15+ Best Poem on Nature in Hindi | प्रकृति पर कविताएँ
आधुनिकता की अंधी दौड़ में मनुष्य कहीं न कहीं अपनी जड़ों और प्रकृति को भूलता जा रहा है। Poem on Nature in Hindi (प्रकृति पर कविताएँ) हमें उसी सुकून भरी छाँव, बहती नदियों और चहकते पक्षियों की याद दिलाती हैं। प्रकृति हमें जीवन जीने की कला सिखाती है, और जब हमारा उससे संबंध टूटता है, तो जीवन में तनाव और अशांति घर कर लेती है।
इस पोस्ट में हम आपके लिए लाये हैं 15+ बेहद सुन्दर प्रकृति कविताएँ (Prakriti Par Kavita)। यह संग्रह कक्षा 1 से 12 तक के विद्यार्थियों, पर्यावरण दिवस (Environment Day) के भाषणों, और प्रकृति प्रेमियों के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
1. काली घटा (Kaali Ghata Nature Poem)
काली घटा छाई है
लेकर साथ अपने यह
ढेर सारी खुशियां लायी है
ठंडी ठंडी सी हवा यह
बहती कहती चली आ रही है
कोई आज बरसों बाद खुश हुआ
तो कोई आज खुसी से पकवान बना रहा
बच्चों की टोली यह
कभी छत तो कभी गलियों में
किलकारियां सीटी लगा रहे
अंकुर जो भूमि में सोये हुए थे
महसूस इस वातावरण को
वो भी अब फूटने लगे
देख बगीचे का माली यह
खुसी से झूम रहा
और कहता काली घटा छाई है!
2. प्रकृति सौंदर्य (Easy Poem on Nature)
हरी हरी खेतों में बरस रही है बूंदे,
खुशी खुशी से आया है सावन,
भर गया खुशियों से मेरा आंगन।
ऐसा लग रहा है जैसे मन की कलियां खिल गई,
ऐसा आया है बसंत,
लेकर फूलों की महक का जशन।
यह संसार है कितना सुंदर,
लेकिन लोग नहीं हैं उतने अकलमंद,
यही है एक निवेदन,
मत करो प्रकृति का शोषण।
3. काँप उठी…..धरती माता की कोख
कलयुग में अपराध का
बढ़ा अब इतना प्रकोप
आज फिर से काँप उठी
देखो धरती माता की कोख!!
समय समय पर प्रकृति
देती रही कोई न कोई चोट
लालच में इतना अँधा हुआ
मानव को नही रहा कोई खौफ!!
वन सम्पदा, नदी पहाड़, झरने
इनको मिटा रहा इंसान हर रोज!!
सबको अपनी चाह लगी है
नहीं रहा प्रकृति का अब शौक
4. मान लेना वसंत आ गया
बागो में जब बहार आने लगे
कोयल अपना गीत सुनाने लगे
कलियों में निखार छाने लगे
भँवरे जब उन पर मंडराने लगे
मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया!!
खेतो में फसल पकने लगे
खेत खलिहान लहलाने लगे
डाली पे फूल मुस्काने लगे
चारो और खुशबु फैलाने लगे
मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया!!
5. कहो, तुम रूपसि कौन
कहो, तुम रूपसि कौन?
व्योम से उतर रही चुपचाप
छिपी निज छाया-छबि में आप,
सुनहला फैला केश-कलाप,
मधुर, मंथर, मृदु, मौन!
अनिल पुलकित स्वर्णांचल लोल,
मधुर नूपुर-ध्वनि खग-कुल-रोल,
सीप-से जलदों के पर खोल,
उड़ रही नभ में मौन!
6. बसंत का मौसम
है महका हुआ गुलाब
खिला हुआ कंवल है,
हर दिल मे है उमंगे
हर लब पे ग़ज़ल है,
ठंडी-शीतल बहे ब्यार
मौसम गया बदल है,
प्रकृति भी हर्षित हुआ जो
हुआ बसंत का आगमन है,
चूजों ने भरी उड़ान जो
गये पर नये निकल है,
7. प्रकृति और आभूषण (Short Hindi Poem on Nature)
वन, नदियां, पर्वत व सागर,
अंग और गरिमा धरती की,
इनको हो नुकसान तो समझो,
क्षति हो रही है धरती की।
हमसे पहले जीव जंतु सब,
आए पेड़ ही धरती पर,
सुंदरता संग हवा साथ में,
लाए पेड़ ही धरती पर।
पेड़ -प्रजाति, वन-वनस्पति,
अभयारण्य धरती पर,
यह धरती के आभूषण है,
रहे हमेशा धरती पर।
8. प्रकृति कुछ पाठ पढ़ाती है
प्रकृति कुछ पाठ पढ़ाती है,
मार्ग वह हमें दिखाती है।
नदी कहती है’ बहो, बहो
जहाँ हो, पड़े न वहाँ रहो।
जहाँ गंतव्य, वहाँ जाओ,
पूर्णता जीवन की पाओ।
वृक्ष कहते हैं खूब फलो,
दान के पथ पर सदा चलो।
सभी को दो शीतल छाया,
पुण्य है सदा काम आया।
9. तेरी याद सा मोसम
हवाओं के रुख से लगता है कि रुखसत हो जाएगी बरसात
बेदर्द समां बदलेगा और आँखों से थम जाएगी बरसात।
अब जब थम गयी हैं बरसात तो किसान तरसा पानी को
बो वैठा हैं इसी आस मे कि अब कब आएगी बरसात।
नहा धो कर चमक जाती हर चोटी धौलाधार की
जब पश्चिम से बादल गरजते चमकते बनते बरसात।
10. कुदरत
हे ईस्वर तेरी बनाई यह धरती, कितनी ही सुन्दर
नए – नए और तरह – तरह के
एक नही कितने ही अनेक रंग!
कोई गुलाबी कहता,
तो कोई बैंगनी, तो कोई लाल
तपती गर्मी मैं
हे ईस्वर, तुम्हारा चन्दन जैसे वृक्ष
सीतल हवा बहाते
तेरे चौपाये किसान के साथी बनते
हे ईस्वर तुम्हारी यह धरा बड़ी ही मीठी!
11. प्रकृति
सुन्दर रूप इस धरा का,
आँचल जिसका नीला आकाश,
पर्वत जिसका ऊँचा मस्तक,
उस पर चाँद सूरज की बिंदियों का ताज
नदियों-झरनो से छलकता यौवन
सतरंगी पुष्प-लताओं ने किया श्रृंगार
खेत-खलिहानों में लहलाती फसले
बिखराती मंद-मंद मुस्कान
12. बसंत मनमाना
धूल पड़ गई है पत्तों पर डालों लटकी किरणें
छोटे-छोटे पौधों को चर रहे बाग में हिरणें,
पर्वत की घाटी के पीछे लुका-छिपी का खेल
खेल रही है वायु शीश पर सारी दनिया झेल।
फैल गया है पर्वत-शिखरों तक बसन्त मनमाना,
पत्ती, कली, फूल, डालों में दीख रहा मस्ताना।
13. मौसम बसंत का (प्रकृति सौंदर्य)
लो आ गया फिर से हँसी मौसम बसंत का
शुरुआत है बस ये निष्ठुर जाड़े के अंत का
गर्मी तो अभी दूर है वर्षा ना आएगी
फूलों की महक हर दिशा में फ़ैल जाएगी
पेड़ों में नई पत्तियाँ इठला के फूटेंगी
प्रेम की खातिर सभी सीमाएं टूटेंगी
14. फूल
हमें तो जब भी कोई फूल नज़र आया है
उसके रूप की कशिश ने हमें लुभाया है
जो तारीफ़ ना करें कुदरती करिश्मों की
क्यों हमने फिर मानव का जन्म पाया है.
15. विधाता
कोन से साँचो में तूं है बनाता, बनाता है ऐसा तराश-तराश के,
कोई न बना सके तूं ऐसा बनाता, बनाता है उनमें जान डाल के!
सितारों से भरा बरह्माण्ड रचाया, ना जाने उसमे क्या -क्या है समाया,
ग्रहों को आकाश में सजाया, ना जाने कैसा अटल है घुमाया,
जो नित नियम गति से अपनी दिशा में चलते हैं,
अटूट प्रेम में घूम-घूम के, पल -पल आगे बढ़ते हैं!
16. गाँव मेरा
इस लहलाती हरियाली से, सजा है ग़ाँव मेरा…..
सोंधी सी खुशबू, बिखेरे हुऐ है ग़ाँव मेरा…!!
जहाँ सूरज भी रोज, नदियों में नहाता है………
आज भी यहाँ मुर्गा ही, बांग लगाकर जगाता है!!
खुद में समेटे प्रकृति को, सदा जीवन ग़ाँव मेरा….
इंद्रधनुषी रंगो से ओतप्रोत है, ग़ाँव मेरा..!!
नदियों की कल-कल धव्नि से, भरा हुआ है गाँव मेरा!!
17. प्रकृति संदेश
पर्वत कहता शीश उठाकर,
तुम भी ऊँचे बन जाओ।
सागर कहता है लहराकर,
मन में गहराई लाओ।
पृथ्वी कहती धैर्य न छोड़ो
कितना ही हो सिर पर भार,
नभ कहता है फैलो इतना
ढक लो तुम सारा संसार!