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सुना था कि बेहद सुनहरी है दिल्ली (Lyrics & Meaning) - Imran Pratapgarhi

'यात्री' यानी बाबा नागार्जुन: लहेरियासराय की वह शाम जिसने हिंदी–मैथिली साहित्य को बदल दिया

'यात्री' यानी बाबा नागार्जुन: लहेरियासराय की वह शाम जिसने हिंदी–मैथिली साहित्य को बदल दिया

साहित्य की दुनिया में कुछ शामें ऐसी होती हैं, जो हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो जाती हैं। वे किसी भव्य मंच पर नहीं, बल्कि किसी छोटे से क़स्बे के एक साधारण से कमरे में घटित होती हैं, लेकिन उनकी गूंज सदियों तक सुनाई देती है।

ऐसी ही एक शाम थी 4 दिसम्बर 1986 की, बिहार के लहेरियासराय के पंडासराय मुहल्ले में।

यह वह शाम थी जब हिंदी और मैथिली साहित्य के दो सबसे बड़े हस्ताक्षर—एक 'यात्री' और दूसरे 'नागार्जुन'—एक ही कुर्सी पर विराजमान थे। हम बात कर रहे हैं जनवादी कवि, कथाकार और विद्रोही चेतना के प्रतीक वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' की, जिन्हें दुनिया बाबा नागार्जुन के नाम से जानती है।

1986 में लिया गया उनका यह दुर्लभ स्मृति लेख (Smritilekh) या इंटरव्यू, आज इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) के अभिलेखागार में एक अनमोल दस्तावेज़ के रूप में सुरक्षित है। यह सिर्फ़ एक साक्षात्कार नहीं है; यह एक युग का, एक संघर्ष का और एक फक्कड़ साधु के दर्शन का कच्चा चिट्ठा है।

यह लेख उस Vaidhyanath Mishra Yatri Baba Nagarjun interview का एक गहरा, भावात्मक और सांस्कृतिक विश्लेषण है, जो हमें बाबा की अपनी आवाज़ में, उनकी अपनी मैथिली में, यह बताता है कि वे सिर्फ़ एक कवि नहीं, बल्कि एक क्रांति का नाम क्यों थे।


   

अस्वीकरण (Disclaimer):

   

नोट: इस लेख में उद्धृत 1986 का संवाद और विवरण इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) की वेबसाइट पर उपलब्ध मूल दस्तावेज़ (akshr006) से संकलित हैं। यहाँ प्रस्तुत भाषा, विश्लेषण और व्याख्या Sahityashala.in द्वारा तैयार की गई है; मूल सामग्री IGNCA की है।

  बाबा नागार्जुन ‘यात्री’ — 1986 इंटरव्यू प्रेरित कला-चित्र  
चित्र: IGNCA के 1986 वाले लहेरियासराय इंटरव्यू से प्रेरित बाबा नागार्जुन ‘यात्री’ की कलात्मक छवि — एक फक्कड़ कवि, एक साधारण कमरा और एक युग की गूंज।

Vaidhyanath Mishra Yatri Baba Nagarjun interview — 1986 का सार

1986 में लहेरियासराय में लिया गया यह इंटरव्यू बाबा नागार्जुन के जीवन और साहित्य के कई अनछुए पहलुओं को उजागर करता है। यह उनके बेबाक विचारों और फक्कड़ स्वभाव का एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है।

1986 की वह शाम: लहेरियासराय का वह कमरा

इंटरव्यू की शुरुआत ही उस माहौल को सजीव कर देती है। यह किसी स्टूडियो की चकाचौंध नहीं, बल्कि यथार्थ की खुरदरी ज़मीन है।

वैद्यनाथ मिश्र "यात्री'
लहेरियासरायक पंडासराय मुहल्ला। सन् १९८६। तारिख रहै चारि दिसम्बर। बृहस्पति। घड़ी मे बाजल रहैक साढ़े तीन। जाड़क मास..... साँझ खसल चल अबैत रहैक।

पुरान टाइपक एकटा मकानमे छोटछीन कोठलीमे यात्रीजी एकटा अति साधारण खाट पर चुपचाप बैसल रहथि। ट्रान्जिस्टरसँ कोनो शास्रीय संगीतक धुनि अबैत रहइक- ताहीमे लीन!

-'अहाँ लोकनि के थिकहूँ बउआ?'
-'हम अमरनाथ'
-'हम विश्वनाथ'
-'आ हम वैद्यनाथ'- यात्रीजी भभा'कऽ हँसैत बजलाइ-'नथिनाथ'।

बाबा का यह फक्कड़पन—'हम वैद्यनाथ... नथिनाथ'—सिर्फ एक मज़ाक नहीं है। यह उस व्यक्ति का दर्शन है जिसने नाम, जाति और उपाधियों के बोझ को उतार फेंका था।

बीमारी, एलोपैथी और मानवता का वह 'अपूर्व' अनुभव

इंटरव्यू की शुरुआत में बाबा अपने स्वास्थ्य और संघर्ष पर बात करते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि पहले उन्हें एलोपैथी से "जिद्द" थी, लेकिन इस बार वह जिद्द नहीं निभी। वे डॉक्टरों का आभार मानते हैं, लेकिन उनके लिए सबसे मर्मस्पर्शी अनुभव अस्पताल के बेड पर हुआ।

जब उनसे एक मार्मिक घटना के बारे में पूछा गया, तो उनकी आकृति पर "इज़ोतक एकटा आभा" (प्रकाश की एक आभा) पसर गई।

मेडिकलक दूटा मैथिल नवयुवक छात्र कहलनि अपनेक "ब्लड" हमरे लोकनिक ग्रुपक अछि। हम सब तैयार छी। जतेक खूनक प्रयोजन पड़त - हम सब देबा लेल प्रस्तुत छी ...। बउआ, आँखि सजल भ" गेल। कहलियनि, अहाँ सब जीबू आ मिथिलाक लेल खून अर्पित करु। अप्पन मिथिला बड्ड पछुआएल छथि।

यह घटना दिखाती है कि बाबा के लिए 'क्रांति' सिर्फ़ राजनीतिक नहीं, बल्कि मानवीय भी थी। उन्हें अपना खून देने वालों में 'मिथिला का भविष्य' दिखाई दिया।

विद्रोह की चिनगारी: 'मम मातृभूमि अन्तिम प्रणाम' का सच

जब इंटरव्यू लेने वाले ने उनकी प्रसिद्ध कविता "मम मातृभूमि अन्तिम प्रणाम" का ज़िक्र छेड़ा, तो बाबा भाव-विभोर हो गए। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कोई पलायन नहीं था, बल्कि व्यवस्था के प्रति 'विद्रोह' था।

औ, हम ने कहलिऐ-मुदा माय हमर प्रणाम स्वीकार करथि तखन ने .. मायकें कतहु क्यो अन्तिम प्रणाम कऽ सकैत अछि? ... एकटा बात जनै" छी .... आइ तें बउआइत-बउआइत अपने घरमे घुरल छी।

... ओ कविता तँ हम परम्पराक विरोधमे लिखने छी ....। तहिया अपन सभक समाजमे घोर अनाचार रहइक, "आमगोटी जामगोटी, तेतरी सोहाग गोटी"क खेलमे उछलैत-कुदैत बचिया सभक विवाह बूढ़ वऽरसँ भ" जाइक। बहु-विवाहक नाम पर अलग अत्याचार होइत रहइक।

जमीन्दार सब वेमत्त-गरीब-गुरबाक शोषण ... परम्परा आ जड़ताक अखण्ड राज्य ... करे सभक विरोधमे लिखनि रहिऐक, विद्रोहमे लिखने रहिऐक। नव सृजन- नवीन चिन्तन ... मिथिलामे नवजागरणक अपेक्षा छलैक ताहि दिन...

यह सिर्फ़ एक कविता का स्पष्टीकरण नहीं है; यह Maithili literature history में 'यात्री' के योगदान का सार है। वे उस जड़ता (जमींदारी, पुरोहितवाद) के ख़िलाफ़ लिख रहे थे, जिसने समाज को जकड़ रखा था। यह वही विद्रोह था जो उनके हिंदी लेखन में "जंगल के ठेकेदारों" और "रानी एलिजाबेथ" के ख़िलाफ़ भी दिखता है।

  बाबा नागार्जुन (वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री') का क्लासिक श्वेत-श्याम फोटोग्राफ  
बाबा नागार्जुन (वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’) का एक दुर्लभ श्वेत-श्याम फोटोग्राफ — साहित्य, फक्कड़ता और विद्रोही आत्मा का जीवंत प्रतीक।

'पारो' जिसने मैथिली साहित्य में विस्फोट कर दिया

बाबा के विद्रोही स्वर का सबसे बड़ा प्रमाण था उनका मैथिली उपन्यास 'पारो'। जब 'पारो' का ज़िक्र आया, तो बाबा बिहुँस (मुस्कुरा) दिए।

हँ, कोनो पात्रक तेहन वर्णन छैक ... । मुदा पारो की लिखब .... ? ओहि समयमे तेहन ने वातावरण रहइक जे की कहू ? एकटा पंडित त्रिलोकनाथ मिश्र। ओ पारोक प्रकाशनक बाद अत्यन्त उग्र भऽ गोल रहथि। एकटा फकड़ा बनौलन्हि-

पारो कपारो फोड़ि देल ......

मैथिलीमे ताहिया लिखब बड कठिन। पंडित आ पुरोहितक साम्राज्य ......राजा आ महाराजक दरवारी संस्कृति ....! बड़का-बड़का जमीनन्दारक महाभोज .... एहन परिस्थितिमे लोक की लिखत .....! अभिनन्दन-वन्दन, कीर्त्तन आ भजन।

'Paro' (Maithili novel) सिर्फ़ एक उपन्यास नहीं था; यह उस 'दरबारी संस्कृति' पर सीधा हमला था। 'यात्री' ने यथार्थ का वह नग्न रूप दिखाया, जिसे मैथिली के 'पंडित' और 'पुरोहित' पचा नहीं पाए। यह वही साहस था जिसने मैथिली कविता को "अन्हार जनी" और "चिप कऽ रहु" जैसी कालजयी रचनाएँ दीं।

प्रगतिवाद और 'मधुबनी ड्योढ़ी' का वह 'कटहर कबाब'

जब उनसे 'प्रगतिवाद' (Progressivism) पर सवाल पूछा गया, तो बाबा ने एक अद्भुत किस्सा सुनाया। यह किस्सा उस सामंती समाज का पूरा एक्स-रे है।

एकबेरि मधुबनी ड्यौढ़ीसं आमन्त्रण भेटल भोजन पर। ... बाबू साहेब हमरासँ भेट करवा ले' अति उत्सुक छथि ..... कहलनि-यात्रीजी, सुनलहुँ अछि जे अहाँ गरीब मजदूरक पक्षधर छी। जकरा हमरा सब राड्-रोहिया कहै छिऐ तकरा पर कविता लिखै छी। आब तँ जमीन्दारी चल गेल .... आब तँ हमहूँ सब गरोब भऽ गोलहुँ ..... हमहूँ सब राड़-रोहिया ...। तकर बाद बेमत्त भ 'क'बाबू साहेब हँसऽ लगलाह।

इसके बाद बाबा उस 'गरीब' बाबू साहेब के भोजन का वर्णन करते हैं:

बड़काटा थारी। नौटा कटौरी। ... गम-गम करैत तरकारी .... तिलकोरक तरुआ... एकटा तरकारी रहिक कटहरक .... कटहरक कबाब...

... ओ जे पान खाथि ... बाबू साहेब ... कैकटा नोकर रहनि। ... पानकें कर्पूर मसाला आदि सँ लगाओल जाइक। तखन चूरल जाइक-दाँत नहि रहनि बाबू साहेवकें - एकटा मुँहलगुआ नोकर ठोर अलगाक' पान राखि दैनि आ तखन तुनू गाल पर चटाक-चटाक दू थापर मारनि-किछु लकबा जकाँ भ' गोल रहनि-तखन पानक स्वाद लगनि।

इस किस्से के बाद बाबा अपना असली पंच मारते हैं:

हम जखन मधुबनी ड्योढ़ीसं बहरेलहुँ तँ सोचलहुँ बापरे ....जमीन्दारी चल गेला पर एहन शान-जमीन्दारी जखन रहै-तखन की .....की सब होइत हेतै ? तँ कहलहुँ, बउआ जे एहन समाजमे प्रगतिवाद की चलत ?

'वातावरण' मिलता नहीं, 'क्रियेट' किया जाता है

जब उनसे हिंदी जगत के 'वातावरण' (Environment) के बारे में पूछा गया, तो बाबा ने एक कलाकार का मूल-मंत्र दिया।

देखू-वातावरण....वातावरण भेटै नहि छैक, वातावरम बनाओल जाइ छै' -क्रियेट कएल जाइत छैक। ... संस्कृतक एकटा श्लोक मोन पड़ल ... नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा...। जंगलमे सिंहक वातावरण बनबऽ पड़ैत छैक, बुझल किने !

साहित्य कोई रियायत नहीं है, वह एक संघर्ष है, जिसे 'क्रियेट' करना पड़ता है। और यह संघर्ष कितना कठिन है, वे आगे बताते हैं।

साहित्य: एक 'सोनार की कला'

साहित्य साधना सहज नहि छै। ई तँ सोनारक कला छिऐक। ... जेना सोनार सब छोट-पैघ हथौरा-हथौरी रखैत अछि, नौटा कटौरी-सामनेमे आगि... फोंफी आ कसौटी तहिना साहित्यकारकें हथौरी राखऽ पड़ैत छैक। निरन्तर संघर्ष... अपूर्व धैर्य-ताहूमे हिन्दीमे-अरे, बापरे .....!

टैगोर की 'सूझ-बूझ' और मैथिल समाज का 'मुकदमा'

बाबा सिर्फ़ अपनी बात नहीं कहते, वे तुलनात्मक दृष्टि भी रखते हैं। वे बताते हैं कि एक ही समाज में 'रवीन्द्रनाथ टैगोर' और 'मैथिल कवि' में क्या फ़र्क़ है।

औ रवि ठाकुर रहथि बड़ सौभाग्यशाली। ... नोवेल प्राइजक एक लाख टाका भेटलनि तँ शांति निकेतनक स्थापना कएलन्हि। ... एहन सूझ-बूझ अनका सँ होएतैक?

अब मैथिल समाज का हाल देखिए:

अपन मैथिल समाजमे जँ लोककँ एक लाख टाका भेटैक तँ उनटे भ"जेतैक...। ... हमरा सभक अग्रज पीढ़ीक- किछु हजार- बजार टाका भेटलनि .. अवकाश ग्रहण कएलाख उपरान्त ... गामक लोक सब सनका देलकनि-वश, गामक दू गोटे पर मोकदमा ठोकि देलथिन। .... तखन तँ चलल फेर कचहरी ... इजलास, गवाह आ हाकिम। ओही झमेलामे हुनक बुढ़ारी गेलनि। ... रवि ठाकुर जकाँ सूझ-बूझ नहि ..... कोना विकास होएत अपन समाजक?

यह सिर्फ़ एक टिप्पणी नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी से जुड़ी एक गहरी पीड़ा है, जिसे वे अपनी हिंदी कविताओं में भी लाते रहे, जैसे "सिंदूर-तिलकित भाल" में।

एक बुद्धिजीवी का अंतिम कर्तव्य: परिवार का 'संग'

इंटरव्यू के अंत में, बाबा एक बेहद निजी और मार्मिक सलाह देते हैं। यह हर लेखक, हर बुद्धिजीवी और उसके परिवार के लिए एक सन्देश है।

बुद्धिजीवी जँ दीर्घजीवी होअए तँ ओकर रक्षा लेल दू गोटेक प्रयोजन पड़ैत छैक। खाक क' कवि आ साहित्यकारकेँ तकर आर प्रयोजन! मोनक झोंक रहैत छैक। सृजनक उन्माद, विच्छोह, विचारक प्रवाह। ... परिवारक सदस्य अथवा आत्मीयजनक ई कर्त्तव्य भ' जाइत छैक जे ओ ओकर संग रहए...

होइत की छै तँ कवि आ साहित्यकार जिद्दी भ' जाइ छै ... मुदा तेँ की... डाँटय-फटकारय, तइयो परिवारक लोककेँ संग नहि छोड़बाक चाही। उच्छ्ृंखल मोन .... आ गतिशील चरण ....... आखिर एहि प्रवाहक संग के देतै?

निष्कर्ष: क्यों यह इंटरव्यू एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है

1986 की लहेरियासराय की वह शाम एक असाधारण शाम थी। यह वह शाम थी जब 'यात्री' ने अपने घर की दहलीज़ पर बैठकर 'नागार्जुन' के विश्व-बोध की व्याख्या की।

यह कई मायनों में ऐतिहासिक है:

       
  • यह एक प्राइमरी सोर्स है: यह बाबा की अपनी आवाज़, अपनी मैथिली में है, जो उनके विचारों को बिना किसी फ़िल्टर के पेश करता है।
  •    
  • 'यात्री' और 'नागार्जुन' का संगम: यह दस्तावेज़ 'यात्री' (मैथिली) और 'नागार्जुन' (हिंदी) के द्वैत को ख़त्म करता है और दिखाता है कि दोनों एक ही विद्रोही चेतना के दो रूप हैं।
  •    
  • 'पारो' पर उनका पक्ष: यह 'Paro' Maithili novel पर लेखक का अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करता है, जो शोधार्थियों के लिए अमूल्य है।
  •    
  • सामंती समाज का एक्स-रे: 'मधुबनी ड्योढ़ी' का किस्सा किसी भी समाजशास्त्रीय लेख से ज़्यादा ताक़तवर है।
  •    
  • शोध के लिए अमूल्य: इस दस्तावेज़ — Vaidhyanath Mishra Yatri Baba Nagarjun interview — को पढ़ना हर छात्र और शोधकर्ता के लिए एक अनिवार्य हिस्सा है।

यह इंटरव्यू हमें बताता है कि बाबा नागार्जुन क्यों 'जन-कवि' थे। वे इसलिए 'महान' नहीं थे कि उन्होंने बड़ी-बड़ी बातें कीं; वे इसलिए 'महान' थे क्योंकि उन्होंने 'छोटी' और 'सच्ची' बातें कीं। उन्होंने उस दर्द को आवाज़ दी, जिसे समाज ने अनसुना कर दिया था।

(बाबा नागार्जुन के सम्पूर्ण साहित्य को पढ़ने के लिए आप साहित्य अकादमी और हिन्दवी के संग्रहों को देख सकते हैं।)

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. बाबा नागार्जुन को 'यात्री' क्यों कहा गया?
'यात्री' बाबा नागार्जुन का मूल उपनाम था, जिसे वे अपनी मैथिली रचनाओं के लिए इस्तेमाल करते थे। यह नाम उनकी 'घुमक्कड़' प्रवृत्ति का भी प्रतीक था। वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' के नाम से उन्होंने मैथिली साहित्य को समृद्ध किया।

2. नागार्जुन का उपन्यास 'पारो' इतना विवादास्पद क्यों था?
जैसा कि इंटरव्यू में बाबा ने ख़ुद बताया, 'पारो' (मैथिली उपन्यास) ने ग्रामीण समाज में स्त्री-पुरुष संबंधों और सामाजिक वर्जनाओं को बेहद साहस से प्रस्तुत किया। यह 'पंडितों और पुरोहितों' की 'दरबारी संस्कृति' पर सीधा हमला था, जिसे मैथिली का रूढ़िवादी समाज पचा नहीं पाया और एक पंडित ने कहा- "पारो कपारो फोड़ि देल।"



3. इस 1986 के IGNCA इंटरव्यू का क्या महत्व है?
यह इंटरव्यू (स्मृति लेख) इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बाबा नागार्जुन के दो साहित्यिक व्यक्तित्वों—'यात्री' (मैथिली) और 'नागार्जुन' (हिंदी)—के बीच एक पुल का काम करता है। इसमें वे 'पारो', 'प्रगतिवाद' और सामंती समाज (मधुबनी ड्योढ़ी) पर अपनी बेबाक राय अपनी मूल भाषा मैथिली में रखते हैं।

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क्या आपने बाबा नागार्जुन की कोई ऐसी कविता या संस्मरण पढ़ा है, जिसने आपको झकझोर कर रख दिया हो? कमेंट्स में हमें ज़रूर बताएँ।

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