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आए जिस-जिस की हिम्मत हो (पूर्ण कविता) | अटल बिहारी वाजपेयी - Aaye Jis-Jis Ki Himmat Ho Poem

आए जिस-जिस की हिम्मत हो (पूर्ण कविता)

अटल बिहारी वाजपेयी | Aaye Jis-Jis Ki Himmat Ho

संक्षेप में: 'आए जिस-जिस की हिम्मत हो' अटल बिहारी वाजपेयी जी की एक अत्यंत ओजस्वी और आक्रामक देशभक्ति कविता है। यह रचना सोए हुए भारतीय पौरुष को जगाने, हमारे ऐतिहासिक और पौराणिक गौरव को याद दिलाने और विदेशी शक्तियों के सामने घुटने न टेकने का सिंहनाद है।

राष्ट्रकवि अटल बिहारी वाजपेयी की कविता 'आए जिस-जिस की हिम्मत हो' (Aaye Jis-Jis Ki Himmat Ho) भारतीय साहित्य में वीर रस और राष्ट्रवाद का एक अप्रतिम उदाहरण है। जब देश की अस्मिता पर सवाल उठे या जब समाज अपने पौराणिक और ऐतिहासिक गौरव को भूलकर आलस्य में डूबने लगे, तब वाजपेयी जी की यह रचना एक शंखनाद का काम करती है।

इस कविता में उन्होंने राम, कृष्ण, अर्जुन, चन्द्रगुप्त और चाणक्य जैसे महानायकों का स्मरण करते हुए देश के युवाओं को ललकारा है कि वे अपनी सोई हुई शक्ति को पहचानें। आइए इस ऊर्जा से भरी रचना का पूर्ण पाठ पढ़ें और इसके गहन अर्थ को समझें।

आए जिस-जिस की हिम्मत हो कविता - अटल बिहारी वाजपेयी (Aaye Jis-Jis Ki Himmat Ho Poem)
सोने की लंका की मिट्टी लख कर भरता आह प्रभंजन...

कविता पाठ (Full Poem)

हिन्दु महोदधि की छाती में धधकी अपमानों की ज्वाला,
और आज आसेतु हिमाचल मूर्तिमान हृदयों की माला ।

सागर की उत्ताल तरंगों में जीवन का जी भर कृन्दन,
सोने की लंका की मिट्टी लख कर भरता आह प्रभंजन ।

शून्य तटों से सिर टकरा कर पूछ रही सरयू की धारा,
सगरसुतों से भी बढ़कर क्या आज हुआ मृत भारत सारा ?


यमुना कहती कृष्ण कहाँ है, सरयू कहती राम कहाँ है?
व्यथित गण्डकी पूछ रही है, चन्द्रगुप्त बलधाम कहाँ है?

अर्जुन का गांडीव किधर है, कहाँ भीम की गदा सो गयी
किस कोने में पांचजन्य है, कहाँ भीष्म की शक्ति खो गयी?


अगणित सीतायें अपहृत हैं, महावीर निज को पहचानो
अपमानित द्रुपदायें कितनी, समरधीर शर को सन्धानो ।

अलक्षेन्द्र को धूलि चटाने वाले पौरुष फिर से जागो
क्षत्रियत्व विक्रम के जागो, चणकपुत्र के निश्चय जागो ।

कोटि कोटि पुत्रो की माता अब भी पीड़ित अपमानित है
जो जननी का दुःख न मिटायें उन पुत्रों पर भी लानत है ।

लानत उनकी भरी जवानी पर जो सुख की नींद सो रहे
लानत है हम कोटि कोटि हैं, किन्तु किसी के चरण धो रहे ।

अब तक जिस जग ने पग चूमे, आज उसी के सम्मुख नत क्यों
गौरवमणि खो कर भी मेरे सर्पराज आलस में रत क्यों?

गत गौरव का स्वाभिमान ले वर्तमान की ओर निहारो
जो जूठा खा कर पनपे हैं, उनके सम्मुख कर न पसारो ।

पृथ्वी की संतान भिक्षु बन परदेसी का दान न लेगी
गोरों की संतति से पूछो क्या हमको पहचान न लेगी?


हम अपने को ही पहचाने आत्मशक्ति का निश्चय ठाने
पड़े हुए जूठे शिकार को सिंह नहीं जाते हैं खाने ।

एक हाथ में सृजन दूसरे में हम प्रलय लिए चलते हैं
सभी कीर्ति ज्वाला में जलते, हम अंधियारे में जलते हैं ।

आँखों में वैभव के सपने पग में तूफानों की गति हो
राष्ट्र भक्ति का ज्वार न रुकता, आए जिस जिस की हिम्मत हो ।
Aaye Jis-Jis Ki Himmat Ho Poem by Atal Bihari Vajpayee
राष्ट्रभक्ति का ज्वार न रुकता...
अटल बिहारी वाजपेयी देशभक्ति कविता (Deshbhakti Kavita)
भारत के शिखर पुरुष और राष्ट्रकवि अटल जी।

विस्तृत साहित्यिक विश्लेषण और भावार्थ

अटल जी की यह रचना केवल एक कविता नहीं, बल्कि भारत के सोए हुए स्वाभिमान पर किया गया एक गहरा प्रहार है। इसके भावार्थ को हम निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं में समझ सकते हैं:

1. पौराणिक गौरव और वर्तमान की निराशा

कवि पूछता है कि जिस धरती पर राम, कृष्ण, अर्जुन और भीम जैसे महाबलियों ने जन्म लिया, आज वह धरती इतनी शांत और मृतप्राय क्यों है? "यमुना कहती कृष्ण कहाँ है, सरयू कहती राम कहाँ है?" पंक्तियों के माध्यम से वाजपेयी जी वर्तमान समाज की कायरता और अपने गौरवशाली अतीत से कट जाने की पीड़ा को व्यक्त करते हैं।

2. स्वाभिमान का जागरण और विदेशी निर्भरता का विरोध

कविता का सबसे शक्तिशाली अंश वह है जहाँ कवि विदेशी शक्तियों के सामने भीख मांगने की प्रवृत्ति का कड़ा विरोध करता है। "पृथ्वी की संतान भिक्षु बन परदेसी का दान न लेगी, गोरों की संतति से पूछो क्या हमको पहचान न लेगी?" यह पंक्ति स्पष्ट करती है कि भारत को अपनी आत्मशक्ति (Self-reliance) पर निर्भर रहना चाहिए, न कि पश्चिमी देशों (गोरों की संतति) के टुकड़ों पर।

3. सिंह की वृत्ति और अंतिम ललकार

कवि भारतीय जनमानस को 'सिंह' की उपाधि देता है—"पड़े हुए जूठे शिकार को सिंह नहीं जाते हैं खाने।" अंत में, "आए जिस जिस की हिम्मत हो" कहकर अटल जी दुश्मनों को खुली चुनौती देते हैं कि जब भारत का स्वाभिमान जागता है, तो कोई भी शक्ति उसे रोक नहीं सकती।

Atal Bihari Vajpayee Quotes in Hindi (आए जिस-जिस की हिम्मत हो)
हम अपने को ही पहचाने आत्मशक्ति का निश्चय ठाने।
अटल बिहारी वाजपेयी की हिंदी देशभक्ति कविताएं (Hindi Deshbhakti Kavita)
अटल जी की रचनाओं में राष्ट्रप्रेम का प्रखर रूप।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q. 'आए जिस-जिस की हिम्मत हो' कविता किसने लिखी है?
A. यह आक्रामक और ओजस्वी देशभक्ति कविता भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और राष्ट्रकवि अटल बिहारी वाजपेयी जी द्वारा रची गई है।
Q. इस कविता का मुख्य संदेश क्या है?
A. इसका मुख्य संदेश भारतीयों के सोए हुए पौरुष को जगाना, विदेशी ताकतों के सामने न झुकना, और अपने ऐतिहासिक महानायकों (राम, कृष्ण, अर्जुन) से प्रेरणा लेकर देश के दुश्मनों को चुनौती देना है।
Q. "गोरों की संतति से पूछो" पंक्ति का क्या तात्पर्य है?
A. इस पंक्ति के माध्यम से कवि पश्चिमी देशों (विदेशी शक्तियों) पर निर्भरता का कड़ा विरोध करता है और भारतीयों को आत्मनिर्भर होकर अपनी शक्ति पहचानने का आह्वान करता है।

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