय अव्यवस्था का चरम था—जहाँ शांति पूरी तरह युद्ध के कोलाहल में बदल रही थी।

जैसे मिथिला की प्राचीन संस्कृति में समय और परंपरा का अटूट बंधन है, वैसे ही भीष्म प्राचीन मूल्यों के प्रतीक थे, जिन्हें नए युग के निर्माण के लिए मिटना आवश्यक था।

निष्कर्ष:
डॉ. प्रवीण शुक्ल की यह कविता हमें सिखाती है कि जीवन में कई बार हमें अपनी 'वैयक्तिक निष्ठा' और 'सार्वभौमिक धर्म' के बीच चुनाव करना पड़ता है। कृष्ण ने अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर धर्म को चुना, जो हमें नेतृत्व का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाता है।


संदर्भ

यह कविता उस समय का वर्णन है जब कुरुक्षेत्र युद्ध के तीसरे दिन भीष्म पितामह ने पांडव सेना में हाहाकार मचा दिया था। अर्जुन अपने पितामह पर बाण चलाने में संकोच कर रहे थे। यह देखकर श्रीकृष्ण अपना धैर्य खो बैठे और रथ का पहिया लेकर भीष्म को मारने दौड़े।

Watch Video: Dr. Praveen Shukla Recitation

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