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अन्न-पचीसी (1965) - बाबा नागार्जुन की दुर्लभ कविता | पूर्ण पाठ, अर्थ और विश्लेषण

भूख केवल भोजन का अभाव नहीं है; यह एक सक्रिय, हिंसक शक्ति है जो इंसान से उसकी इंसानियत छीन लेती है। 1965 के दौर में, जब भारत भीषण अकाल (food shortage) और महंगाई की मार झेल रहा था, तब सत्ता के गलियारों में बैठे लोग अपनी तिजोरियां भर रहे थे। उस युग के वास्तविक सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य को समझने का अर्थ है संस्थागत पाखंड के गहरे अंधेरे में सीधे झांकना।

इस क्रूर वास्तविकता को 'जनकवि' वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री'—जिन्हें दुनिया बाबा नागार्जुन के नाम से जानती है—से अधिक सटीकता और तीखेपन के साथ किसी ने नहीं उकेरा। उनकी 25 पदों की ऐतिहासिक रचना, अन्न-पचीसी (Ann Pachisi), केवल एक कविता नहीं है; यह एक धधकता हुआ सामाजिक-आर्थिक दस्तावेज़ है। यदि आप इंटरनेट पर सटीक Ann Pachisi meaning या Nagarjun Ann Pachisi analysis खोज रहे हैं, तो यह लेख आपके लिए संपूर्ण मार्गदर्शिका है।

🚨 ध्यान दें: यह संभवतः इंटरनेट पर 'अन्न-पचीसी' (Ann-Pachisi) का पहला सबसे विस्तृत, शोधपरक और प्रामाणिक ऑनलाइन विश्लेषण है। वर्तमान में बहुत कम डिजिटल संसाधन इस ऐतिहासिक कविता पर इतनी गहराई से चर्चा करते हैं।
गोदामों में अन्न कैद है, पेट-पेट है खाली - 1965 Food Crisis in India अन्न पचीसी
"गोदामों में अन्न कैद है, पेट-पेट है खाली" - 1965 के अकाल का प्रतीकात्मक दृश्य

अन्न-पचीसी कब और क्यों लिखी गई? (Historical Research Context)

नागार्जुन की 'अन्न पचीसी' शून्यता में नहीं लिखी गई थी। यह 1965 के उस विकराल समय की उपज है जब देश भीषण अकाल (1965 food shortage) से गुजर रहा था। इस कविता की पृष्ठभूमि में निम्नलिखित ऐतिहासिक कारण थे:

  • गल्ला चोरों का आतंक (Grain Hoarding): मुनाफाखोरों और जमाखोरों ने गोदामों में अनाज डंप कर लिया था, जिससे कृत्रिम कमी पैदा हुई।
  • बेकाबू महंगाई (Inflation): आवश्यक वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे थे, जिससे आम आदमी की कमर टूट गई थी।
  • PL-480 का अपमान: भारत को अमेरिका से PL-480 समझौते के तहत वह लाल गेहूं आयात करना पड़ रहा था जो विदेशों में अक्सर सूअरों को खिलाया जाता था।
  • राजनैतिक अस्थिरता (Political Unrest): सरकार शांति-पाठ कर रही थी, जबकि भूखी जनता सड़कों पर अश्रुगैस के गोले खा रही थी।
बाबा नागार्जुन पोर्ट्रेट - Baba Nagarjun Poet Portrait Ann Pachisi
जनकवि बाबा नागार्जुन - शोषितों और वंचितों की मुखर आवाज़

अन्न-पचीसी का पूर्ण पाठ (Complete Poem Text)

नीचे बाबा नागार्जुन की इस दुर्लभ कविता का पूर्ण और प्रामाणिक पाठ दिया गया है। इन पंक्तियों को गहराई से पढ़ें, क्योंकि इसका हर एक शब्द शोषित वर्ग के पसीने और खून से सना है।

1
जन-जन का दिल टोह रही है अन्नब्रह्म की माया
भस्मासुर को मोह रही है अन्नब्रह्म की माया
प्रभु-पीढ़ी को परख रही है अन्नब्रह्म की माया
सिर धुनती है, बिलख रही है अन्नब्रह्म की माया
जन-जन का दिल टोह रही है अन्नब्रह्म की माया
2
डायन बनकर घूम रही है अन्नब्रह्म की माया
यम की ठोड़ी चूम रही है अन्नब्रह्म की माया
लोकधुनों पर थिरक रही है अन्नब्रह्म की माया
बल की बुकनी छिड़क रही है अन्नब्रह्म की माया
डायन बनकर घूम रही है अन्नब्रह्म की माया
3
प्राण-प्राण पर डोल रही है महाकाल की छाया
हिय-हिय में विष घोल रही है महाकाल की छाया
भ्रम का भूत भगाएगी यह महाकाल की छाया
घर-घर अलख जगाएगी यह महाकाल की छाया
प्राण-प्राण पर डोल रही है महाकाल की छाया
4
गोदामों में अन्न कैद है, पेट-पेट है खाली
भूख-पिशाचिन बजा रही है, द्वार-द्वार पर थाली
दो चाहे हिंसा की देवी को गाली पर गाली
बलि पशुओं की ले रही है, खप्पर लेकर काली
गोदामों में अन्न कैद है, पेट-पेट है खाली
5
अन्नब्रह्म को भूल गई क्या वीणा-पुस्तक वाली?
शीशमहल में बुनता है कवि नायलान की जाली!
कुछ आँखों का काजल देखा, कुछ गालों की लाली
भुला दिया है कटु सत्यों को, देखो खामख्याली
अन्नब्रह्म को भूल गई क्या वीणा-पुस्तकवाली
6
राजनीति क्या नाप सकेगी अन्नब्रह्म की माया
कूटनीति क्या भाँप सकेगी अन्नब्रह्म की माया
मरी खाल की फूँक बनेगी अन्नब्रह्म की माया
दस लेनिन दस तिलक जनेगी अन्नब्रह्म की माया
राजनीति क्या नाप सकेगी अन्नब्रह्म की माया
7
कंकालों को नाच सिखाती अन्नब्रह्म की माया
लघु रूप को विराट दिखाती अन्नब्रह्म की माया
दाढ़ी-चोटी को मिलवाती अन्नब्रह्म की माया
चिन्तन को ठोकर खिलवाती अन्नब्रह्म की माया
कंकालों को नाच नचाती अन्नब्रह्म की माया
8
कण-कण में शोले भड़काती अन्नब्रह्म की माया
सौ-सौ जंजीरें तड़काती अन्नब्रह्म की माया
वहम झाड़ती, भूत भगाती अन्नब्रह्म की माया
कुटी-कुटी में अलख जगाती अन्नब्रह्म की माया
कण-कण में शोले भड़काती अन्नब्रह्म की माया
9
भत्ता खींचें भले विधायक, हमें चाहिए दाना
आपस में उलझें जननायक, हमें चाहिए दाना
प्रस्तावों पर बतकूट्टन हो, हमें चाहिए दाना
झड़पा-झड़पी हो, अनबन हो, हमें चाहिए दाना
भत्ता खींचें भले विधायक, हमें चाहिए दाना
10
भूखे भजन कहाँ से होगा, चारों वेद ठिठोली
मन रोएगा, कान सुनेंगे, आदर्शों की बोली
अन्नचोर खेलें जन-जन के अरमानों की होली
छूट-फूट से टकराएगी सोशलिज़्म की गोली
भूखे भजन कहाँ से होगा, चारों वेद ठिठोली
11
अंधी होगी भूख कि छूट अश्रुगैस के गोले
खौल रही है गंगा-जमुना, भड़क उठे हैं शोले
शान्ति-पाठ सुनते हैं प्रभु जी, सिंहासन क्यों डोले
मनमानी करता है गुपचुप, कालनेमि क्या बोले
अंधी होगी भूख कि छूटे अश्रुगैस के गोले
12
व्यापारी हाकिम नेता तीनों ही खूब मिले हैं
अन्दर नीचे काई-कीचड़, ऊपर कमल खिले हैं
जो चाहो माँगो इनसे, सपनों में होंठ हिले हैं
तीन रंग के तेरह टुकड़े क्या ही खूब सिले हैं
व्यापारी हाकिम नेता तीनों ही खूब मिले हैं
13
भूखों मरते हों बच्चे तो यों ही मत रह जाओ
आँतें सूख रही हों तो आँसू मत वृथा बहाओ
हाथ-पैर वाले हो, नाहक कायर नहीं कहाओ
कीड़ों और मकोड़ों जैसे यों मत प्राण गँवाओ
भूखों मरते हों बच्चे तो यों ही मत रह जाओ
14
कूच करेंगे भुक्खड़, थर्राएगी दुनिया सारी
काम न आएँगे रत्ती-भर विधि-निषेध सरकारी
बन्दूकों पर हावी होगी सैनिक की लाचारी
सरे-आम कीड़े खाएँगे बेदम अत्याचारी
कूच करेंगे भुक्खड़, थर्राएगी दुनिया सारी
15
जन-जन में विद्रोह भरेगी अन्नब्रह्म की माया
गुर्बत का मैदान चरेगी अन्नब्रह्म की माया
भूखों का भवताप हरेगी अन्नब्रह्म की माया
दुख में सुख-संचार करेगी अन्नब्रह्म की माया
जन-जन में विद्रोह भरेगी अन्नब्रह्म की माया
16
कहाँ गए चावल-गेहूँ, दलहन-तिलहन के दाने
कागज का रुपया रोया सुनना पड़ता है ताने
हर सीढ़ी छोटी पड़ती है, भाव चढ़े मनमाने
सबकी कलई उतर गई है, सभी गए पहचाने
कहाँ गए चावल-गेहूँ, दलहन-तिलहन के दाने
17
पके बाल की खाल निकालें, करते हैं मुँह काला
इन पर तो कुढ़ता ही होगा नीली छतरीवाला
कौन हटाए चूल्हे पर से अब मकड़ी का जाला
भुक्खड़ देखें मकई के दानों की मोहन माला
पके बाल की खाल निकालें, करते हैं मुँह काला
18
शासन करना क्या जानें ये कपटी-क्रूर-कुचाली
गल्लाचोरों की पौ-बारह, जनता की पामाली
किसे रिझाए नेताओं की सूरत रोगन वाली
राजनीति बदनाम हुई, बाकी है खामख्याली
शासन करना क्या जानें ये कपटी-क्रूर-कुचाली
19
गुलछर्रे वे उड़ा रहे हैं गुटबन्दी के बल पर
उनकी निष्ठा टँगी हुई है केवल अपने दल पर
भाई और भतीजे हावी हैं उनकी हलचल पर
हम तो यों ही तरस खा गए उनकी घुटी अकल पर
गुलछर्रे वे उड़ा रहे हैं गुटबन्दी के बल पर
20
बैलों के साथी हलधर, तुम हँसिया वाले आओ!
खान-श्रमिक तुम भूत सरीखे काले-काले आओ!
आओ छटनी के शिकार! तुम निपट निराले आओ!
आओ तुम बेकार पंगु तुम, बैठे ठाले आओ!
बैलों के साथी हलधर, तुम हँसियावाले आओ!
21
आओ, तुमको बुला रही है अन्नब्रह्म की माया
उभर रहा है देश यही है अन्नब्रह्म की माया
जन-मन में करवट लेती है अन्नब्रह्म की माया
विप्लव के अंडे सेती है अन्नब्रह्म की माया
आओ, तुमको बुला रही है अन्नब्रह्म की माया
22
हरी चुनरी, लाल घाघरा, भूख-भवानी आई
दुखियों की माँ मजलूमों की अपनी रानी आई
महाकाल की मौसी आई यम की नानी आई
तटबन्धों की क्षय होगी क्या, प्रलय हिमानी आई
हरी चुनरी, लाल घाघरा, भूख-भवानी आई
23
हम भी अब हल-बैल सँभालें रचना-फचना छोड़ें
काफी गोद लिया कागज, आओ अब धरती कोड़ें
खिला चुके आकाश कुसुम, मिट्टी से नाता जोड़ें
अन्न नहीं है उधर, इधर आओ अपना रुख मोड़ें
हम भी अब हल-बैल सँभालें रचना-फचना छोड़ें
24
कोटि-कोटि मुख-कमल खिलेंगे, इन्हें चाहिए दाना
कोटि-कोटि कर-कमल हिलेंगे, इन्हें चाहिए दाना
आधा अनशन आधा भोजन, इन्हें चाहिए दाना
नया राष्ट्र नौ लाख नियोजन, इन्हें चाहिए दाना
कोटि-कोटि मुख-कमल खिलेंगे, इन्हें चाहिए दाना
25
नव विधान, नव यन्त्र रचेगी अन्नब्रह्म की माया
नई ऋचा, नव मन्त्र रचेगी अन्नब्रह्म की माया
चिन्तन को नव इंगित देगी अन्नब्रह्म की माया
युग की पीड़ाएँ हर लेगी अन्नब्रह्म की माया
नव विधान, नव यन्त्र रचेगी अन्नब्रह्म की माया
दोहा
सीधे-सादे शब्द हैं, भाव बड़े ही गूढ़
अन्न पचीसी घोख ले, अर्थ जान ले मूढ़

कबिरा खड़ा बाज़ार में, लिया लुकाठी हाथ
बन्दा क्या घबरायेगा, जनता देगी साथ

छीन सके तो छीन ले, लूट सके तो लूट
मिल सकती कैसे भला, अन्नचोर को छूट

आज गहन है भूख का, धुँधला है आकाश
कल अपनी सरकार का होगा पर्दाफाश

नागार्जुन-मुख से कढे साखी के ये बोल
साथी को समझाइये रचना है अनमोल

अन्न-पचीसी मुख्तसर, लोग करोड़-करोड़
सचमुच ही लग जाएगी आँख कान में होड़

अन्नब्रह्म ही ब्रह्म है बाकी ब्रह्म पिशाच
औघड़ मैथिल नाग जी अर्जुन यही उवाच ॥

(इति श्री अन्नपचीसी समाप्त। पुरानी जूतियों का कोरस/जनशक्ति, 28 जनवरी, 1965)

अन्न पचीसी विश्लेषण - Ann Pachisi Meaning Analysis Baba Nagarjun
कविता पाठ करते हुए नागार्जुन - उनकी आवाज़ में ही एक विद्रोह था

नागार्जुन की 'अन्न-पचीसी' का साहित्यिक विश्लेषण (Deep Literary Analysis)

1. 'अन्नब्रह्म' का 'डायन' और 'पिशाचिन' में बदलना (Subversion of the Sacred)

हिंदू दर्शन में अन्न को ईश्वर (अन्नब्रह्म) माना गया है। लेकिन नागार्जुन की अन्न पचीसी पहले ही पद में इस पवित्रता को तार-तार कर देती है। जब गोदामों में अनाज सड़ रहा हो और बाहर जनता भूखों मर रही हो, तो वह ईश्वरीय अनाज एक 'डायन' और खून पीने वाली 'भूख-पिशाचिन' में तब्दील हो जाता है। यह मिथकों का सबसे तीखा विखंडन है जो हमें अन्नब्रह्म की माया के स्याह सच से रूबरू कराता है।

अन्नब्रह्म की माया - Baba Nagarjun eating rice Annabrahma
अन्नब्रह्म की माया: वह अन्न जो जीवन देता है, वही अभाव में पिशाच बन जाता है

2. व्यापारी-हाकिम-नेता: भ्रष्टाचार का अपवित्र त्रिकोण

कविता का 12वां पद आधुनिक भारतीय राजनीति का सबसे सटीक एक्स-रे है: "व्यापारी हाकिम नेता तीनों ही खूब मिले हैं..."। नागार्जुन बताते हैं कि कैसे पूँजीपति (व्यापारी), नौकरशाही (हाकिम) और राजनेता मिलकर जनता को लूट रहे हैं। ऊपर से ये कमल की तरह पवित्र दिखते हैं (ऊपर कमल खिले हैं), लेकिन व्यवस्था के भीतर सिर्फ काई और कीचड़ है।

3. पीड़ा से क्रांति की ओर (The Revolutionary Turn)

बाबा नागार्जुन केवल रोना नहीं रोते; वे विद्रोह का बिगुल फूंकते हैं। 20वें पद तक आते-आते कविता का स्वर पूरी तरह से क्रांतिकारी हो जाता है: "बैलों के साथी हलधर, तुम हँसिया वाले आओ!" वे युवाओं से आह्वान करते हैं कि कीड़े-मकोड़ों की तरह मरना बंद करो और दमनकारी व्यवस्था के खिलाफ खड़े हो जाओ।

अन्न-पचीसी की काव्य-शैली और शिल्प (Poetic Style & Craft)

इस महान कृति को केवल इसके विषय के लिए नहीं, बल्कि इसके शानदार Literary Craft के लिए भी जाना जाता है:

  • पुनरावृत्ति (Refrain): "अन्नब्रह्म की माया" पंक्ति का बार-बार दोहराया जाना एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा करता है, मानो कोई मंत्र जपा जा रहा हो जो सत्ता को सीधी चुनौती दे रहा है।
  • लोकधुन शैली (Folk Rhythm): नागार्जुन ने इसे लोकगीतों (जनकाव्य परंपरा) की तर्ज पर रचा है। इसे गाते समय ऐसा प्रतीत होता है जैसे गांव की चौपाल पर कोई लोकगायक पूरी व्यवस्था को कोस रहा हो।
  • राजनीतिक व्यंग्य (Political Satire): "अंधी होगी भूख कि छूटे अश्रुगैस के गोले" जैसे वाक्यों के माध्यम से नागार्जुन सीधे तत्कालीन सरकार के क्रूर रवैये पर कड़ा प्रहार करते हैं।
नागार्जुन की काव्य-शैली - Baba Nagarjun Poetry Recitation
लोकधुन और जनकाव्य परंपरा के पुरोधा

अन्न-पचीसी (Ann-Pachisi) की दुर्लभ प्रस्तुति (Video)

इस महान कविता को पढ़ने के साथ-साथ इसकी ऊर्जा को महसूस करना भी आवश्यक है। नीचे दी गई वीडियो प्रस्तुति इंटरनेट पर Harsh Nath Jha द्वारा 'अन्न-पचीसी' की एकमात्र उपलब्ध और सबसे प्रामाणिक 'Shorts' प्रस्तुतियों में से एक है।

बाबा नागार्जुन - Baba Nagarjun Reading Book Portrait
एक निरंतर जागरूक और अध्ययनशील जनकवि

निष्कर्ष (Evergreen Conclusion)

यद्यपि Ann-Pachisi (अन्न-पचीसी) 1965 के अकाल के विशेष संदर्भ में लिखी गई थी, किंतु इसकी प्रासंगिकता आज भी उतनी ही जीवंत है। जब तक समाज में संसाधनों का असमान वितरण रहेगा और सत्ताधीश जनता की भूख पर अपनी राजनीति चमकाते रहेंगे, नागार्जुन का यह उद्घोष—"अन्नब्रह्म ही ब्रह्म है बाकी ब्रह्म पिशाच"—हमें हमेशा झकझोरता रहेगा। यह कविता हिंदी साहित्य के इतिहास में एक ऐसे मील के पत्थर के रूप में दर्ज है, जिसने कविता को वातानुकूलित कमरों से निकालकर सीधे खेतों, खलिहानों और भूख से लड़ते किसानों के बीच खड़ा कर दिया।

Baba Nagarjun Rare Family Photograph
अपने परिजनों के साथ बाबा नागार्जुन का एक अत्यंत दुर्लभ चित्र

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

अन्न-पचीसी क्या है?
अन्न-पचीसी (Ann-Pachisi) हिंदी के जनकवि बाबा नागार्जुन द्वारा रचित 25 पदों (stanzas) की एक महान व्यंग्यात्मक और क्रांतिकारी कविता है, जो भारत में खाद्यान्न संकट (Food Crisis) और राजनैतिक भ्रष्टाचार पर गहरा प्रहार करती है।
अन्न-पचीसी किसने लिखी?
अन्न-पचीसी को प्रगतिशील काव्यधारा के सबसे सशक्त हस्ताक्षर 'जनकवि' बाबा नागार्जुन (जिनका वास्तविक नाम वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' है) ने लिखा है।
अन्न-पचीसी कब लिखी गई?
यह ऐतिहासिक कविता 28 जनवरी 1965 को ('पुरानी जूतियों का कोरस/जनशक्ति' में) पूरी होकर प्रकाशित हुई थी। यह वह दौर था जब भारत भीषण अकाल, महंगाई और PL-480 के तहत अनाज आयात के संकट से जूझ रहा था।
अन्नब्रह्म की माया का क्या अर्थ है?
कविता में 'अन्नब्रह्म की माया' का प्रयोग गहरे व्यंग्य के रूप में किया गया है। भारतीय संस्कृति में अन्न को साक्षात ईश्वर (ब्रह्म) माना जाता है, लेकिन नागार्जुन बताते हैं कि जमाखोरों के कारण वही पवित्र अन्न अब जनता की जान लेने वाली 'डायन' और छल करने वाली 'माया' बन गया है।
अन्न-पचीसी किस सामाजिक समस्या पर आधारित है?
यह कविता मुख्य रूप से भुखमरी, अनाज की जमाखोरी (grain hoarding), आसमान छूती महंगाई, नेताओं-अधिकारियों-व्यापारियों के गठजोड़ (भ्रष्टाचार) और गरीब किसानों-मजदूरों के शोषण जैसी गंभीर सामाजिक-आर्थिक समस्याओं पर आधारित है।

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