लश्कर भी तुम्हारा है: विरोध और सच्चाई की एक मुखर आवाज़
इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ता निरंकुश हुई है, तब-तब कलम मजलूमों का सबसे बड़ा हथियार बनकर उभरी है। एक ऐसी ही गज़ल जिसने हाल ही में सोशल मीडिया से लेकर विरोध प्रदर्शनों तक में तहलका मचा दिया है, वह है "लश्कर भी तुम्हारा है, सरदार तुम्हारा है"। अर्जुन सिंह चाँद जी द्वारा रचित यह कविता व्यवस्था की खामियों, बिके हुए मीडिया और सत्ता के अहंकार को सीधे चुनौती देती है।
आज के समय में जब असहमति के स्वरों को दबाने का प्रयास किया जाता है, तो इस तरह की क्रांतिकारी और विद्रोही कविताएँ जनता की ज़ुबान बन जाती हैं। चाहे वह छात्रों द्वारा हाल ही में दिल्ली में किया गया CJP का NEET विरोध प्रदर्शन (चलो संसद मार्च) हो या कोई अन्य जन-आंदोलन, यह कविता हर उस जगह गूंजती है जहाँ सत्य को झूठ से लड़ने की दरकार होती है।
कवि अर्जुन सिंह चाँद के बारे में
कविता की गहराई में जाने से पहले इसके रचनाकार को जानना आवश्यक है। इस गज़ल के असली रचनाकार अर्जुन सिंह चाँद हैं। अक्सर सोशल मीडिया पर बिना जानकारी के इस रचना को राहत इंदौरी या मुनव्वर राना जैसे दिग्गज शायरों के नाम से साझा कर दिया जाता है। अर्जुन सिंह चाँद की लेखनी मुख्य रूप से समाज की ज़मीनी हकीकत, राजनीतिक विसंगतियों और आम नागरिक के रोज़मर्रा के संघर्षों पर केंद्रित होती है। उनकी यह गज़ल उनके निर्भीक और स्पष्टवादी साहित्यिक दृष्टिकोण का सबसे सशक्त प्रमाण है।
कविता के बोल (देवनागरी में)
लश्कर भी तुम्हारा है सरदार तुम्हारा है
तुम झूठ को सच लिख दो अखबार तुम्हारा है।
इस दौर के फरियादी जायें तो कहां जायें,
कानून तुम्हारा है दरबार तुम्हारा है।
सूरज की तपन तुमसे बर्दाश्त नहीं होती,
इक मोम के पुतले सा किरदार तुम्हारा है।
वैसे तो हरइक शै में साया है तुम्हारा ही,
दुश्वार बहुत लेकिन दीदार तुम्हारा है।
कोई भी इसे अपना कहता हो भले लेकिन,
इस "चाँद" पर तो केवल अधिकार तुम्हारा है।
~ अर्जुन सिंह चाँद
हिंगलिश संस्करण (Hinglish Lyrics)
Lashkar bhi tumhara hai sardar tumhara hai
Tum jhooth ko sach likh do akhbaar tumhara hai.
Iss daur ke fariyadi jaayein toh kahan jaayein,
Kanoon tumhara hai darbaar tumhara hai.
Sooraj ki tapan tumse bardasht nahi hoti,
Ik mom ke putle sa kirdaar tumhara hai.
Waise toh haraik shai mein saaya hai tumhara hi,
Dushwaar bahut lekin deedaar tumhara hai.
Koi bhi isse apna kehta ho bhale lekin,
Iss "Chand" par toh keval adhikaar tumhara hai.
कविता की विस्तृत व्याख्या और अर्थ
यह गज़ल केवल शब्दों का ताना-बाना नहीं है, बल्कि यह वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक ढांचे का एक कड़वा सच है। यह हमें शहीद भगत सिंह के साथी पाश की 23 मार्च वाली कविताओं के उस उग्र दौर की याद दिलाती है, जहाँ कलम की धार किसी भी हथियार से अधिक तेज़ हुआ करती थी।
1. मीडिया और सत्ता का खतरनाक गठजोड़
इन पंक्तियों में शायर स्पष्ट करता है कि सेना (लश्कर) और सेनापति (सरदार) दोनों एक ही निरंकुश सत्ता के अधीन हैं। इससे भी अधिक भयावह स्थिति यह है कि 'अखबार' (यानी मीडिया) भी बिक चुका है। सत्ताधारी अपने एजेंडे के तहत किसी भी सफेद झूठ को सच बनाकर जनता के सामने परोस सकते हैं। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में प्रेस की स्वतंत्रता (Freedom of the Press) पर उठते सवालों के बीच यह शेर और भी प्रासंगिक हो जाता है।
2. न्यायपालिका और आम आदमी की बेबसी
जब दरबार (सरकार) और कानून (न्याय व्यवस्था) दोनों ही एक-दूसरे के इशारों पर काम करने लगें, तो एक आम शोषित व्यक्ति अपनी गुहार लेकर कहाँ जाए? यह पंक्ति गहरी निराशा और सिस्टम के प्रति अविश्वास को दर्शाती है। यह भाव बिल्कुल नवाज़ देवबंदी की गज़ल "जलते घर को देखने वालों" से मिलता-जुलता है, जहाँ समाज की चुप्पी और न्याय की कमी पर गहरी चोट की गई है।
3. तानाशाह का खोखलापन और डर
यहाँ 'सूरज की तपन' का अर्थ है— सच्चाई, कड़े सवाल या विरोध की आग। शायर तंज कसते हुए कहता है कि सत्ताधारी बाहर से चाहे जितने भी शक्तिशाली क्यों न दिखें, भीतर से वे 'मोम के पुतले' के समान कमज़ोर हैं, जो आलोचना की ज़रा सी गर्मी से पिघलने लगते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही राजनीतिक पतन है जिसका वर्णन O Parliament You Cry जैसी कविताओं में किया गया है।
4. अदृश्य भय और अहंकार का पर्दा
हर जगह सरकार का प्रभाव, निगरानी या खौफ मौजूद है। लेकिन जब जनता को वास्तव में मदद, जवाबदेही या न्याय की ज़रूरत होती है, तब वे शासक गायब रहते हैं। उनका दीदार (दर्शन) दुर्लभ हो जाता है।
5. मक़्ता: तखल्लुस का प्रयोग और চরম व्यंग्य
शायर ने यहाँ बड़ी ही खूबसूरती से अपने तखल्लुस (उपनाम) "चाँद" का प्रयोग किया है। इसमें एक बहुत गहरा साहित्यिक विमर्श (Nuance) छिपा है। एक तरफ 'चाँद' कवि का अपना प्रतिनिधित्व है, जो यह दर्शाता है कि सत्ता सब कुछ छीन सकती है, लेकिन कवि की आत्मा और उसकी आवाज़ पर शासक का कोई नियंत्रण नहीं। दूसरी ओर, यह प्रकृति के 'चाँद' का प्रतीक है—मानो सत्ताधारी इतने अंधे और अहंकारी हो गए हों कि वे ब्रह्मांड की रचनाओं पर भी सिर्फ अपना ही एकाधिकार समझते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1: "लश्कर भी तुम्हारा है" कविता असल में किसने लिखी है?
इस बहुचर्चित गज़ल के असली रचयिता अर्जुन सिंह चाँद हैं। इंटरनेट और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी पर अक्सर इसे राहत इंदौरी या अन्य मशहूर शायरों के नाम से भ्रामक रूप से फैलाया जाता है।
Q2: इस गज़ल का मुख्य संदेश क्या है?
इसका मुख्य संदेश निरंकुश सत्ता (Authoritarianism) और गोदी मीडिया का कड़ा विरोध है। यह कविता दिखाती है कि कैसे शासक वर्ग सेना, न्यायपालिका और अखबारों पर कब्ज़ा करके आम जनता की आवाज़ को कुचलने का प्रयास करता है।
Q3: जन-आंदोलनों में इसे इतना क्यों पढ़ा जाता है?
कविता में इस्तेमाल किए गए शब्द— जैसे अखबार, कानून, और मोम का पुतला— सीधे तौर पर आज की राजनीतिक परिस्थितियों पर सटीक बैठते हैं। यह आम नागरिक की बेबसी को एक विद्रोही आवाज़ देती है, यही कारण है कि यह एक बेहतरीन प्रोटेस्ट पोएट्री बन चुकी है।
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