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आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक Lyrics | Mirza Ghalib Ghazal

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक (Aah Ko Chahiye Ik Umr) - Mirza Ghalib

मिर्ज़ा ग़ालिब की यह मशहूर ग़ज़ल प्रेम, विरह और जीवन के गहरे यथार्थ को उर्दू शायरी के सबसे बेहतरीन अंदाज़ में पिरोती है। यहाँ इस मुकम्मल ग़ज़ल को हिंदी और रोमन अंग्रेजी (Roman English) दोनों लिपियों में प्रस्तुत किया गया है।

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक - Mirza Ghalib Ghazal Lyrics

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक - मिर्ज़ा ग़ालिब की अमर रचना

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक - हिंदी लिरिक्स

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

दाम-ए-हर-मौज में है हल्क़ा-ए-सद-काम-ए-नहंग
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होते तक

आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होते तक

ता-क़यामत शब-ए-फ़ुर्क़त में गुज़र जाएगी उम्र
सात दिन हम पे भी भारी हैं सहर होते तक

हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होते तक

परतव-ए-ख़ुर से है शबनम को फ़ना की ता'लीम
मैं भी हूँ एक इनायत की नज़र होते तक

यक नज़र बेश नहीं फ़ुर्सत-ए-हस्ती ग़ाफ़िल
गर्मी-ए-बज़्म है इक रक़्स-ए-शरर होते तक

ग़म-ए-हस्ती का 'असद' किस से हो जुज़ मर्ग इलाज
शम्अ हर रंग में जलती है सहर होते तक

जीवन और विरह के अन्य गहरे रंग

ग़ालिब की इस ग़ज़ल में जीवन की जिन दुश्वारियों ("ग़म-ए-हस्ती") का ज़िक्र है, वह दर्द आज भी प्रासंगिक है। अगर आप जीवन के इसी संघर्ष को आधुनिक शब्दों में महसूस करना चाहते हैं, तो मुश्किल थी संभालना ही पड़ा घर के वास्ते एक बेहतरीन रचना है।

मोहब्बत में 'यक नज़र' की अहमियत को कैफ़ी आज़मी साहब ने भी अपनी मशहूर नज़्म झुकी झुकी सी नज़र में बख़ूबी उकेरा है। वहीं, जब 'ख़ून-ए-जिगर' और यादों का सैलाब आता है, तो कैफ़ी साहब की ही एक और ग़ज़ल आज सोचा तो आँसू भर आए बरबस याद आ जाती है। रिश्तों में बेगानेपन का जो दर्द ग़ालिब बयां करते हैं, वही टीस हिमांशी बाबरा की कविता मेरे अपने गैरों की तरह में भी साफ़ झलकती है।

Aah Ko Chahiye Ik Umr Asar Hote Tak - Roman English Lyrics

aah ko chāhiye ik umr asar hote tak
kaun jiitā hai tirī zulf ke sar hote tak

dām-e-har-mauj meñ hai halqa-e-sad-kām-e-nahañg
dekheñ kyā guzre hai qatre pe guhar hote tak

āshiqī sabr-talab aur tamannā betāb
dil kā kyā rañg karūñ ḳhūn-e-jigar hote tak

tā-qayāmat shab-e-furqat meñ guzar jā.egī umr
saat din ham pe bhī bhārī haiñ sahar hote tak

ham ne maanā ki taġhāful na karoge lekin
ḳhaak ho jā.eñge ham tum ko ḳhabar hote tak

partav-e-ḳhur se hai shabnam ko fanā kī ta.alīm
maiñ bhī huuñ ek ināyat kī nazar hote tak

yak nazar besh nahīñ fursat-e-hastī ġhāfil
garmī-e-bazm hai ik raqs-e-sharar hote tak

ġham-e-hastī kā 'asad' kis se ho juz marg ilaaj
sham.a har rañg meñ jaltī hai sahar hote tak

- मिर्ज़ा ग़ालिब (Mirza Ghalib)

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