क्या कभी आपने सोचा है कि देश की तबाही के बीच कुछ लोगों की दौलत कैसे रातों-रात बढ़ती जाती है?
सत्ता और भ्रष्टाचार के इसी कड़वे सच को उजागर करती है मंज़र भोपाली (Manzar Bhopali) की यह सबसे चर्चित राजनीतिक कविता। अपनी बेबाक आवाज़ के लिए मशहूर, मंज़र साहब ने इस नज़्म के ज़रिए सीधा हुक्मरानों के ज़मीर पर वार किया है। आइए पढ़ते हैं इस मशहूर नज़्म के मुकम्मल लिरिक्स और समझते हैं इसका गहरा भावार्थ।
'मुझको अपने बैंक की किताब दीजिए' कविता का सार
'मुझको अपने बैंक की किताब दीजिए' एक तीखा राजनीतिक तंज़ (Political Satire) है जिसमें कवि मंज़र भोपाली सत्ताधारी नेताओं से उनके भ्रष्टाचार और बढ़ती संपत्ति का सीधा हिसाब माँगते हैं। यह कविता आम जनता की ग़रीबी, महँगी होती जीवनरक्षक दवाओं और आपदा में भी अवसर ढूँढने वाले हुक्मरानों की क्रूर मानसिकता को बेनकाब करती है।
कविता: मुझको अपने बैंक की किताब दीजिए (Hindi Lyrics)
मुझको अपने बैंक की किताब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए
गाँव गाँव ज़ख़्मी फिजाएँ हो गई
ज़हरीली घर की हवाएँ हो गई
महँगी शराब से दवाएँ हो गई
जाइए आवाम को जवाब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए
मुझको अपने बैंक की किताब दीजिए
लोग जो ग़रीब थे हक़ीर हो गए
आप तो ग़रीब से अमीर हो गए
यानि कि हुज़ूर बेज़मीर हो गए
ख़ुद को बेज़मीरी का ख़िताब दीजिए
राहतों के नाम पे कमाई कीजिए
जेब-ए-आवाम की सफाई कीजिए
लूट के ग़रीबों को भलाई कीजिए
कुछ तो निगाहों को हिजाब दीजिए
कैसी कैसी देखो योजनायें खा गए
बेच कर ये अपनी आत्माएँ खा गए
मार के मरीज़ों की दवाएँ खा गए
इन्हें पद्मश्री का ख़िताब दीजिए
देश की तबाही का हिसाब दीजिए..!!
Nazm: Mujhko Apne Bank Ki Kitaab Dijiye (Roman English Lyrics)
Mujhko apne bank ki kitaab dijiye
Desh ki tabaahi ka hisaab dijiye
Gaanv-gaanv zakhmi fazaaein ho gayi
Zehrili ghar ki havaaein ho gayi
Mahengi sharaab se davaaein ho gayi
Jaaiye awaam ko jawaab dijiye
Desh ki tabaahi ka hisaab dijiye
Mujhko apne bank ki kitaab dijiye
Log jo ghareeb the haqeer ho gaye
Aap to ghareeb se ameer ho gaye
Yaani ki huzoor be-zameer ho gaye
Khud-ko be-zameeri ka khitaab dijiye
Raahaton ke naam pe kamaaee kijiye
Jaib-e-avaam ki safaaee kijiye
Loot ke ghareebon ki bhalaaee kijiye
Kuchh to nigaahon ko hijaab dijiye
Kaisi-kaisi dekho yojanaaein khaa gaye
Bech kar ye apni aatmaaein khaa gaye
Maar ke marizon ki davaaein khaa gaye
Inhein Padma Shri ka khitaab dijiye
Desh ki tabaahi ka hisaab dijiye..!!
इस नज़्म की पृष्ठभूमि
यह कविता उस सामाजिक और राजनीतिक दौर की उपज है जहाँ महँगाई, भ्रष्टाचार और असमानता चरम पर है। जब एक तरफ आम नागरिक बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ सत्ता में बैठे लोग आपदा को भी अवसर बनाकर अपनी तिजोरियाँ भर रहे हैं।
जिस तरह बाबा नागार्जुन अपनी प्रसिद्ध रचना कालिदास सच सच बतलाना में सत्ता और इतिहास से सीधे सवाल करते हैं, और अपनी एक अन्य रचना अन्न पचीसी में कृषि व राजनीतिक व्यवस्था की विफलता को दर्शाते हैं, ठीक उसी तरह मंज़र भोपाली आधुनिक भारत की दुर्दशा पर यह तीखा प्रहार करते हैं।
कविता का सार और गहराई से विश्लेषण
1. "बैंक की किताब": भ्रष्टाचार का आधुनिक प्रतीक
कविता की शुरुआत में ही शायर "बैंक की किताब" मांगता है। यह आम आदमी की वह आवाज़ है जो यह देख रहा है कि देश की बदहाली के बीच कुछ चुनिंदा नेताओं की संपत्ति कई गुना कैसे बढ़ रही है। सामूहिक विकास की बात कदम मिलाकर चलना होगा जैसी कविताओं में जहाँ एक सपना लगती है, भोपाली यहाँ उस सपने के टूटने के दर्द को सामने लाते हैं।
2. इंसानी ज़िंदगी का बाज़ारीकरण
यह पंक्ति एक गहरी त्रासदी है। जिस देश में जीवन रक्षक दवाएँ नशा करने वाली शराब से महँगी हो जाएँ, वहाँ का पूरा ढांचा ही भ्रष्ट हो चुका है। यह संस्थागत पाखंड का वही रूप है जिसकी आलोचना टी.एस. इलियट ने धर्म के संदर्भ में द हिप्पोपोटेमस (The Hippopotamus) में की थी; यहाँ भोपाली इसे हमारी राजनीति पर लागू करते हैं।
3. ज़मीर की मौत और राहत के नाम पर लूट
"राहतों के नाम पे कमाई कीजिए" वाला हिस्सा उन बड़े घोटालों की ओर इशारा करता है जो आम जनता के राहत कोष (जैसे बाढ़, अकाल या महामारी के समय) में होते हैं। एक तरफ लोग गरीबी से बेहाल हैं, और दूसरी तरफ 'बेज़मीर' नेता आपदा में भी कमाई का जरिया खोज लेते हैं।
4. पद्मश्री का तंज़ (राज्य सम्मान की विडंबना)
नज़्म का सबसे करारा वार आखिरी पंक्तियों में है: "इन्हें पद्मश्री का ख़िताब दीजिए।" शायर यह स्थापित करता है कि आज के दौर में जो नेता देश को जितना लूटता है, सिस्टम उसे सज़ा देने के बजाय सबसे बड़े राजकीय सम्मानों से नवाज़ता है।
मंज़र भोपाली के बारे में
मंज़र भोपाली समकालीन उर्दू शायरी और मुशायरों के सबसे प्रमुख हस्ताक्षरों में से एक हैं। उनका जन्म २९ दिसंबर १९५९ को भोपाल, मध्य प्रदेश में हुआ। अपनी बेबाकी और निडर आवाज़ के लिए देश-विदेश में पहचाने जाने वाले मंज़र साहब की शायरी हमेशा आम आदमी के हक़ और सामाजिक बुराइयों के ख़िलाफ़ खड़ी नज़र आती है।
वीडियो देखें: मंज़र भोपाली की दमदार आवाज़ में
मंज़र भोपाली की दमदार आवाज़ में इस नज़्म का लाइव मुशायरा पाठ यहाँ देखें। यह वीडियो इस राजनीतिक कविता की असली भावना को महसूस कराता है:
निष्कर्ष
मंज़र भोपाली की यह नज़्म महज़ कुछ शब्द नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के काले सच का एक दस्तावेज़ है। जिस तरह लोकगीत केरवा जे फरेला घवद से हमारी मिट्टी और सांस्कृतिक जड़ों की बात करता है, उसी तरह यह नज़्म हमारी आज की खोखली व्यवस्था को आईना दिखाती है। जब तक समाज में ग़रीबी और भ्रष्टाचार रहेगा, भोपाली के ये अल्फ़ाज़ सत्ता से जवाब माँगते रहेंगे।
आपको यह कविता कैसी लगी? अपने विचार नीचे कमेंट्स में ज़रूर साझा करें!
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. 'मुझको अपने बैंक की किताब दीजिए' नज़्म किसने लिखी है?
यह मशहूर राजनीतिक नज़्म प्रसिद्ध उर्दू शायर मंज़र भोपाली द्वारा लिखी गई है।
2. इस नज़्म का मुख्य विषय क्या है?
यह नज़्म मुख्य रूप से राजनीतिक भ्रष्टाचार, ग़रीबी, और महँगाई पर एक करारा तंज़ है। इसमें नेताओं के बढ़ते बैंक बैलेंस और आपदा में अवसर ढूँढने की निंदा की गई है।
3. "राहतों के नाम पे कमाई कीजिए" इस पंक्ति का क्या अर्थ है?
इस पंक्ति का सीधा अर्थ उन भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों से है जो जनता के राहत कोष (Relief funds) के पैसों को लूटकर अपनी निजी संपत्ति बढ़ाते हैं।
4. मंज़र भोपाली की कुछ अन्य प्रसिद्ध नज़्में कौन सी हैं?
उनकी अन्य मशहूर नज़्मों में 'मेरा बचपन मुझे वापस दे दो', 'ये ज़मीन हमारी है, आसमान हमारा है' और 'हम अपने आप में एक अंजुमन हैं' शामिल हैं।