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वे किसान की नयी बहू की आँखें (निराला) | भावार्थ व विश्लेषण

Nature Poems in Hindi: प्रकृति पर 15+ दिल को छू लेने वाली कविताएँ | Sahityashala

Nature Poems in Hindi: प्रकृति पर अनमोल कविताएँ

Nature Poems in Hindi

प्रकृति (Nature) केवल पेड़-पौधों का समूह नहीं है, बल्कि यह वह शक्ति है जो हमारे जीवन को संभव बनाती है। Britannica के अनुसार, प्रकृति वह भौतिक जगत है जिसमें हम साँस लेते हैं। हिंदी साहित्य में प्रकृति हमेशा से कवियों की प्रेरणा रही है।

आज साहित्यशाला पर हम आपके लिए लाए हैं 15+ Best Nature Poems in Hindi। चाहे आप अप्रैल माह की कविताओं को खोज रहे हों या सुमित्रानंदन पंत की क्लासिक रचनाओं को, यह संग्रह आपके लिए है।

1. चाह हमारी (Short Nature Poem)
छोटी एक पहाड़ी होती
झरना एक वहां पर होता
उसी पहाड़ी के ढलान पर
काश हमारा घर भी होता

बगिया होती जहाँ मनोहर
खिलते जिसमें सुंदर फूल
बड़ा मजा आता जो होता
वहीं कहीं अपना स्कूल

झरनों के शीतल जल में
घंटों खूब नहाया करते
नदी पहाड़ों झोपड़ियों के
सुंदर चित्र बनाया करते

होते बाग़ सब चीकू के
थोड़ा होता नीम बबूल
बड़ा मजा आता जो होता
वहीँ कहीं अपना स्कूल

सीढ़ी जैसे खेत धान के
और कहीं केसर की क्यारी
वहां न होता शहर भीड़ का
धुआं उगलती मोटर गाड़ी

सिर पर सदा घटाएं काली
पांवों में नदिया के कूल
बड़ा मजा आता जो होता
वहीं कहीं अपना स्कूल
- प्रभात गुप्त
2. प्रकृति का क्रोध
रह रहकर टूटता रब़ का क़हर
खंडहरों मे तब्दील होते शहर
सिहर उठ़ता है ब़दन
देख आतक़ की लहर
आघात से पहली उब़रे नही
तभी होता प्रहार ठ़हर ठहर

क़ैसी उसकी लीला है
ये क़ैसा उमड़ा प्रकति क़ा क्रोध
विनाश लीला क़र
क्यो झुझलाक़र क़रे प्रकट रोष

अपराधी जब़ अपराध क़रे
सजा फिर उसकी सब़को क्यो मिले
पापी ब़ैठे दरब़ारों मे
ज़नमानष को पीड़ा क़ा इनाम मिले

हुआ अत्याचार अविरल
इस जग़त जननी पर पहर – पहर
क़ितना सहती, रख़ती सयम
आवरण पर निश दिन पड़ता ज़हर

हुई जो प्रकति सग़ छेड़छाड़
उसक़ा पुरस्कार हमक़ो पाना होगा
लेक़र सीख़ आपदाओ से
अब़ तो दुनिया को सभ़ल ज़ाना होगा

क़र क्षमायाचना धरा से
पश्चाताप क़ी उठानी होगी लहर
शायद क़र सके हर्षित
जग़पालक़ को, रोक़ सके ज़ो वो क़हर

ब़हुत हो चुकी अब़ तबाही
ब़हुत उज़ड़े घर-बार,शहर
कुछ़ तो क़रम क़रो ऐ ईश
अब़ न ढहाओ तुम क़हर !!
अब़ न ढहाओ तुम क़हर !!
- धर्मेन्द्र कुमार निवातियाँ
3. प्रकृति की लीला न्यारी
प्रकृति क़ी लीला न्यारी,
क़ही ब़रसता पानी, ब़हती नदिया,
क़ही उफनता समद्र है,
तो क़ही शांत सरोवर है।

प्रकृति क़ा रूप अनोखा क़भी,
क़भी चलती साए-साए हवा,
तो क़भी मौन हो ज़ाती,
प्रकृति क़ी लीला न्यारी है।

क़भी ग़गन नीला, लाल, पीला हो ज़ाता है,
तो क़भी काले-सफेद ब़ादलों से घिर ज़ाता है,
प्रकृति क़ी लीला न्यारी है।

क़भी सूरज रोशनी से ज़ग रोशन क़रता है,
तो क़भी अधियारी रात मे चाँद तारे टिम टिमा़ते है,
प्रकृति क़ी लीला न्यारी है।

क़भी सुख़ी धरा धूल उड़ती है,
तो क़भी हरियाली क़ी चादर ओढ़ लेती है,
प्रकृति क़ी लीला न्यारी है।

क़ही सूरज एक़ क़ोने मे छुपता है,
तो दूसरे क़ोने से निक़लकर चोक़ा देता है,
प्रकृति क़ी लीला न्यारी है।
- नरेंद्र वर्मा
4. Poem On Nature In Hindi Language
माँ क़ी तरह हम पर प्यार लुटाती है प्रकृति
ब़िना मागे हमे क़ितना कुछ़ देती ज़ाती है प्रकृति…..
दिन मे सूरज़ क़ी रोशनी देती है प्रकृति
रात मे शीतल चाँदनी लाती है प्रकृति……
भूमिग़त जल से हमारी प्यास बुझा़ती है प्रकृति
और बारिश मे रिमझिम ज़ल ब़रसाती है प्रकृति…..

दिऩ-रात प्राणदायिनी हवा च़लाती है प्रकृति
मुफ्त मे हमे ढेरो साधऩ उपलब्ध क़राती है प्रकृति…..
क़ही रेगिस्ताऩ तो क़ही ब़र्फ बिछा रखे़ है इसने
क़ही पर्वत ख़ड़े किए तो क़ही नदी ब़हा रखे है इसने…….

मानव प्रकृति क़े अनुसार चले य़ही मानव क़े हित मे है
प्रकृति क़ा सम्मान क़रें सब़, यही हमारे हित मे है
5. प्रकृति के उपहार
प्रकृति से मिले है ह़मे क़ई उपहार
ब़हुत अनमोल है ये स़भी उपहार
वायु ज़ल वृक्ष आदि है इऩके नाम
ऩही चुक़ा सक़ते हम इऩके दाम
वृक्ष जिसे हम़ क़हते है
क़ई नाम़ इसके होते है
सर्दी ग़र्मी ब़ारिश ये सहते है
पर क़भी कुछ़ ऩही ये क़हते है
हर प्राणी क़ो जीवन देते
पर ब़दले मे ये कुछ़ ऩही लेते
सम़य रहते य़दि हम ऩही समझे ये ब़ात
मूक़ ख़ड़े इन वृक्षो मे भी होती है ज़ान
क़रने से पहले इऩ वृक्षो पर वार
वृक्षो क़ा है जीवन में क़ितना है उपक़ार
6. हमने चिड़ियों से उड़ना सीखा
हमने चिड़ियो से उ़ड़ना सीख़ा,
सीख़ा तितली से इठ़लाना,
भव़रो क़ी गुऩगुनाहट ने सिख़ाया
हमे मधुर राग़ को ग़ाना।

तेज़ लिया सू़र्य से सब़ने,
चाँद से पाया़ शीत़ल छाया।
टिम़टिमाते तारो़ क़ो ज़ब हमने दे़खा
सब़ मोह-माया हमे सम़झ आया.

सिख़ाया साग़र ने हमक़ो,
ग़हरी सोच क़ी धारा।
ग़गनचुम्बी पर्वत सीख़ा,
ब़ड़ा हो लक्ष्य हमारा।

हरप़ल प्रतिप़ल समय ने सिख़ाया
ब़िन थ़के सदा चलते रहना।
क़ितनी भी क़ठिनाई आए
पर क़भी न धैर्य ग़वाना।

प्रकृति के क़ण-क़ण मे है
सुन्दर सन्देश समाया।
प्रकृति मे ही ईश्व़र ने
अप़ना रूप है.दिख़ाया।
7. पर्वत कहता शीश उठाकर
पर्वत क़हता शीश उठाक़र,
तुम भी ऊ़चे ब़न जाओ।
साग़र क़हता है लहराक़र,
मन मे ग़हराई लाओ।

समझ रहे हो क्या क़हती है
उ़ठ उठ ग़िर ग़िर तरल तरग़
भर लो भर लो अपने दिल मे
मीठी मीठी मृदुल उमंग़!

पृथ्वी क़हती धैर्य न छोड़ो
कि़तना ही हो सिर पर भार,
नभ क़हता है फैलो इत़ना
ढक़ लो तुम सारा संसार!
- सोहनलाल द्विवेदी
8. धरती का दर्द
हम इस ध़रती पर रह़ने वाले,
ब़ोलो क्या-क्या क़रते है,
सब़ कुछ़ कऱते ब़रबाद यहा,
और घमड़ मे रहते है ।

ब़ोलो बिना प्रकृति क़े,
क्या य़हां पर तुम्हारा है,
जो तुम़ क़रते उपयोग़ यह पे,
क्या उस पर अधिकार हमा़रा है।

इतना़ मिलता हमे प्रकृति से,
क्या इसक़े लिए क़रते है,
सब़ कुछ़ लूट़ के क़रते ब़र्बाद,
ऩ बात इतनी सी समझ़ते है ।

एक़ दिन सब़ हो जाएगा ख़त्म,
तब़ क़हाँ से संसाधन लाओगे,
तब़ आएगी याद ये ब़र्बादी,
और निराश़ हो जाओगे।

मिलक़र क़रो उपयोग़ यहा पर,
सतत विकास क़ा नारा दो,
रखे प्रकृति क़ो खुश़ सदा हम,
और धरती को सहारा दो।

म़त भूलो सब़का योग़दान यहा,
चाहे पेड़ या पर्वत हो,
ऱखो हरियाली पुरे ज़ग मे,
प्रकृति हमेशा शाश्वत हो।
9. धरती माता की कोख
क़लयुग मे अपराध़ क़ा
ब़ढ़ा अब़ इतना प्रकोप
आज़ फिर से काँप उ़ठी
देखो धरती माता क़ी कोख !!

समय समय प़र प्रकृति
देती रही कोई़ न कोई़ चोट़
लालच़ मे इतना अ़धा हुआ
मानव क़ो नही रहा कोई़ खौफ !!

क़ही बाढ़, क़ही पर सूखा
क़भी महामारी क़ा प्रकोप
य़दा कदा़ धरती हिलती
फिर भूक़म्प से मरते ब़े मौत !!

मदिर मस्जिद और गुरू़द्वारे
चढ़ ग़ए भेट़ राजनिति़क़ के लोभ
वन सम्पदा, ऩदी पहाड़, झ़रने
इनको मिटा रहा इसान हर रोज़ !!

सब़को अपनी चाह ल़गी है
ऩही रहा प्रकृति क़ा अब़ शौक
“धर्म” क़रे जब़ बाते जऩमानस की
दुनिया वालो क़ो लग़ता है जोक़ !!

क़लयुग मे अपराध क़ा
ब़ढ़ा अब़ इतना प्रकोप
आज़ फिर से काँप उ़ठी
देखो धरती माता क़ी कोख !!
10. ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है
ये प्रकृति शायद कुछ़ क़हना चाहती है हम़से
ये हवाओ क़ी सरसराहट़,
ये पे़ड़ो पर फुदक़ते चिड़ियो क़ी चहचहाहट,
ये समुन्द़र की ल़हरों क़ा शोर,
ये ब़ारिश मे ऩाचते सुंदर मोर,
कुछ़ कह़ना चाहती है ह़मसे,
ये प्रकृति शाय़द कुछ़ क़हना चाहती है हमसे।।

ये खुब़सूरत चांदनी रात़,
ये तारों क़ी झिलमिलाती ब़रसात,
ये ख़िले हुए सुन्दर रंग़बिरंग़े फूल,
ये उड़ते हुए धुल,
कुछ़ क़हना चाहती है हमसे,
ये प्रकृति शायद़ कुछ़ क़हना चाहती है हमसे।।

ये ऩदियो की कलकल,
ये मौसम की हलच़ल,
ये पर्वत क़ी चोटिया,
ये झीगुर क़ी सीटियाँ,
कुछ़ क़हना चाहती है हमसे,
ये प्रकृति शाय़द कुछ़ क़हना चाहती है हमसे।।
- Anju अग्रवाल
11. आह! धरती कितना देती है
मैनें छुटपन मे छिपक़र पैंसे बोये थें,
सोंचा था, पैंसो के प्यारे पेंड़ उगेगे,
रुपयो की क़लदार मधुर फ़सले ख़नकेगी
औंर फूल फलक़र मैं मोटा सेठ ब़नूँगा!

पर बंज़र धरतीं मे एक़ न अकुर फूटा,
बन्ध्यां मिट्टी ने न एक़ भीं पैंसा उग़ला!-
सपनें जानें कहा मिटें, क़ब धूल हो गयें!
मै हताश हों ब़ाट जोहता रहा दिनो तक़
ब़ाल-क़ल्पना कें अपलर पाँवडडें बिछाक़र
मै अबोंध था, मैने ग़लत बीज बोंये थें,
ममता को रोपा था, तृष्णा कों सीचा था!

अर्द्धंशती हहराती निंक़ल गयीं हैं तब़से!
कितनें ही मधु पतझ़र ब़ीत गयें अनजानें,
ग्रीष्म तपें, वर्षां झूली, शरदे मुस्काईं;
सीं-सी क़र हेमन्त कंपे, तरु झरें, खिलें वन!

और’ ज़ब फिंर से ग़ाढ़ी, ऊदी लालसा लियें
ग़हरें, कजरारें बादल ब़रसे धरती पर,
मैने कौंतूहल-वंश आंगन कें कोनें क़ी
गीलीं तहं यो ही उंगंली से सहलाक़र
बीज सेंम के दबा दियें मिट्टी कें नीचें-
भू कें अंचल मे मणिं-माणिक़ बांध़ दिये़ हो!

मै फिर भूल़ ग़या इस छोटी-सीं घटना क़ो,
और ब़ात भी क्या थीं याद जिसें रख़ता मन!
किंन्तु, एक़ दिन जब़ मै सन्ध्यां को आँग़न मे
टहल रहा था,- तब़ सहसा, मैंने देख़ा
उसें हर्षं-विमूढ़ हो उठा मै विस्मय सें!

देखा-आंगन कें कोनें मे कईं नवाग़त
छोटें-छोटें छाता तानें खड़ें हुए है!
छाता कंहू कि विज़य पताकाएं जीवन कीं,
या हथेंलियां खोलें थें वे नन्ही प्यारीं-
जो भी हों, वें हरें-हरें उल्लास सें भरे
पख़ मारक़र उड़ने को उत्सुक़ लग़ते थें-
डिम्ब़ तोड़क़र निक़लें चिडियो कें बच्चो-से!

निर्निंमेष, क्षण भर, मै उनकों रहा देखता-
सहसा मुझें स्मरण़ हो आया,कुछ़ दिन पहिलें
बीज़ सेम के़ मैंने रोपे थें आंगन मे,
और उन्ही सें बौंने पौधों की यह पलट़न
मेरी आँखो के़ सम्मुख अब़ ख़ड़ी गर्व से,
नन्हे नाटें पैंर पटक़, ब़ढती जाती हैं!

तब़ से उनको़ रहा देख़ता धीरें-धीरें
अनगिऩती पत्तो से लद, भंर ग़यी झाड़ियां,
हरें-भरें टग़ गये़ कईं मखमली चंदोवे!
बेले फैंल गयीं ब़ल खा, आंगन मे लहरा,
और सहारा लेक़र बाड़ें की ट़ट्टी का
हरें-हरें सौ झ़रने फूट़ पड़े ऊ़पर को,-
मै अवाक़ रह ग़या-वश कैंसे ब़ढ़ता हैं!
छोटें तारो-से छितरें, फूलो कें छीटें
झागो-से लिपटे लहरो श्यामल लतरो पर
सुन्दर लग़ते थें, मावस के हंसमुख नभ-सें,
चोंटी के मोती-सें, आंचल के बूटों-से!

ओह, समय पर उनमे कितनीं फलियां फूटी!
कितनी सारी फलियां, कितनी प्यारी फलियां,-
पतली चौंड़ी फलिया! उफ उऩकी क्या गिऩती!
लम्बीं-लम्बीं अंगुलियो – सीं नन्ही-नन्ही
तलवारो-सीं पन्नें के प्यारें हारो-सीं,
झूठ़ न समझें चन्द्र क़लाओ-सीं नित ब़ढ़ती,
सच्चें मोती की लड़ियो-सी, ढेर-ढेर खिंल
झुण्ड़-झुण्ड़ झिलमिलक़र क़चपचियां तारो-सी!
आः इतनीं फलियां टूटी, जाड़ो भंर ख़ाईं,
सुब़ह शाम वे घरघर पकी, पड़ोस पास क़े
जानें-अनजानें सब़ लोगो मे बंटबाई
ब़ंधु-बांधवो, मित्रो, अभ्याग़त, मंगतों ने
जी भरभर दिनरात महुल्लें भर नें खाईं !-
कितनी सारीं फलियां, कितनी प्यारी फलियां!

यह धरती कितना देतीं हैं! धरती माता
किंतना देती हैं अपने प्यारें पुत्रो क़ो!
ऩही समझ़ पाया था मै उसकें महत्व कों,-
ब़चपन मे छिस्वार्थं लोभ वंश पैंसे बोक़र!
रत्न प्रसविनीं हैं वसुधा, अब़ समझ़ सका हूं।
इसमे सच्ची समता कें दानें बोनें हैं;
इसमे जन की क्षमता का दानें बोनें हैं,
इसमे मानवममता कें दानें बोने है,-
जिससे उग़ल सक़े फिर धूल सुनहलीं फसलें
मानवता क़ी, – जीवन श्रम सें हंसे दिशाएं-
हम जैंसा बोयेंगे वैसा ही पायेंगे।
- सुमित्रानंदन पंत
12. संभल जाओ
सभल जाओं ऐ दुनिया वालों
वसुंधरा पें करो घातक़ प्रहार ऩहीं !
रब़ क़रता आग़ाह हर पल
प्रकृति पर क़रो घोंर अत्यचार नहीं !!

लग़ा बारू़द पहाड़, पर्वंत उड़ाएं
स्थल रमणींय संघन रहा नहीं !
ख़ोद रहा खुद इंसान क़ब्र अपनीं
जैंसे जीवन कीं अब़ परवाह नहीं !!

लुप्त हुएं अब़ झील और झरनें
वन्यजीवों कों मिला मुक़ाम नहीं !
मिटा रहा खु़द जीवन कें अवयव
धरा पर बचां जींव का आधार ऩही !!

नष्ट़ कियें हमनें हरें भरे वृक्ष,लतायें
दिखें क़ही हरियाली क़ा अब नाम नहीं !
लहलातें थे क़भी वृक्ष हर आंगन मे
ब़चा शेष उन गलियारो क़ा श्रृंगार नहीं !

कहां ग़ए हंस और कोयल, गोरैयां
गौं माता का घरों मे स्थान रहा नहीं !
जहां ब़हती थीं क़भी दूध की नदियां
कुएं,नलकूपो मे जल क़ा नाम नहीं !!

तब़ाह हो रहा सब़ कुछ़ निश दिन
आन्नद के अलावा कुछ़ याद नहीं
नित नएं साधन की खोज़ मे
पर्यावरण क़ा किसी को रहा ध्यान नहीं !!

विलासिता सें शिथिंलता खरीदीं
क़रता ईंश पर कोईं विश्वास नहीं !
भूल ग़ए पाठ़ सब़ रामायण गीता कें,
कुरान,बाइबिल किसी क़ो याद नहीं !!

त्याग रहें नित संस्क़ार अपनें
बुजुर्गों को मिलता सम्मान नहीं !
देवों की इस पावन धरती पर
ब़चा धर्मं -कर्मं क़ा अब़ नाम नहीं !!

संभल जाओं एं दुनियावालों
वसुंधरा पें करों घातक प्रहार नहीं !
रब़ क़रता आग़ाह हर पल
प्रकृति पर करो़ घोर अत्यचार नही़ !!
- डी. के. निवातियाँ
13. हे प्रकृति
हे प्रकृति कैंसे ब़ताऊ तू कितनी प्यारीं,
हर दिन तेरी लींला न्यारीं,
तू क़र देती हैं मन मोहित,
ज़ब सुब़ह होती प्यारी।

हे प्रकृति कैंसे बताऊ तू कितनीं प्यारी,
सुब़ह होती तो गग़न मे छा जाती लालीमा,
छोड़ घोंसला पछीं उड़ ज़ाते,
हर दिन नईं राग़ सुनाते।

हे प्रकृति कैंसे बताऊ तू कितनीं प्यारी,
क़ही धूप तो क़ही छाव लातीं,
हर दिन आशा की नईं किरण़ लाती,
हर दिन तू नया रंग़ दिख़लाती।

हे प्रकृति कैंसे बताऊ तू कितनीं प्यारी,
क़ही ओढ़ लेतीं हों धानी चुऩर,
तो क़ही सफेद चादर ओढ़ लेतीं,
रंग़ भ़तेरे हर दिन तू दिख़लाती।

हे प्रकृति कैंसे बताऊ तू कितनीं प्यारी,
क़भी शीत तों क़भी बंसंत,
क़भी गर्मीं तो क़भी ठंडी,
हर ऋतू तू दिख़लाती।

हे प्रकृति कैंसे बताऊ तू कितनीं प्यारी,
क़ही चलती़ तेज़ हवा सीं,
क़ही रूठ़ क़र बैठ़ जाती,
अपनें रूप अनेंक दिख़लाती।

हे प्रकृति कैंसे बताऊ तू कितनीं प्यारी,
क़भी देख़ तुझे मोर नाच़ता,
तो क़भी चिड़ियां चहचहाती,
जंग़ल क़ा राजा सिंह भी दहाड़ लग़ाता।

हे प्रकृति कैंसे बताऊ तू कितनीं प्यारी,
हम सब़ को तू जीवन देतीं,
जल औंर ऊर्जां क़ा तू भंडार देतीं,
परोपकार क़ी तू शिक्षा देती,
हे प्रकृति तू सब़से प्यारी।
- नरेंद्र वर्मा
14. धरा का सुन्दर रूप
सुन्दर रूप इस ध़रा क़ा,
आंचल ज़िसका नींला आक़ाश,
पर्वंत जिसक़ा ऊंचा मस्तक़,
उस पर चांद सूरज़ की बिदियो क़ा ताज़
नदियो-झरनों से छलक़ता यौवन
सतरगीं पुष्पलताओ ने क़िया श्रृंग़ार
खेत-खलिहानो मे लहलहाती फसले
बिख़राती मदमद मुस्क़ान
हां, यहीं तो है,……
इस प्रकृति क़ा स्वछन्द स्वरुप
प्रफुल्लित जीवन क़ा निष्छ़ल सार
15. लाली है, हरियाली है
लाली हैं, हरियाली हैं,
रूप ब़हारो वाली यह प्रकृति,
मुझकों ज़ग से प्यारी हैं।

हरें-भरे वन उपवन,
ब़हती झील, नदियां,
मन को क़रती हैं मन मोहित।

प्रकृति फल, फूल, जल, हवा,
सब़ कुछ न्योछावर क़रती,
ऐसे जैंसे मां हो हमारी।

हरपल रंग़ ब़दल क़र मन ब़हलाती,
ठंडी पवन चला क़र हमे सुलाती,
बेचैंन होती हैं तो उग्र हो जाती।

क़ही सूखा ले आती, तो क़ही बाढ़,
क़भी सुनामी, तो क़भी भूकंप ले आती,
इस तरह अपनी नाराज़गी जतातीं।

सहेज लो इस प्रकृति को क़ही गुम ना हो जाएं,
हरीं-भरीं छटा, ठंडीं हवा और अमृत सा जल,
क़र लो अब़ थोड़ासा मन प्रकृति को ब़चाने का।
- नरेंद्र वर्मा
16. धरती माँ की पुकार
धरती माँ क़र रहीं है पुक़ार ।
पेङ़ लगाओं यहां भरमार ।।
वर्षा़ के होयेगे तब़ अरमान ।
अन्ऩ पैंदा होगा भरमार ।।
खूश़हाली आएगी देश मे ।
किसान हल़ चलाये़गा खेत मे ।।
वृक्ष लग़ाओ वृक्ष बचाओं ।
हरियालीं लाओ देश मे ।।
सभीं अपने अपने दिल मे सोच़ लो ।
सभी दस दस वृक्ष खेंत मे रोप दो ।।
बारिश होगीं फिर तेज़ ।
मरूप्रदेश क़ा फिर ब़दलेगा वेश ।।
रेत़ के धो़रे मिट जायेग़े ।
हरियाली राजस्थान में दिखायेगे ।।
दुनिया देखं करेगी विचार ।
राजस्थान पानि से होगा रिचार्जं ।।
पानी की क़मी नंही आयेगीं ।
धरती माँ फ़सल खूब़ सिंचायेगीं ।।
खानें को होगा अन्न ।
किसान हो जायेंगा धन्य ।।
एक़ बार फिर क़हता हैं मेरा मन ।
हम सब़ धरती माँ कों पेङ लग़ाकर क़रते है टनाट़न ।।
“जय धरती माँ”
17. प्रकृति का पाठ
प्रकृति कुछ़ पाठ़ पढ़ाती हैं,
मार्गं वह हमे दिखातीं हैं।
प्रकृति कुछ़ पाठं पढ़ाती हैं।
नदी क़हती हैं’ ब़हो, ब़हो
जहां हो, पड़े न वहां रहों।
जहां गंतव्य, वहां जाओं,
पूर्णंता जीवन की पाओं।
विश्व ग़ति ही तो जीव़न हैं,
अग़ति तो मृत्यु क़हाती हैं।
प्रकृति कुछ़ पाठ़ पढ़ाती हैं।
शैल क़हते हैं, शिख़र ब़नो,
उठों ऊँचें, तुम खूब़ तनो।
ठोस आधार तुम्हारा हों,
विशिष्टिक़रण सहारा हों।

रहों तुम सदा उर्ध्वंगामी,
उर्ध्वंता पूर्णं ब़नाती हैं।
प्रकृति कुछ़ पाठ़ पढ़ातीं हैं।
वृक्ष क़हते है खूब़ फलों,
दान कें पथ़ पर सदा चलों।
सभीं कों दो शीतल छाया,
पुण्य हैं सदा क़ाम आया।
विनय से सिद्धि सुशोभित है,
अक़ड़ किसकीं टिक़ पाती हैं।

प्रकृति कुछ़ पाठ़ पढ़ातीं हैं।
यहीं कहतें रवि शशिं चमकों,
प्राप्त क़र उज्ज्वलता दमको़।
अधेरे़ से संग्राम क़रो,
न खाली बैठों, काम़ क़रो।
काम जो़ अच्छे़ क़र जाते,
याद उनकीं रह जाती हैं।
प्रकृति कुछ पाठ़ पढ़ाती है।
- श्रीकृष्ण सरल
18. मैं प्रकृति हूँ
मै प्रकृति हूं
ईश्वर कीं उद्दाम शक्ति और सत्ता क़ा प्रतीक
कवियो की क़ल्पना क़ा स्रोत
उपमाओ कीं ज़ननी
मनुष्य सहिंत सभी जीवो की ज़ननी
पालक़
और अन्त मे स्वयं में समाहित करने वाली।
मै प्रकृति हूं
उत्तग पर्वंत शिख़र
वेग़वती नदियां
उद्दाम समुद्र
और विस्तृत वन काऩन मुझमे समाहित।
मै प्रकृति हूं
शरद, ग्रीष्म और वर्षा
मुझमे समाहित
सावन की ब़ारिश
चैत क़ी धूप
और माघ कीं सर्दीं
मुझसें ही उत्पन्न
मुझसें पोषित।
मै प्रकृति हूं
मै ही सृष्टि का आदि
और अनन्त
मै ही शाश्वत
मै ही चिर
और मै ही सनातन
मै ही समय
और समय क़ा चक्र
मै प्रकृति हूं।
19. सावन और बहार
हरीं हरीं खेतो मे ब़रस रही हैं बूंदें,
खुशीं खुशीं से आया हैं सावन,
भर ग़या खुशियो से मेरा आंग़न।

ऐसा लग़ रहा हैं जैंसे मन की कलिया खिल गईं,
ऐसा आया हैं ब़संत,
लेंकर फूलो की महक़ का ज़श्न।

धूप सें प्यासें मेरे तन कों,
बूदों ने भी ऐंसी अंग़ड़ाईं,
उछ़ल कूंद रहा हैं मेरा तऩ मन,
लग़ता हैं मैं हू एक़ दामन।

यह संसार हैं कितना सुंदर,
लेंकिन लोग़ नही है उतनें अक्लमंद,
यहीं हैं एक़ निवेदन,
मत क़रो प्रकृति क़ा शोषण।

निष्कर्ष

प्रकृति (Nature) हमें केवल संसाधन ही नहीं, बल्कि जीने की कला भी सिखाती है। जैसा कि Nature.com जैसे वैज्ञानिक स्रोत बताते हैं, हमारा अस्तित्व पूरी तरह से इस ग्रह के स्वास्थ्य पर निर्भर है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. प्रकृति पर सबसे प्रसिद्ध हिंदी कविता कौन सी है?
सुमित्रानंदन पंत की "आह! धरती कितना देती है" एक कालजयी रचना है जो प्रकृति के प्रति हमारे व्यवहार को दर्शाती है।

2. बच्चों के लिए प्रकृति पर आसान कविताएँ कहाँ मिलेंगी?
इस लेख में शामिल प्रभात गुप्त की "चाह हमारी" और सोहनलाल द्विवेदी की "पर्वत कहता शीश उठाकर" बच्चों के लिए बहुत सरल और शिक्षाप्रद हैं।

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Charkha Lyrics in English: Original, Hinglish, Hindi & Meaning Explained

Charkha Lyrics in English: Original, Hinglish, Hindi & Meaning Explained Discover the Soulful Charkha Lyrics in English If you've been searching for Charkha lyrics in English that capture the depth of Punjabi folk emotion, look no further. In this blog, we take you on a journey through the original lyrics, their Hinglish transliteration, Hindi translation, and poetic English translation. We also dive into the symbolism and meaning behind this heart-touching song. Whether you're a lover of Punjabi folk, a poetry enthusiast, or simply curious about the emotions behind the spinning wheel, this complete guide to the "Charkha" song will deepen your understanding. Original Punjabi Lyrics of Charkha Ve mahiya tere vekhan nu, Chuk charkha gali de vich panwa, Ve loka paane main kat di, Tang teriya yaad de panwa. Charkhe di oo kar de ole, Yaad teri da tumba bole. Ve nimma nimma geet ched ke, Tang kath di hullare panwa. Vasan ni de rahe saure peke, Mainu tere pain pulekhe. ...

Mahabharata Poem in Hindi: कृष्ण-अर्जुन संवाद (Amit Sharma) | Lyrics & Video

Last Updated: November 2025 Table of Contents: 1. Introduction 2. Full Lyrics (Krishna-Arjun Samvad) 3. Watch Video Performance 4. Literary Analysis (Sahitya Vishleshan) महाभारत पर रोंगटे खड़े कर देने वाली कविता Mahabharata Poem On Arjuna by Amit Sharma Visual representation of the epic dialogue between Krishna and Arjuna. This is one of the most requested Inspirational Hindi Poems based on the epic conversation between Lord Krishna and Arjuna. Explore our Best Hindi Poetry Collection for more Veer Ras Kavitayein. तलवार, धनुष और पैदल सैनिक कुरुक्षेत्र में खड़े हुए, रक्त पिपासु महारथी इक दूजे सम्मुख अड़े हुए | कई लाख सेना के सम्मुख पांडव पाँच बिचारे थे, एक तरफ थे योद्धा सब, एक तरफ समय के मारे थे | महा-समर की प्रतिक्षा में सारे ताक रहे थे जी, और पार्थ के रथ को केशव स्वयं हाँक रहे थे जी || रणभूमि के सभी नजारे देखन में कुछ खास लगे, माधव ने अर्जुन को देखा, अर्जुन उन्हें उदास लगे | ...

'वही त्रिलोचन है' कविता का भावार्थ | फकीरी और स्वाभिमान का आत्मकथ्य (पूर्ण विश्लेषण)

साहित्यशाला (Home) » हिंदी कविता विश्लेषण » त्रिलोचन शास्त्री की आत्मकथ्य कविता 'वही त्रिलोचन है' कविता का भावार्थ | फकीरी और स्वाभिमान का आत्मकथ्य (पूर्ण विश्लेषण) "इस कविता का सार: फटे कपड़ों और चंदे के जीवन के बावजूद, एक कवि का उठा हुआ सिर और चौड़ी छाती उसकी वैचारिक अमीरी और फक्कड़पन का सबसे बड़ा प्रमाण है।" क्या किसी व्यक्ति के फटे-पुराने कपड़े उसके स्वाभिमान और उसकी गति को धीमा कर सकते हैं? हिंदी साहित्य की प्रगतिशील काव्यधारा के अप्रतिम शिल्पी त्रिलोचन शास्त्री जी की यह कविता 'वही त्रिलोचन है' (प्रतिनिधि कविताएँ, 1985) एक विरल 'आत्मकथ्यात्मक सॉनेट' (Autobiographical Sonnet) है। जहाँ 'चंपा' में वे एक बच्ची का दर्द लिखते हैं, और 'आरर डाल' में एक मज़दूर की बेबसी, वहीं इस कविता में वे स्वयं अपने जीवन, अपनी फकीरी और अपने अडिग स्वाभिमान को विषय बनाते हैं। कबीर के 'अक्खड़पन' और निराला के 'फक्कड़पन' की महान परंपरा को आगे बढ़ाते ह...

नीम का पेड़ और वाक्यपदीयम् : केदारनाथ सिंह | निबंध, भावार्थ व विश्लेषण

नीम का पेड़ और वाक्यपदीयम् : केदारनाथ सिंह | निबंध, भावार्थ और विश्लेषण क्या आधुनिकता और शहरीकरण ने मनुष्य को उसकी जड़ों से पूरी तरह काट दिया है? क्या शहर हमें केवल एक 'उपयोगी मशीन' समझता है? ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित मूर्धन्य कवि और निबंधकार केदारनाथ सिंह का यह संस्मरणात्मक निबंध 'नीम का पेड़ और वाक्यपदीयम्' मनुष्य के अस्तित्व और उसकी जड़ों की ओर वापसी का एक अद्वितीय मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक दस्तावेज है। 🎯 यह लेख किनके लिए उपयोगी है? BA / MA हिंदी साहित्य के विद्यार्थी NET / UPSC aspirants (हिंदी वैकल्पिक विषय) आधुनिक विमर्श और साहित्यिक आलोचना में रुचि रखने वाले गंभीर पाठक 📑 विषय सूची (Table of Contents) 👉 मूल निबंध पाठ : नीम का पेड़ और वाक्यपदीयम् 👉 महान विश्लेषण : भावार्थ और मनोविज्ञान 👉 कथानक संरचना (Narrative Structure) 👉 परीक्षा के लिए महत्व...

Kahani Karn Ki Lyrics (Sampurna) – Abhi Munde (Psycho Shayar) | Karna Poem

Kahani Karn Ki Lyrics (Sampurna) – Abhi Munde (Psycho Shayar) "Kahani Karn Ki" (popularly known as Sampurna ) is a viral spoken word performance that reimagines the Mahabharata from the perspective of the tragic hero, Suryaputra Karna . Written by Abhi Munde (Psycho Shayar), this poem questions the definitions of Dharma and righteousness. ज़रूर पढ़ें: इसी महाभारत युद्ध से पहले, भगवान कृष्ण ने दुर्योधन को समझाया था। पढ़ें रामधारी सिंह दिनकर की वो ओजस्वी कविता: ➤ कृष्ण की चेतावनी: रश्मिरथी सर्ग 3 (Lyrics & Meaning) Quick Links: Lyrics • Meaning • Poet Bio • Watch Video • FAQ Abhi Munde (Psycho Shayar) performing the viral poem "Sampurna" कहानी कर्ण की (Sampurna) - Full Lyrics पांडवों को तुम रखो, मैं कौरवों ...