कोपी कोपी बोलेली छठी मैया लिरिक्स (Kopi Kopi Boleli)
छठ पर्व केवल आस्था का नहीं, बल्कि कठोर अनुशासन और घाटों की पवित्रता (Ritual Purity) का भी त्योहार है। जब नदी के घाटों की सफाई में ज़रा सी भी कमी रह जाती है, तो माता का क्या आदेश होता है और भक्त किस प्रकार उन्हें मनाते हैं— इस बेहद मीठे संवाद को अनु दुबे (Anu Dubey) की सुरीली आवाज़ में "कोपी कोपी बोलेली छठी मैया" गीत में पिरोया गया है।
इससे पहले हमने "अरघ के बेर हो पूजन के बेर" में भगवान सूर्य की स्तुति देखी थी, "पहिले पहिल हम कईनी" में पहली बार व्रत करने वालों का समर्पण महसूस किया था और "उगह हो सूरज देव भेल भिनसरवा" में समाज के हर वर्ग की पुकार सुनी थी। जहाँ "अंगना में पोखरी खनायब" में घर के आँगन को सजाया गया था, वहीं यह गीत सीधे तौर पर नदी के घाटों की सजावट और माता के प्रति सेवा-भाव से जुड़ा है।
🎶 कोपी कोपी बोलेली छठी मैया (मूल भोजपुरी-मैथिली लिरिक्स)
कोपी कोपी बोलेली छठी मैया सुनि ए सेवक लोग,
मोरा घाटे दुबीया उपज गइले,
मकरी बसेरा लिहले,
मकरी बसेरा लिहले।
ए रउरा घाटे दुबीया छिलवाई देबो मकरी उजारी देबो।
कोपी कोपी बोलेली छठी मैया सुनि ए सेवक लोग,
मोरा घाटे दुबीया उपज गइले,
मकरी बसेरा लिहले।
ए रउरा घाटे दुबीया छिलवाई देबो मकरी उजारी देबो।
रउरा घाटे चंदन छिडकाई देबो मकरी उजारी देबो।
कोपी कोपी बोलेली छठी मैया सुनिए सेवक लोग,
मोरा घाटे दुबीया उपज गइले,
मकरी बसेरा लिहले मकरी बसेरा लिहले।
🎶 Kopi Kopi Boleli Chhathi Maiya (Hinglish Lyrics)
Kopi kopi boleli chhathi maiya suni e sevak log,
Mora ghate dubiya upaj gaile,
Makari basera lihale,
Makari basera lihale.
E raura ghate dubiya chhilwai debo makari ujari debo.
Kopi kopi boleli chhathi maiya suni e sevak log,
Mora ghate dubiya upaj gaile,
Makari basera lihale.
E raura ghate dubiya chhilwai debo makari ujari debo.
Raura ghate chandan chhidkai debo makari ujari debo.
Kopi kopi boleli chhathi maiya suniye sevak log,
Mora ghate dubiya upaj gaile,
Makari basera lihale makari basera lihale.
📖 भोजपुरी और मैथिली लोक-साहित्य का शब्दकोश (Linguistic Meaning)
इस गीत को पूरी तरह समझने के लिए हमें इसके लोक-साहित्य और शब्दों की जड़ों (Etymology) को समझना होगा। साहित्य अकादमी के भोजपुरी प्रकाशनों और भोजपुरी साहित्य मंडल के अनुसार, इन शब्दों का अत्यंत गहरा अर्थ है:
| पारंपरिक शब्द (Word) | मूल स्रोत (Etymology) | अर्थ और संदर्भ (Meaning & Usage) |
|---|---|---|
| कोपी-कोपी (Kopi-Kopi) | संस्कृत के 'कोप' (Kopa) से | इसका अर्थ है 'दैवीय क्रोध' (Divine wrath)। रामचरितमानस और अवधी साहित्य में इसका प्रयोग अक्सर देवताओं के गुस्से के लिए किया गया है। |
| दुबीया (Dubiya) | दूर्वा घास (Dūrvā) | यह एक पवित्र घास है, लेकिन छठ घाट की मिट्टी और सीढ़ियों पर इसे अवांछित (Unwanted) माना जाता है क्योंकि घाट एकदम साफ़ होने चाहिए। |
| उजारी (Ujari) | भोजपुरी धातु (Root) | जड़ से उखाड़ फेंकना या पूरी तरह से साफ़ कर देना। यहाँ मकड़ी के जालों को जड़ से साफ़ करने के संदर्भ में प्रयुक्त हुआ है। |
✨ घाट सजावट: यह गीत कब और क्यों गाया जाता है?
यह गीत विशेष रूप से 'घाट सजावट' (Ghat Sajawat) के दौरान गाया जाता है, जो संध्या अर्घ्य (Sandhya Arghya) से ठीक पहले की प्रक्रिया है। बिहार पर्यटन विभाग के अनुसार, छठ पर्व एक सामुदायिक प्रयास (Communal effort) है।
जब पूरा गाँव मिलकर नदियों और तालाबों के किनारों को साफ़ करता है, रास्तों को बुहारता है, तो यह गीत एक प्रेरक के रूप में गाया जाता है। यह गीत शाब्दिक रूप से इस बात की याद दिलाता है कि शारीरिक और आध्यात्मिक दोनों ही रूपों में पूर्ण शुद्धता अनिवार्य है। भक्त माता से वादा करते हैं कि वे घाट को चंदन के पानी से पवित्र करेंगे (चंदन छिडकाई देबो)।
🎤 कलाकार और सांस्कृतिक धरोहर (Cultural Legacy)
अनु दुबे (Anu Dubey) ने इस आधुनिक संस्करण में अपनी मधुर आवाज़ दी है, लेकिन इस गीत की आत्मा पारंपरिक है। शारदा सिन्हा (Sharda Sinha) और अनुराधा पौडवाल (Anuradha Paudwal) जैसी महान गायिकाओं ने भी इसके विभिन्न संस्करण (जैसे "कोपी कोपी बोलले सुरुज देव") गाए हैं।
इन गीतों में मुख्य रूप से ढोलक (Dholak), हारमोनियम (Harmonium) और पारंपरिक तालियों (Traditional claps) का प्रयोग होता है, जो इसे जमीन से जोड़े रखता है। भारतीय संस्कृति मंत्रालय और यूनेस्को (UNESCO) की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के परिप्रेक्ष्य में, ये गीत बिहार की लोक-गाथाओं के सबसे मजबूत स्तंभ हैं।
📱 Instagram Reels और WhatsApp Status के लिए परफेक्ट!
क्या आप अपने सोशल मीडिया के लिए इस गीत का उपयोग करना चाहते हैं?
- Instagram Reels के लिए: वीडियो के 0:45 से 1:15 तक का हिस्सा चुनें, जहाँ "ए रउरा घाटे दुबीया छिलवाई देबो" के बोल आते हैं। यह घाट सजावट के वीडियो के साथ बेहतरीन लगता है।
- WhatsApp Status के लिए: जब आप अपने परिवार के साथ घाट साफ कर रहे हों या अर्घ्य की तैयारी कर रहे हों, तो इस गीत के बोलों को अपने स्टेटस पर लगाएँ। यह आपकी जड़ों से जुड़ाव को दर्शाता है।
▶️ अनु दुबे जी का यह रूहानी वीडियो देखें
❓ गीत से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्र 1: "कोपी-कोपी" (Kopi-Kopi) का क्या अर्थ है?
अवधी, भोजपुरी और मैथिली में 'कोप' का अर्थ 'क्रोध' या 'गुस्सा' होता है (जैसे तुलसीदास जी ने लिखा है- 'भृगुपति कोपे')। 'कोपी-कोपी' का मतलब है क्रोधित होकर या नाराज़गी जताते हुए छठी मईया अपने भक्तों से शिकायत कर रही हैं।
प्र 2: छठी मईया घाट पर क्यों नाराज़ हैं?
छठ पूजा की मूल आत्मा 'स्वच्छता' (Cleanliness) है। माता इसलिए नाराज़ हैं क्योंकि उनके घाट पर घास (दूब) उग आई है और मकड़ियों ने जाले लगा लिए हैं, जो कि पूजा स्थल की अशुद्धता का प्रतीक है।
प्र 3: भक्त माता का क्रोध कैसे शांत करते हैं?
भक्त माता से वादा करते हैं कि वे घाट की सारी घास छिलवा देंगे, मकड़ी के जाले हटा देंगे और घाट को सुगंधित एवं पवित्र बनाने के लिए वहाँ चंदन का लेप और पानी छिड़केंगे (चंदन छिडकाई देबो)।
🙏 छठी मईया की कृपा आपके परिवार पर सदैव बनी रहे!
अनु दुबे (Anu Dubey) जी द्वारा गाया गया यह गीत भारतीय लोक-साहित्य और हमारी अमूल्य धरोहर है।
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