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क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी - हरिवंश राय बच्चन (Meaning & Poem)

क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी - हरिवंश राय बच्चन

हिन्दी साहित्य के प्रख्यात हस्ताक्षर हरिवंश राय बच्चन (Harivansh Rai Bachchan), जिन्हें विश्व स्तर पर उनकी अमर रचना मधुशाला के लिए पूजा जाता है, अपनी बेबाक और यथार्थवादी शैली के लिए प्रसिद्ध हैं। उनकी यह विशेष कविता, "क्या करूँ संवेदना ले कर तुम्हारी", आधुनिक समाज की खोखली सहानुभूति और इंसान के अंतर्मन के अकेलेपन पर एक अत्यंत तीखा और मर्मस्पर्शी प्रहार है।

जहाँ एक ओर बच्चन जी की अग्निपथ और जो बीत गई सो बात गई जैसी प्रेरणादायक कविताएँ (Motivational Poems) हमें जीवन की बाधाओं से लड़ने की ऊर्जा देती हैं, वहीं यह विशिष्ट रचना हमें रुककर यह सोचने पर विवश कर देती है कि— क्या हमारी औपचारिकता भरी संवेदनाएँ वास्तव में किसी का दुःख कम कर सकती हैं?

Kya Karu Samvedna Lekar Tumhari Poem by Harivansh Rai Bachchan - Hindi Text and Meaning
Harivansh Rai Bachchan Poetry: बच्चन जी की यह कालजयी रचना मानवीय दिखावे और झूठी सांत्वना के बीच के अंतर को स्पष्ट करती है।

कविता का मूल पाठ (Original Poem in Hindi)

मैं दुःखी जब-जब हुआ
संवेदना तुमने दिखाई,
मैं कृतज्ञ हुआ हमेशा
रीति दोनों ने निभाई,
किंतु इस आभार का अब
हो उठा है बोझ भारी
क्या करूँ संवेदना ले कर तुम्हारी?
एक भी उच्छ्वास मेरा
हो सका किस दिन तुम्हारा?
उस नयन से बह सकी कब
इस नयन की अश्रु-धारा?
सत्य को मूँदे रहेगी
शब्द की कब तक पिटारी?
क्या करूँ संवेदना ले कर तुम्हारी?
कौन है जो दूसरे को
दुःख अपना दे सकेगा?
कौन है जो दूसरे से
दुःख उसका ले सकेगा?
क्यों हमारे बीच धोखे का व्यापार रहे जारी?
क्या करूँ संवेदना ले कर तुम्हारी?
क्यों न हम लें मान, हम हैं
चल रहे ऐसी डगर पर,
हर पथिक जिस पर अकेला,
दुःख नहीं बँटते परस्पर,
दूसरों की वेदना में
वेदना जो है दिखाता,
वेदना से मुक्ति का निज
हर्ष केवल वह छिपाता,
तुम दुःखी हो तो सुखी मैं
विश्व का अभिशाप भारी!
क्या करूँ संवेदना ले कर तुम्हारी?
क्या करूँ?

Kya Karu Samvedna Lekar Tumhari (Hinglish Lyrics)

Main dukhi jab-jab hua
Samvedna tumne dikhayi,
Main kritagya hua hamesha
Reeti dono ne nibhayi,
Kintu is aabhar ka ab
Ho utha hai bojh bhari
Kya karu samvedna le kar tumhari?

Ek bhi uchhvas mera
Ho saka kis din tumhara?
Us nayan se bah saki kab
Is nayan ki ashru-dhara?
Satya ko munde rahegi
Shabd ki kab tak pitari?
Kya karu samvedna le kar tumhari?

Kaun hai jo dusre ko
Dukh apna de sakega?
Kaun hai jo dusre se
Dukh uska le sakega?
Kyon hamare beech dhokhe ka vyapar jaari?
Kya karu samvedna le kar tumhari?

Kyon na hum lein maan, hum hain
Chal rahe aisi dagar par,
Har pathik jis par akela,
Dukh nahi bant-te paraspar,
Dusron ki vedna mein
Vedna jo hai dikhata,
Vedna se mukti ka nij
Harsh keval vah chhipata,
Tum dukhi ho to sukhi main
Vishwa ka abhishap bhari!
Kya karu samvedna le kar tumhari?
Kya karu?
Kya Karu Samvedna Lekar Tumhari Meaning - Harivansh Rai Bachchan Poetry Analysis
Poetry Analysis: शब्दों की यह खोखली सहानुभूति अंततः एक असहनीय बोझ बन जाती है, जिसे बच्चन जी ने बखूबी दर्शाया है।

कविता का विस्तृत भावार्थ और साहित्यिक विश्लेषण (Meaning & Analysis)

इस कालजयी रचना में बच्चन जी ने समाज के एक कड़वे सत्य को बड़ी बेबाकी से उजागर किया है। जब भी मनुष्य विपत्ति में होता है, लोग मात्र सामाजिक औपचारिकता (Social Formality) निभाने के लिए सांत्वना देने आ जाते हैं। बदले में, दुःखी व्यक्ति भी शिष्टाचार के नाते उन्हें धन्यवाद देता है। परंतु एक समय के बाद, शब्दों की यह खोखली सहानुभूति एक असहनीय बोझ बन जाती है।

यदि हम मैथिलीशरण गुप्त जी की प्रसिद्ध कविता मनुष्यता (Manushyata) का अवलोकन करें, तो उसमें परोपकार और सच्ची सहानुभूति को मानवता का शिखर माना गया है। इसके ठीक विपरीत, इस कविता में बच्चन जी विशुद्ध यथार्थवाद (Realism) के धरातल पर खड़े होकर प्रश्न करते हैं— "क्या सच में कोई इंसान किसी दूसरे का दुःख बाँट सकता है?" कवि का दृढ़ मत है कि जीवन की इस यात्रा में हर पथिक नितांत अकेला है।

मनोवैज्ञानिक व साहित्यिक दृष्टिकोण से, यह कविता इंसान की उस मनःस्थिति का सटीक चित्रण करती है जहाँ उसे झूठे शब्दों की नहीं, अपितु मौन एकांत की आवश्यकता होती है। ठीक वैसे ही जैसे ज्ञानेन्द्रपति की कविता चोर का गमछा आधुनिक विडंबनाओं पर कटाक्ष करती है, बच्चन जी की यह रचना मानवीय संवेदनाओं के नाम पर रचे जाने वाले धोखे के व्यापार को बेनकाब करती है।

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संदर्भ एवं प्रामाणिक स्रोत (Authoritative Sources)

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