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“उम्मीद रखते हैं” पाश की कविता | Meaning, Deep Analysis & Lyrics

पाश की कविता "उम्मीद रखते हैं...": शहादत की विरासत और मज़दूर-किसान के दायित्व का घोषणापत्र

जब एक क्रांतिकारी फाँसी के फंदे को चूमता है, तो उसका संघर्ष ख़त्म नहीं होता, बल्कि वह आम जनता की रगों में ट्रांसफ़र (Transfer) हो जाता है। "मेरे पास" कविता में पाश ने जिस 'हम' (सामूहिकता) को अपनी सबसे बड़ी ताक़त बताया था, "उम्मीद रखते हैं..." उसी सामूहिकता का जीवंत दस्तावेज़ है। यह कविता उन शहीदों की आवाज़ है जो अब तस्वीर बन चुके हैं, लेकिन जिनकी नज़रें आज भी हमारे 'हल' और 'हथौड़ों' पर टिकी हैं।

साहित्यशाला के इस मंच पर हमने "23 मार्च" में नेताओं के झूठे आँसुओं का पाखंड देखा था। लेकिन इस कविता में पाश बताते हैं कि असली शहादत 'यादगार हॉल' की चारदीवारी में क़ैद नहीं होती। वह तो हमारे नमस्कार में, किताबों के अक्षरों में और 'पेट की गड़गड़ाहट' के नारों में ज़िंदा रहती है। पाश हमें सचेत करते हैं कि हमारे शहीद आज भी हमसे 'उम्मीद रखते हैं' कि हम उनके अधूरे युद्ध को आगे बढ़ाएँगे।

Pash addressing the masses, carrying the legacy of martyrs

इन्हीं माइक से गूँजने वाली आवाज़ों ने शहादत को महज़ एक तस्वीर बनने से रोका था...

कविता का मूल पाठ: उम्मीद रखते हैं...

▶ पूर्ण देवनागरी कविता (यहाँ क्लिक करें)
मुड़-मुड़ जाती है आलम की स्याह चादर जब आँगन में मुर्ग़े की बाँग छनक उठती है गीत घोंसलों से निकलकर बाहर आते हैं और हवा में उकेर देते हैं शहीदों के अमिट चेहरे, मिट्टी का सबसे सुहावना सफ़र रोशनी की पहली किरण के साथ फैलती हैं इस क़द्र तस्वीरें कि देशभक्त यादगार हॉल की मजबूर चारदीवारी पर बेपरवाह हँसता है तस्वीरों का आकार आप जब भी किसी को नमस्कार करते हैं या हाथ मिलाते हैं उनके होंठों से तिड़की हुई मुस्कुराहट आपकी परिक्रमा करती है आप जब किताबें पढ़ते हैं तो अक्षरों पर फैल जाते हैं उनके अमल और शिक्षाएँ जब समाज के रूखे सीने पर होता है तलवारों का नृत्य जब गर्म लहू बकरे बुलाते हैं या जब पेट की गड़गड़ाहट नारा बनती है तो कभी रोते, कभी मुस्कुराते हैं—सलीब के गीत तुम्हारे पास हल का फाल है या ख़राद की हत्थी तुम्हारे पैरों में सुबह है या शाम तुम्हारे अंग-संग तुम्हारे शहीद आपसे कुछ उम्मीद रखते हैं।

स्रोत : पुस्तक: लहू है कि तब भी गाता है (पृष्ठ 32) | अनुवाद: चमनलाल

▶ Hinglish Transliteration (Click to read)
Mud-mud jaati hai aalam ki syaah chadar Jab aangan mein murge ki baang chhanak uthti hai... Aur hawa mein uker dete hain Shaheedon ke amit chehre, mitti ka sabse suhawana safar Roshni ki pehli kiran ke saath Phailti hain is qadr tasveerein... Ki deshbhakt yaadgaar hall ki majboor chaardeewari par Beparwah hansta hai tasveeron ka aakar Aap jab bhi kisi ko namaskar karte hain Ya haath milate hain Unke hothon se tidki hui muskurahat Aapki parikrama karti hai... Ya jab pet ki gadgadahat naara banti hai Toh kabhi rote, kabhi muskurate hain—saleeb ke geet Tumhare paas hal ka phaal hai ya kharaad ki hatthi Tumhare pairon mein subah hai ya shaam Tumhare ang-sang tumhare shaheed Aapse kuch umeed rakhte hain.

मनोवैज्ञानिक और मार्क्सवादी विश्लेषण: वैचारिक उत्तराधिकार (Ideological Inheritance)

मनोविज्ञान में एक अवधारणा है—'Collective Memory' (सामूहिक स्मृति)। पाश इसी स्मृति को जगा रहे हैं। वे बताते हैं कि एक शहीद की तस्वीर किसी हॉल की "मजबूर चारदीवारी" में क़ैद नहीं रह सकती; वह दीवार पर बेपरवाह हँसती है। जब भी हम किसी से हाथ मिलाते हैं या 'नमस्कार' करते हैं, तो उस भाईचारे में उन्हीं शहीदों की मुस्कुराहट छिपी होती है। यह उस विद्रोही साहित्य का सबसे सुंदर और कोमल रूप है, जहाँ क्रांति सिर्फ ख़ून से नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के प्रेम और अभिवादन से भी जन्म लेती है。

'पेट की गड़गड़ाहट नारा बनती है'

कविता का सबसे मारक यथार्थ भूख है। जब आर्थिक विषमता (Economic disparity) के कारण 'समाज के रूखे सीने पर तलवारों का नृत्य' होता है, तो ग़रीब की भूख (पेट की गड़गड़ाहट) महज़ एक शारीरिक क्रिया नहीं रह जाती, वह एक 'नारा' बन जाती है। अदम गोंडवी की तरह ही पाश भी मानते हैं कि क्रांति का सबसे बड़ा ईंधन कोई किताब नहीं, बल्कि आम आदमी की भूख है। और जब यह भूख विद्रोह करती है, तो 'सलीब के गीत' (बलिदान के गीत) मुस्कुरा उठते हैं।

किसान और मज़दूर का रूपक

कविता का अंत अत्यंत शक्तिशाली है। पाश दो विशिष्ट औज़ारों का नाम लेते हैं:

  • हल का फाल (Ploughshare): यह भारत के किसान वर्ग का प्रतीक है, जो मिट्टी चीरकर अन्न उगाता है।
  • ख़राद की हत्थी (Lathe Handle): यह कारख़ानों में पसीना बहाने वाले मज़दूर (Proletariat) वर्ग का प्रतीक है।

पाश कहते हैं कि तुम चाहे खेत में हो या कारख़ाने में, तुम्हारे हाथ में जो भी औज़ार है, उसी के ज़रिए तुम्हारे शहीद तुमसे एक 'उम्मीद' रखते हैं। वे उम्मीद रखते हैं कि तुम उस 'मुर्दा शांति' को तोड़ोगे और शोषण के ख़िलाफ़ अपनी जगह पर खड़े होकर लड़ोगे।

Young portrait of revolutionary poet Avtar Singh Sandhu Pash in black and white

शहीदों की उम्मीदों का सबसे भारी बोझ इन्हीं युवा कंधों पर था...

निष्कर्ष: क्या आप उन उम्मीदों पर खरे उतर रहे हैं?

पाश की यह कविता एक आईना है। आज जब हम ज़िंदगी की रेस (Life & Sports) में केवल अपना स्वार्थ देख रहे हैं, हमें रुक कर सोचना चाहिए कि हमारे आस-पास के माहौल, हमारे द्वारा पढ़ी जा रही किताबों और यहाँ तक कि हमारी सुबह की हवा में भी किसी के बलिदान की महक है। क्या आपका 'हल' या 'ख़राद की मशीन' महज़ आपकी रोज़ी-रोटी है, या वह अन्याय को चीरने का एक हथियार भी है?

ऐसी ही कालजयी और ज़िम्मेदारी का एहसास कराने वाली कविताओं के लिए Sahityashala.in और हमारे अन्य प्रभागों जैसे English Poetry तथा Maithili Poems के साथ गहराई से जुड़े रहें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. "उम्मीद रखते हैं..." कविता में शहीद किससे उम्मीद रख रहे हैं?

शहीद देश के आम नागरिकों, विशेषकर किसानों (हल का फाल चलाने वालों) और कारख़ाने के मज़दूरों (ख़राद की हत्थी चलाने वालों) से उम्मीद रख रहे हैं कि वे उनके द्वारा छोड़े गए संघर्ष और क्रांति के अधूरे काम को पूरा करेंगे।

2. "पेट की गड़गड़ाहट नारा बनती है" का क्या आशय है?

इसका आशय है कि जब समाज में ग़रीबी और भुखमरी चरम पर पहुँच जाती है, तो ग़रीब की भूख महज़ एक तकलीफ़ नहीं रहती, बल्कि वह सत्ता और शोषण के ख़िलाफ़ एक गगनभेदी 'विद्रोही नारा' बन जाती है। भूख ही सबसे बड़ी क्रांति को जन्म देती है।

3. कविता में 'मुर्ग़े की बाँग' को किस रूप में दर्शाया गया है?

मुर्ग़े की बाँग को 'सुबह' (Dawn) और 'चेतना के जागरण' के प्रतीक के रूप में दर्शाया गया है। जैसे ही बाँग छनकती है, अज्ञानता और अंधकार की काली चादर (आलम की स्याह चादर) हट जाती है, और शहीदों के विचार हवा में फैलने लगते हैं।

पाश को सुनें और समझें (Video Analysis)

Watch the deep ideological analysis of Pash's legacy on YouTube

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