वामपन्थी सोच का आयाम है नागार्जुन
हिन्दी साहित्य में जनवादी चेतना के दो सबसे मुखर और निडर स्वर अदम गोंडवी और बाबा नागार्जुन माने जाते हैं। प्रस्तुत अप्रकाशित कविता, अदम गोंडवी द्वारा बाबा नागार्जुन (Hindwi प्रोफाइल) के ज़मीनी जुड़ाव और उनके विद्रोही तेवर को दी गई एक शानदार काव्यात्मक श्रद्धांजलि है।
वामपन्थी सोच का आयाम है नागार्जुन
ज़िन्दगी में आस्था का नाम है नागार्जुन
ग्रामगन्धी सर्जना उसमें जुलाहे का गुरूर
जितना अनगढ़ उतना ही अभिराम है नागार्जुन
हम तो कहते हैं उसे बंगाल की खाँटी सुबह
केरला की ख़ूबसूरत शाम है नागार्जुन
खास इतना है कि सर-आँखों पर है उसका वजूद
मुफ़लिसों की झोपड़ी तक आम है नागार्जुन
इस अहद के साथ कि इस बार हारेगा यजीद
कर्बला में युद्ध का पैगाम है नागार्जुन
कविता का मनोवैज्ञानिक संदर्भ व व्याख्या
अदम गोंडवी की कविताएँ हमेशा समाज के हाशिये पर खड़े लोगों की बात करती हैं। चाहे बात चमारों की गली की हो या फिर धार्मिक पाखंड पर चोट करने वाली हिन्दू या मुस्लिम अहसासात की, गोंडवी का तेवर हमेशा धारदार रहा है।
इस कविता में वे नागार्जुन को 'ग्रामगन्धी सर्जना' (गाँव की सोंधी मिट्टी से जुड़ी रचना) और 'जुलाहे का गुरूर' (कबीर जैसा विद्रोही और स्वाभिमानी स्वभाव) का प्रतीक मानते हैं।
जिस प्रकार गोंडवी ने वेद में जिनका हवाला और जो डलहौज़ी न कर पाया में सत्ता को ललकारा है, ठीक वैसे ही वे नागार्जुन को कर्बला में युद्ध का पैगाम बताते हैं। यह अन्याय के खिलाफ सत्य के संघर्ष का सबसे बड़ा प्रमाण है। नागार्जुन खास होकर भी 'मुफ़लिसों की झोपड़ी तक आम' हैं, यही उनकी सबसे बड़ी वैचारिक पूँजी है।
हिन्दी साहित्य में विद्रोह के इसी स्वर को गहराई से समझने के लिए अज्ञेय के घृणा का गान और जुगनू को फ़कीर की दुआ लगी जैसी रचनाओं का भी अध्ययन अवश्य करें।
अदम गोंडवी के 20 सबसे धारदार शेर
व्यवस्था पर चोट करती अदम गोंडवी की रचनाओं की गहराई महसूस करने के लिए नीचे दिया गया यह वीडियो अवश्य देखें।