सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

New !!

सदाबहार दिवाली कविताएँ: 7 Heart-Touching Diwali Poems in Hindi (भावार्थ सहित) That Will Make You Emotional!

स्वतंत्रता दिवस की पुकार - Atal Bihari Vajpayee Ji | Deshbhakti Hindi Kavita

स्वतंत्रता दिवस की पुकार

अटल बिहारी वाजपेयी जी की हिंदी कविता

अटल बिहारी वाजपेयी जी की देशभक्ति कविता

पन्द्रह अगस्त का दिन कहता – आज़ादी अभी अधूरी है।
सपने सच होने बाक़ी हैं, राखी की शपथ न पूरी है॥

जिनकी लाशों पर पग धरकर आज़ादी भारत में आई।
वे अब तक हैं खानाबदोश ग़म की काली बदली छाई॥

स्वतंत्रता दिवस की पुकार

कलकत्ते के फुटपाथों पर जो आंधी-पानी सहते हैं।
उनसे पूछो, पन्द्रह अगस्त के बारे में क्या कहते हैं॥

हिन्दू के नाते उनका दुख सुनते यदि तुम्हें लाज आती।
तो सीमा के उस पार चलो सभ्यता जहाँ कुचली जाती॥

स्वतंत्रता दिवस की पुकार

इंसान जहाँ बेचा जाता, ईमान ख़रीदा जाता है।
इस्लाम सिसकियाँ भरता है,डालर मन में मुस्काता है॥

भूखों को गोली, नंगों को हथियार पहनाये जाते हैं।
सूखे कण्ठों से जेहादी नारे लगवाए जाते हैं॥

स्वतंत्रता दिवस की पुकार

लाहौर, कराची, ढाका पर मातम की है काली छाया।
पख़्तूनों पर, गिलगित पर है ग़मगीन ग़ुलामी का साया॥

बस इसीलिए तो कहता हूँ आज़ादी अभी अधूरी है।
कैसे उल्लास मनाऊँ मैं?

थोड़े दिन की मजबूरी है॥

स्वतंत्रता दिवस की पुकार

दिन दूर नहीं खंडित भारत को पुनः अखंड बनाएँगे।
गिलगित से गारो पर्वत तक आजादी पर्व मनाएँगे॥

उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से कमर कसें बलिदान करें।
जो पाया उसमें खो न जाएँ, जो खोया उसका ध्यान करें॥

 -

अटल बिहारी वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी जी की हिंदी कविता

अटल बिहारी वाजपेयी जी की देशभक्ति कविता

Famous Poems

Chalre Chalre Waal Lyrics Meaning & Deep Analysis | चल रे चल रे बाल लिरिक्स : Shafaullah Khan Rokhri

Home » Music » Chalre Chalre Waal Lyrics Meaning Shafaullah Khan Rokhri के अमर गीत 'Chalre Chalre Waal' का गहरा अर्थ और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण क्या आपने कभी सोचा है कि एक काली शॉल और लाल रुमाल किसी को इस कदर दीवाना कैसे बना सकता है? संगीत की दुनिया में कुछ धुनें ऐसी होती हैं जो सिर्फ कानों को नहीं, सीधे रूह को छूती हैं । शफ़ाउल्लाह ख़ान रोखड़ी (Shafaullah Khan Rokhri) का बहुचर्चित सरायकी/पंजाबी लोकगीत 'चलरे चलरे वाल' एक ऐसा ही जादुई तराना है। यह गीत सिर्फ शब्दों का जाल नहीं है; यह एक आशिक के दिल की पुकार है । एक ऐसा प्रेमी जो अपने महबूब की ठेठ सादगी और उसकी कातिलाना अदाओं पर अपनी पूरी दुनिया लुटाने को तैयार है। शफ़ाउल्लाह ख़ान रोखड़ी का अमर ग...

कट जाओगे मिट जाओगे हो जाएगा अंत (Kat Jaoge Mit Jaoge): Viral Lyrics & Meaning

कट जाओगे मिट जाओगे हो जाएगा अंत: वायरल गीत का खौफनाक सच और सटीक विश्लेषण भारतीय राजनीतिक संगीत के इतिहास में शायद ही किसी गाने ने इंटरनेट पर इतनी तेज़ी से आग लगाई हो जितनी "कट जाओगे मिट जाओगे हो जाएगा अंत" ने लगाई है। प्रेम (Prem) की रोंगटे खड़े कर देने वाली आवाज़ और रुद्र (Rudra) की बेबाक कलम ने एक ऐसा राजनीतिक गान (Political Anthem) तैयार किया है, जो सोशल मीडिया के हर कोने में गूंज रहा है। क्या यह महज़ एक देशभक्ति गीत है, या इसके पीछे कोई गहरा राजनीतिक ध्रुवीकरण छिपा है? साहित्यशाला (Sahityashala) के इस एक्सक्लूसिव लेख में, हम इस वायरल ट्रैक के संपूर्ण बोल (Full Lyrics), इसके प्रत्येक छंद का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण (Psychological Trigger Formatting) और इसके सामाजिक-राजनीतिक एजेंडे का एक निष्पक्ष और गहन आलोचनात्मक विश्लेषण करेंगे। ▶ वीडियो देखें 📱 WhatsApp पर शेयर करें प्रेम और रुद्र द्वारा रचित इस लोकप्रिय गीत की आधिकारिक कलाकृति। गीत के संपूर्ण बोल और मनोवैज्ञानिक संरचना ...

सुना था कि बेहद सुनहरी है दिल्ली (Lyrics & Meaning) - Imran Pratapgarhi

सुना था कि बेहद सुनहरी है दिल्ली (Lyrics & Meaning) - Imran Pratapgarhi "Suna Tha Ki Behad Sunheri Hai Dilli" – यह सिर्फ एक कविता की पंक्ति नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों पर किया गया एक बेहद तीखा और मार्मिक राजनीतिक व्यंग्य है। इमरान प्रतापगढ़ी की यह रचना एक माँ की तड़प को आवाज़ देती है, जो चकाचौंध से भरी 'सुनहरी' दिल्ली में अपने लापता लाल (बेटे) और इंसाफ के लिए दर-दर भटक रही है। साहित्यशाला के इस लेख में हम केवल इस मशहूर कविता के पूरे बोल (Lyrics) ही नहीं पढ़ेंगे, बल्कि इसके पीछे छिपे उस गहरे प्रतीकात्मक अर्थ (Metaphorical Meaning) का भी विश्लेषण करेंगे, जिसने भारतीय राजनीति और समाज को झकझोर कर रख दिया था। प्रतीकात्मक चित्र: "सुनहरी" दिल्ली की खामोशी और एक बेबस माँ की गुहार। (Suna Tha Ki Behad Sunheri Hai Dilli - Visual Meaning) कविता की पृष्ठभूमि और राजनीतिक संदर्भ (Context) साहित्य हमेशा समाज का दर्पण होता है। जब भी सत्ता अपनी ज़िम्मेदारियों से मुँह मोड़ती है, तब फैज़ अहमद फैज़ की ...

राजधानी कॉलेज (NCWEB) में भव्य 'मंगलदीपोत्सव': DU में जीवंत हुई रामकथा और लोकसंस्कृति, देखें खास झलकियाँ!

Home » Delhi University & NCWEB » राजधानी कॉलेज (NCWEB) मंगलदीपोत्सव रिपोर्ट Campus Exclusive ✍️ कार्तिकेय दिवाकर (प्रधान संपादक, देखता इंडिया ) राजधानी कॉलेज (NCWEB) में धूमधाम से मना 'मंगलदीपोत्सव': नृत्य और लोकसंस्कृति के रंगों में कैसे जीवंत हुई रामकथा? क्या आपने कभी सोचा है कि पूरे सप्ताह अपने परिवार, करियर और जिम्मेदारियों को संभालने वाली छात्राएं जब सप्ताहांत (Weekend) में कॉलेज के मंच पर उतरती हैं, तो ऊर्जा का कैसा विस्फोट होता है? दिल्ली विश्वविद्यालय (Delhi University) का परिसर केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय सांस्कृतिक चेतना का जीवंत केंद्र भी है। प्रकाश पर्व दीपावली के आसपास जहां साहित्य प्रेमी दीपावली की सदाबहार हिंदी कविताओं के जरिए उत्सव की आभा महसूस करते हैं, वहीं डीयू के परिसर में छात्राओं ने इसे मंच पर साकार कर दिखाया है। इसी कड़ी में दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉन-कॉलिजिएट वूमेंस एजुकेशन बोर्ड (NCWEB) के अंतर्गत राजधानी कॉलेज शिक्षण केंद्र द्वारा कॉलेज के स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स...

Baba Jani Poem Lyrics: पिता-पुत्र की इस रुला देने वाली कविता ने लाखों दिलों को छुआ!

साहित्य का मूल उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के उन पृष्ठों को खोलना है जिन पर अक्सर धूल जम जाती है। "बाबा जानी" (Baba Jani) आधुनिक दौर की एक ऐसी ही मार्मिक रचना है, जो पीढ़ियों के बीच पनपते संवादहीनता (Generational Gap) और वृद्धावस्था के मनोवैज्ञानिक पहलुओं को बड़ी सूक्ष्मता से उकेरती है। जिस तरह सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की 'सरोज स्मृति' ने एक पिता के असीम वात्सल्य और शोक को अमर कर दिया, ठीक उसी तरह यह कविता एक वृद्ध, असहाय पिता और उसके अधीर, युवा बेटे के बीच के उस जटिल संवाद को प्रस्तुत करती है, जो आज के समाज का एक कड़वा यथार्थ बन चुका है। हिंदी साहित्य में जहाँ एक ओर धूमिल की 'किस्सा जनतन्त्र' जैसे रचनाओं में व्यवस्था और रोज़गार का संघर्ष झलकता है, और दिनकर की 'व्याल विजय' में सत्ता का वैचारिक द्वंद्व दिखाई देता है; वहीं, 'बाबा जानी' घर की चारदीवारी के भीतर चलने वाले उस मौन संघर्ष को स्वर देती है जहाँ मनुष्य की शारीरिक लाचारी उसके आत्मसम्मान से टकराती है...