सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

New !!

Mangal Rang Lyrics in Hindi & Meaning: Ramayana (2026) Song Guide

Nature Poems in Hindi: प्रकृति पर 10+ कविताएँ (Short & Heart Touching) + PDF Download

Nature Poems in Hindi: प्रकृति के अद्भुत रूप

प्रकृति (Nature) ईश्वर की सबसे सुंदर रचना है। चाहे वह सुमित्रानंदन पंत (Sumitranandan Pant) की कोमल कविताएँ हों या मेघ आए बड़े बन-ठन के, प्रकृति हर जगह मौजूद है।

आज हम आपके लिए लाए हैं Short & Heart Touching Poems on Nature जो कक्षा 4 से 10 (Class 6) के छात्रों, पर्यावरण प्रेमियों और साहित्य अनुरागियों के लिए बेहतरीन हैं। इन कविताओं में आपको धरती माँ की पुकार, पेड़ों का दर्द और बसंत का उल्लास मिलेगा।

1. प्रकृति का सानिध्य

(Short Poem of Nature in Hindi)

प्रकृति के सानिध्य में हो वास जिसका ,
कष्ट, तप ओ भाग्य भी हो दास जिसका |
जिस धरा के अंश थे अद्भुत प्रतापी,
तेज जिनके विश्व भर में था ||

- Rakesh K Jha

2. संभल जाओ ऐ दुनिया वालो

(Poem about Nature Conservation)

संभल जाओ ऐ दुनिया वालो
वसुंधरा पे करो घातक प्रहार नही !
रब करता आगाह हर पल
प्रकृति पर करो घोर अत्यचार नही !!
लगा बारूद पहाड़, पर्वत उड़ाए
स्थल रमणीय सघन रहा नही !
खोद रहा खुद इंसान कब्र अपनी
जैसे जीवन की अब परवाह नही !!
लुप्त हुए अब झील और झरने
वन्यजीवो को मिला मुकाम नही !
मिटा रहा खुद जीवन के अवयव
धरा पर बचा जीव का आधार नहीं !!
नष्ट किये हमने हरे भरे वृक्ष,लताये
दिखे कही हरयाली का अब नाम नही !
लहलाते थे कभी वृक्ष हर आँगन में
बचा शेष उन गलियारों का श्रृंगार नही !
कहा गए हंस और कोयल, गोरैया
गौ माता का घरो में स्थान रहा नही !
जहाँ बहती थी कभी दूध की नदिया
कुंए,नलकूपों में जल का नाम नही !!
तबाह हो रहा सब कुछ निश् दिन
आनंद के आलावा कुछ याद नही
नित नए साधन की खोज में
पर्यावरण का किसी को रहा ध्यान नही !!
विलासिता से शिथिलता खरीदी
करता ईश पर कोई विश्वास नही !
भूल गए पाठ सब रामयण गीता के,
कुरान,बाइबिल किसी को याद नही !!
त्याग रहे नित संस्कार अपने
बुजुर्गो को मिलता सम्मान नही !
देवो की इस पावन धरती पर
बचा धर्म -कर्म का अब नाम नही !!
संभल जाओ ऐ दुनिया वालो
वसुंधरा पे करो घातक प्रहार नही !
रब करता आगाह हर पल
प्रकृति पर करो घोर अत्यचार नही !!

- डी. के. निवातियाँ

3. रह रहकर टूटता रब का कहर

(Heart Touching Poem on Nature in Hindi)

रह रहकर टूटता रब का कहर
खंडहरों में तब्दील होते शहर
सिहर उठता है बदन
देख आतंक की लहर
आघात से पहली उबरे नहीं
तभी होता प्रहार ठहर ठहर
कैसी उसकी लीला है
ये कैसा उमड़ा प्रकति का क्रोध
विनाश लीला कर
क्यों झुंझलाकर करे प्रकट रोष
अपराधी जब अपराध करे
सजा फिर उसकी सबको क्यों मिले
पापी बैठे दरबारों में
जनमानष को पीड़ा का इनाम मिले
हुआ अत्याचार अविरल
इस जगत जननी पर पहर – पहर
कितना सहती, रखती संयम
आवरण पर निश दिन पड़ता जहर
हुई जो प्रकति संग छेड़छाड़
उसका पुरस्कार हमको पाना होगा
लेकर सीख आपदाओ से
अब तो दुनिया को संभल जाना होगा
कर क्षमायाचना धरा से
पश्चाताप की उठानी होगी लहर
शायद कर सके हर्षित
जगपालक को, रोक सके जो वो कहर
बहुत हो चुकी अब तबाही
बहुत उजड़े घरबार,शहर
कुछ तो करम करो ऐ ईश
अब न ढहाओ तुम कहर !!
अब न ढहाओ तुम कहर !!

- धर्मेन्द्र कुमार निवातियाँ

4. लाली है, हरियाली है

(Short Hindi Poem on Nature for Kids)

लाली है, हरियाली है,
रूप बहारो वाली यह प्रकृति,
मुझको जग से प्यारी है।
हरे-भरे वन उपवन,
बहती झील, नदिया,
मन को करती है मन मोहित।
प्रकृति फल, फूल, जल, हवा,
सब कुछ न्योछावर करती,
ऐसे जैसे मां हो हमारी।
हर पल रंग बदल कर मन बहलाती,
ठंडी पवन चला कर हमे सुलाती,
बेचैन होती है तो उग्र हो जाती।
कहीं सूखा ले आती, तो कहीं बाढ़,
कभी सुनामी, तो कभी भूकंप ले आती,
इस तरह अपनी नाराजगी जताती।
सहेज लो इस प्रकृति को कहीं गुम ना हो जाए,
हरी-भरी छटा, ठंडी हवा और अमृत सा जल,
कर लो अब थोड़ा सा मन प्रकृति को बचाने का।

- नरेंद्र वर्मा



Beautiful sunrise over mountains with white flowers - Visual for Prakriti Sushma Kavita.
  • 'लाली है, हरियाली है' - सूर्योदय और फूलों का मनोरम दृश्य जो मन को मोह ले।


5. प्रकृति से प्रेम करें

(Hindi Kavita on Nature Love)

आओ आओ प्रकृति से प्रेम करें,
भूमि मेरी माता है,
और पृथ्वी का मैं पुत्र हूं।
मैदान, झीलें, नदियां, पहाड़, समुंद्र,
सब मेरे भाई-बहन है,
इनकी रक्षा ही मेरा पहला धर्म है।
अब होगी अति तो हम ना सहन करेंगे,
खनन-हनन व पॉलीथिन को अब दूर करेंगे,
प्रकृति का अब हम ख्याल रखेंगे।
हम सबका जीवन है सीमित,
आओ सब मिलकर जीवन में उमंग भरे,
आओ आओ प्रकृति से प्रेम करें।
प्रकृति से हम है प्रकृति हमसे नहीं,
सब कुछ इसमें ही बसता,
इसके बिना सब कुछ मिट जाता।
[Image of environmental conservation]

6. वन, नदियां, पर्वत व सागर

(Hindi Poems on Environment)

वन, नदियां, पर्वत व सागर,
अंग और गरिमा धरती की,
इनको हो नुकसान तो समझो,
क्षति हो रही है धरती की।
हमसे पहले जीव जंतु सब,
आए पेड़ ही धरती पर,
सुंदरता संग हवा साथ में,
लाए पेड़ ही धरती पर।
पेड़ -प्रजाति, वन-वनस्पति,
अभयारण्य धरती पर,
यह धरती के आभूषण है,
रहे हमेशा धरती पर।
बिना पेड़ पौधों के समझो,
बढ़े रुग्णता धरती की,
हरी भरी धरती हो सारी,
सेहत सुधरे धरती की।
खनन, हनन व पॉलीथिन से,
मुक्त बनाएं धरती को,
जैव विविधता के संरक्षण की,
अलख जगाए धरती पर।

- रामगोपाल राही

7. कलयुग में अपराध का

(Poem about Nature in Hindi)

कलयुग में अपराध का
बढ़ा अब इतना प्रकोप
आज फिर से काँप उठी
देखो धरती माता की कोख !!
समय समय पर प्रकृति
देती रही कोई न कोई चोट
लालच में इतना अँधा हुआ
मानव को नही रहा कोई खौफ !!
कही बाढ़, कही पर सूखा
कभी महामारी का प्रकोप
यदा कदा धरती हिलती
फिर भूकम्प से मरते बे मौत !!
मंदिर मस्जिद और गुरूद्वारे
चढ़ गए भेट राजनितिक के लोभ
वन सम्पदा, नदी पहाड़, झरने
इनको मिटा रहा इंसान हर रोज !!
सबको अपनी चाह लगी है
नहीं रहा प्रकृति का अब शौक
“धर्म” करे जब बाते जनमानस की
दुनिया वालो को लगता है जोक !!
कलयुग में अपराध का
बढ़ा अब इतना प्रकोप
आज फिर से काँप उठी
देखो धरती माता की कोख !!

- डी. के. निवातियाँ

: Autumn leaves floating on dark water - Background for sad or deep nature poems in Hindi.
 प्रकृति का शांत और गंभीर रूप - जीवन चक्र और बदलाव का संदेश देती पत्तियां।

8. हरे पेड़ पर चली कुल्हाड़ी

(Nature Poems in Hindi)

हरे पेड़ पर चली कुल्हाड़ी धूप रही ना याद।
मूल्य समय का जाना हमने खो देने के बाद।।
खूब फसल खेतों से ले ली डाल डाल कर खाद।
पैसों के लालच में कर दी उर्वरता बर्बाद।।
दूर दूर तक बसी बस्तियाँ नगर हुए आबाद।
बन्द हुआ अब तो जंगल से मानव का संवाद।।
ताल तलैया सब सूखे हैं हुई नदी में गाद।
पानी के कारण होते हैं हर दिन नए विवाद।।
पशु पक्षी बेघर फिरते हैं कौन सुने फरियाद।
कुदरत के दोहन ने सबके मन में भरा विषाद।।

- सुरेश चन्द्र

9. कहो, तुम रूपसि कौन?

(Famous Nature Poem by Sumitranandan Pant)

कहो, तुम रूपसि कौन?
व्योम से उतर रही चुपचाप
छिपी निज छाया-छबि में आप,
सुनहला फैला केश-कलाप,
मधुर, मंथर, मृदु, मौन!
मूँद अधरों में मधुपालाप,
पलक में निमिष, पदों में चाप,
भाव-संकुल, बंकिम, भ्रू-चाप,
मौन, केवल तुम मौन!
ग्रीव तिर्यक, चम्पक-द्युति गात,
नयन मुकुलित, नत मुख-जलजात,
देह छबि-छाया में दिन-रात,
कहाँ रहती तुम कौन?
अनिल पुलकित स्वर्णांचल लोल,
मधुर नूपुर-ध्वनि खग-कुल-रोल,
सीप-से जलदों के पर खोल,
उड़ रही नभ में मौन!
लाज से अरुण-अरुण सुकपोल,
मदिर अधरों की सुरा अमोल,–
बने पावस-घन स्वर्ण-हिंदोल,
कहो, एकाकिनि, कौन?
मधुर, मंथर तुम मौन?

- सुमित्रानंदन पंत

10. मधुरिमा के, मधु के अवतार

(Hindi Kavita on Nature by Mahadevi Verma)

मधुरिमा के, मधु के अवतार
सुधा से, सुषमा से, छविमान,
आंसुओं में सहमे अभिराम
तारकों से हे मूक अजान!
सीख कर मुस्काने की बान
कहां आऎ हो कोमल प्राण!
स्निग्ध रजनी से लेकर हास
रूप से भर कर सारे अंग,
नये पल्लव का घूंघट डाल
अछूता ले अपना मकरंद,
ढूढं पाया कैसे यह देश?
स्वर्ग के हे मोहक संदेश!
रजत किरणों से नैन पखार
अनोखा ले सौरभ का भार,
छ्लकता लेकर मधु का कोष
चले आऎ एकाकी पार;
कहो क्या आऎ हो पथ भूल?
मंजु छोटे मुस्काते फूल!
उषा के छू आरक्त कपोल
किलक पडता तेरा उन्माद,
देख तारों के बुझते प्राण
न जाने क्या आ जाता याद?
हेरती है सौरभ की हाट
कहो किस निर्मोही की बाट?

- महादेवी वर्मा

11. धरती माँ कर रही है पुकार

(Plantation Poem in Hindi)

धरती माँ कर रही है पुकार ।
पेङ लगाओ यहाँ भरमार ।।
वर्षा के होयेंगे तब अरमान ।
अन्न पैदा होगा भरमार ।।
खूशहाली आयेगी देश में ।
किसान हल चलायेगा खेत में ।।
वृक्ष लगाओ वृक्ष बचाओ ।
हरियाली लाओ देश में ।।
सभी अपने-अपने दिल में सोच लो ।
सभी दस-दस वृक्ष खेत में रोप दो ।।
बारिस होगी फिर तेज ।
मरू प्रदेश का फिर बदलेगा वेश ।।
रेत के धोरे मिट जायेंगे ।
हरियाली राजस्थान मे दिखायेंगे ।।
दुनियां देख करेगी विचार ।
राजस्थान पानी से होगा रिचार्ज ।।
पानी की कमी नही आयेगी ।
धरती माँ फसल खूब सिंचायेगी ।।
खाने को होगा अन्न ।
किसान हो जायेगा धन्य ।।
एक बार फिर कहता है मेरा मन ।
हम सब धरती माँ को पेङ लगाकर करते है टनाटन ।।

“जय धरती माँ”

Majestic mountain peak reflecting in a lake - Symbol of greatness in Hindi Nature Poems.
'पर्वत कहता शीश उठाकर' - प्रकृति की भव्यता और शांति का प्रतीक।


12. बसंत मनमाना

(Nature Poem by Makhanlal Chaturvedi)

चादर-सी ओढ़ कर ये छायाएँ
तुम कहाँ चले यात्री, पथ तो है बाएँ।
धूल पड़ गई है पत्तों पर डालों लटकी किरणें
छोटे-छोटे पौधों को चर रहे बाग में हिरणें,
दोनों हाथ बुढ़ापे के थर-थर काँपे सब ओर
किन्तु आँसुओं का होता है कितना पागल ज़ोर-
बढ़ आते हैं, चढ़ आते हैं, गड़े हुए हों जैसे
उनसे बातें कर पाता हूँ कि मैं कुछ जैसे-तैसे।
पर्वत की घाटी के पीछे लुका-छिपी का खेल
खेल रही है वायु शीश पर सारी दनिया झेल।
छोटे-छोटे खरगोशों से उठा-उठा सिर बादल
किसको पल-पल झांक रहे हैं आसमान के पागल?
ये कि पवन पर, पवन कि इन पर, फेंक नज़र की डोरी
खींच रहे हैं किसका मन ये दोनों चोरी-चोरी?
फैल गया है पर्वत-शिखरों तक बसन्त मनमाना,
पत्ती, कली, फूल, डालों में दीख रहा मस्ताना।

- माखनलाल चतुर्वेदी

13. ये वृक्षों में उगे परिन्दे

(Easy Poem on Nature in Hindi)

ये वृक्षों में उगे परिन्दे
पंखुड़ि-पंखुड़ि पंख लिये
अग जग में अपनी सुगन्धित का
दूर-पास विस्तार किये।
झाँक रहे हैं नभ में किसको
फिर अनगिनती पाँखों से
जो न झाँक पाया संसृति-पथ
कोटि-कोटि निज आँखों से।
श्याम धरा, हरि पीली डाली
हरी मूठ कस डाली
कली-कली बेचैन हो गई
झाँक उठी क्या लाली!
आकर्षण को छोड़ उठे ये
नभ के हरे प्रवासी
सूर्य-किरण सहलाने दौड़ी
हवा हो गई दासी।
बाँध दिये ये मुकुट कली मिस
कहा-धन्य हो यात्री!
धन्य डाल नत गात्री।
पर होनी सुनती थी चुप-चुप
विधि -विधान का लेखा!
उसका ही था फूल
हरी थी, उसी भूमि की रेखा।
धूल-धूल हो गया फूल
गिर गये इरादे भू पर
युद्ध समाप्त, प्रकृति के ये
गिर आये प्यादे भू पर।
हो कल्याण गगन पर-
मन पर हो, मधुवाही गन्ध
हरी-हरी ऊँचे उठने की
बढ़ती रहे सुगन्ध!
पर ज़मीन पर पैर रहेंगे
प्राप्ति रहेगी भू पर
ऊपर होगी कीर्ति-कलापिनि
मूर्त्ति रहेगी भू पर।।

- माखनलाल चतुर्वेदी

प्रकृति कविता संग्रह (Download PDF)

इन सभी कविताओं को एक साथ पढ़ने और स्कूल प्रोजेक्ट्स के लिए PDF डाउनलोड करें।

Download Nature Poems PDF

प्रकृति हमारी माता है और हम इसके रक्षक। आशा है कि ये Short & Heart Touching Nature Poems आपको और आपके बच्चों को पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरित करेंगी। चाहे रवींद्रनाथ टैगोर की रचनाएँ हों या हिंदी कवियों की पुकार, सबका उद्देश्य एक ही है - हरियाली बचाओ, जीवन बचाओ।

Frequently Asked Questions (FAQ)

Class 6 के लिए प्रकृति पर सबसे छोटी कविता कौन सी है?

नरेंद्र वर्मा की 'लाली है, हरियाली है' कक्षा 6 के छात्रों के लिए याद करने में बहुत सरल और छोटी कविता है।

प्रकृति के सुकुमार कवि किसे कहा जाता है?

हिंदी साहित्य में सुमित्रानंदन पंत को प्रकृति का सुकुमार कवि कहा जाता है। उनकी कविता 'कहो, तुम रूपसि कौन?' प्रकृति सौंदर्य का अद्भुत उदाहरण है।

पर्यावरण दिवस पर कौन सी कविता सुनाएं?

पर्यावरण दिवस पर 'धरती माँ कर रही है पुकार, पेड़ लगाओ यहाँ भरमार' कविता सबसे उपयुक्त है क्योंकि यह वृक्षारोपण का सन्देश देती है।

Famous Poems

Shafaullah Khan Rokhri: Chalre Chalre Waal Lyrics Meaning & Deep Analysis

Home » Music » Chalre Chalre Waal Lyrics Meaning Shafaullah Khan Rokhri के अमर गीत 'Chalre Chalre Waal' का गहरा अर्थ और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण क्या आपने कभी सोचा है कि एक काली शॉल और लाल रुमाल किसी को इस कदर दीवाना कैसे बना सकता है? संगीत की दुनिया में कुछ धुनें ऐसी होती हैं जो सिर्फ कानों को नहीं, सीधे रूह को छूती हैं । शफ़ाउल्लाह ख़ान रोखड़ी (Shafaullah Khan Rokhri) का बहुचर्चित सरायकी/पंजाबी लोकगीत 'चलरे चलरे वाल' एक ऐसा ही जादुई तराना है। यह गीत सिर्फ शब्दों का जाल नहीं है; यह एक आशिक के दिल की पुकार है । एक ऐसा प्रेमी जो अपने महबूब की ठेठ सादगी और उसकी कातिलाना अदाओं पर अपनी पूरी दुनिया लुटाने को तैयार है। शफ़ाउल्लाह ख़ान रोखड़ी का अमर ग...

कट जाओगे मिट जाओगे हो जाएगा अंत (Kat Jaoge Mit Jaoge): Viral Lyrics & Meaning

कट जाओगे मिट जाओगे हो जाएगा अंत: वायरल गीत का खौफनाक सच और सटीक विश्लेषण भारतीय राजनीतिक संगीत के इतिहास में शायद ही किसी गाने ने इंटरनेट पर इतनी तेज़ी से आग लगाई हो जितनी "कट जाओगे मिट जाओगे हो जाएगा अंत" ने लगाई है। प्रेम (Prem) की रोंगटे खड़े कर देने वाली आवाज़ और रुद्र (Rudra) की बेबाक कलम ने एक ऐसा राजनीतिक गान (Political Anthem) तैयार किया है, जो सोशल मीडिया के हर कोने में गूंज रहा है। क्या यह महज़ एक देशभक्ति गीत है, या इसके पीछे कोई गहरा राजनीतिक ध्रुवीकरण छिपा है? साहित्यशाला (Sahityashala) के इस एक्सक्लूसिव लेख में, हम इस वायरल ट्रैक के संपूर्ण बोल (Full Lyrics), इसके प्रत्येक छंद का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण (Psychological Trigger Formatting) और इसके सामाजिक-राजनीतिक एजेंडे का एक निष्पक्ष और गहन आलोचनात्मक विश्लेषण करेंगे। ▶ वीडियो देखें 📱 WhatsApp पर शेयर करें प्रेम और रुद्र द्वारा रचित इस लोकप्रिय गीत की आधिकारिक कलाकृति। गीत के संपूर्ण बोल और मनोवैज्ञानिक संरचना ...

सुना था कि बेहद सुनहरी है दिल्ली (Lyrics & Meaning) - Imran Pratapgarhi

सुना था कि बेहद सुनहरी है दिल्ली (Lyrics & Meaning) - Imran Pratapgarhi "Suna Tha Ki Behad Sunheri Hai Dilli" – यह सिर्फ एक कविता की पंक्ति नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों पर किया गया एक बेहद तीखा और मार्मिक राजनीतिक व्यंग्य है। इमरान प्रतापगढ़ी की यह रचना एक माँ की तड़प को आवाज़ देती है, जो चकाचौंध से भरी 'सुनहरी' दिल्ली में अपने लापता लाल (बेटे) और इंसाफ के लिए दर-दर भटक रही है। साहित्यशाला के इस लेख में हम केवल इस मशहूर कविता के पूरे बोल (Lyrics) ही नहीं पढ़ेंगे, बल्कि इसके पीछे छिपे उस गहरे प्रतीकात्मक अर्थ (Metaphorical Meaning) का भी विश्लेषण करेंगे, जिसने भारतीय राजनीति और समाज को झकझोर कर रख दिया था। प्रतीकात्मक चित्र: "सुनहरी" दिल्ली की खामोशी और एक बेबस माँ की गुहार। (Suna Tha Ki Behad Sunheri Hai Dilli - Visual Meaning) कविता की पृष्ठभूमि और राजनीतिक संदर्भ (Context) साहित्य हमेशा समाज का दर्पण होता है। जब भी सत्ता अपनी ज़िम्मेदारियों से मुँह मोड़ती है, तब फैज़ अहमद फैज़ की ...

Baba Jani Poem Lyrics: पिता-पुत्र की इस रुला देने वाली कविता ने लाखों दिलों को छुआ!

साहित्य का मूल उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के उन पृष्ठों को खोलना है जिन पर अक्सर धूल जम जाती है। "बाबा जानी" (Baba Jani) आधुनिक दौर की एक ऐसी ही मार्मिक रचना है, जो पीढ़ियों के बीच पनपते संवादहीनता (Generational Gap) और वृद्धावस्था के मनोवैज्ञानिक पहलुओं को बड़ी सूक्ष्मता से उकेरती है। जिस तरह सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की 'सरोज स्मृति' ने एक पिता के असीम वात्सल्य और शोक को अमर कर दिया, ठीक उसी तरह यह कविता एक वृद्ध, असहाय पिता और उसके अधीर, युवा बेटे के बीच के उस जटिल संवाद को प्रस्तुत करती है, जो आज के समाज का एक कड़वा यथार्थ बन चुका है। हिंदी साहित्य में जहाँ एक ओर धूमिल की 'किस्सा जनतन्त्र' जैसे रचनाओं में व्यवस्था और रोज़गार का संघर्ष झलकता है, और दिनकर की 'व्याल विजय' में सत्ता का वैचारिक द्वंद्व दिखाई देता है; वहीं, 'बाबा जानी' घर की चारदीवारी के भीतर चलने वाले उस मौन संघर्ष को स्वर देती है जहाँ मनुष्य की शारीरिक लाचारी उसके आत्मसम्मान से टकराती है...

Mahabharata Poem in Hindi: कृष्ण-अर्जुन संवाद (Amit Sharma) | Lyrics & Video

Last Updated: October 2026 Table of Contents: 1. Introduction 2. Full Lyrics (Krishna-Arjun Samvad) 3. Watch Video Performance 4. Literary Analysis (Sahitya Vishleshan) महाभारत पर रोंगटे खड़े कर देने वाली कविता Mahabharata Poem On Arjuna by Amit Sharma Visual representation of the epic dialogue between Krishna and Arjuna. This is one of the most requested Inspirational Hindi Poems based on the epic conversation between Lord Krishna and Arjuna. Explore our Best Hindi Poetry Collection for more Veer Ras Kavitayein. तलवार, धनुष और पैदल सैनिक कुरुक्षेत्र में खड़े हुए, रक्त पिपासु महारथी इक दूजे सम्मुख अड़े हुए | कई लाख सेना के सम्मुख पांडव पाँच बिचारे थे, एक तरफ थे योद्धा सब, एक तरफ समय के मारे थे | महा-समर की प्रतिक्षा में सारे ताक रहे थे जी, और पार्थ के रथ को केशव स्वयं हाँक रहे थे जी || रणभूमि के सभी नजारे देखन में कुछ खास लगे, माधव ने अर्जुन को देखा, अर्जुन उन्हें उदास लगे | ...